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बुधवार, 24 मई 2017

दोहे "मन है सदा जवान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मन में तो है कलुषता, होठों पर हरि नाम।
काम-काम को छल रहा, अब तो आठों याम।।
--
लटक रहे हैं कबर में, जिनके आधे पाँव।
वो ही ज्यादा फेंकते, इश्क-मुश्क के दाँव।।
--
मन की बात न मानिए, मन है सदा जवान।
तन की हालत देखिए, जिसमें भरी थकान।।
--
नख-शिख को मत देखिए, होगा हिया अशान्त।
भोगवाद को त्याग कर, रक्खो मन को शान्त।।
--
रोज फेसबुक पर लिखो, अपने नवल विचार।
अच्छी सूरत देख कर, तज दो मलिन विकार।।
--
सीख बड़ों से ज्ञान को, छोटों को दो ज्ञान।
जीवन ढलती शाम है, दिन का है अवसान।।
--
अनुभव अपने बाँटिए, सुधरेगा परिवेश।
नवयुग को अब दीजिए, जीवन का सन्देश।।
--
भरा हुआ है सिन्धु में, सभी तरह का माल।
जो भी जिसको चाहिए, देगा अन्तरजाल।।
--
महादेव बन जाइए, करके विष का पान।
धरा और आकाश में, देंगे सब सम्मान।।

ग़ज़ल "हिमायत कौन करता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुदा की आजकल, सच्ची इबादत कौन करता है
बिना मतलब ज़ईफों से, मुहब्बत कौन करता है

शहादत दी जिन्होंने, देश को आज़ाद करने को,
मगर उनकी मज़ारों पर, इनायत कौन करता है

सियासत में फक़त है, वोट का रिश्ता रियाया से
यहाँ मज़लूम लोगों की, हिमायत कौन करता है

मिला ओहदा उज़ागर हो गयी, करतूत अब सारी
वतन को चाटने में, अब रियायत कौन करता है

ग़रज़ जब भी पड़ी तो, ले कटोरा भीख का आये
मुसीबत में गरीबों की, हिफ़ाजत कौन करता है

सजीले “रूप” की चाहत में, गुनगुन गा रहे भँवरे
कमल के बिन सरोवर पर, कवायद कौन करता है

मंगलवार, 23 मई 2017

ग़ज़ल "उलझा है ताना-बाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन की हकीकत का, इतना सा है फसाना
खुद ही जुटाना पड़ता, दुनिया में आबोदाना

सुख के सभी हैं साथी, दुख का कोई न संगी
रोते हैं जब अकेले, हँसता है कुल जमाना

घर की तलाश में ही, दर-दर भटक रहे हैं
खानाबदोश का तो, होता नहीं ठिकाना

अपना नहीं बनाया, कोई भी आशियाना
लेकिन लगा रहे हैं, वो रोज शामियाना

मंजिल की चाह में ही, दर-दर भटक रहे हैं
बेरंग जिन्दगी का, उलझा है ताना-बाना

 अशआर हैं अधूरे, ग़ज़लें नहीं मुकम्मल
दुनिया समझ रही है, लहजा है शायराना

हो हुनर पास में तो, भर लो तमाम झोली
मालिक के दोजहाँ में, भरपूर है खजाना

लड़ते नहीं कभी भी, बगिया में फूल-काँटे
सीखो चमन में जाकर, आपस में सुर मिलाना

दिल की नजर से देखो, मत रूप-रंग परखो
रच कर नया तराना, महफिल में गुनगुनाना
  

सोमवार, 22 मई 2017

गीत "घुटता गला सुवास का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आम नहीं अब रहा आम, वो तो है केवल खास का।
नजर नहीं आता बैंगन भी, यहाँ कोई विश्वास का।।

अब तो भिण्डीलौकी-तोरी संकर नस्लों वाली हैं,
कद्दू के पिछलग्गू भी अब खाने लगे दलाली हैं,
टिण्डा और करेला भी तो, पात्र बना परिहास का।
नजर नहीं आता बैंगन भी, यहाँ कोई विश्वास का।।

केला-सेब-पपीता भी तो, खाने लगे दवाई को,
बच्चे तरस रहें हैं कब से, खोया और मलाई को,
जूस मिलावट वाला पाकर, घुटता गला सुवास का।
  नजर नहीं आता बैंगन भी यहाँ कोई विश्वास का।।

खरबूजा-तरबूज सभी के, भाव चढ़े बाजारों में,
धनवानों ने कैद करी हैं, लीची कारागारों में,
नहीं मिठाई में आता, नैसर्गिक स्वाद मिठास का।
नजर नहीं आता बैंगन भी, यहाँ कोई विश्वास का।।

रविवार, 21 मई 2017

दोहे "सबकी अपनी टेक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
रौशन रजनी को करे, वो चन्दा है एक।
धवल चाँदनी पर टिकी, नवयुगलों की टेक।।
--
फैले हैं संसार में, यूँ तो पन्थ अनेक।
सबके दिल में जो बसे, वो नारायण एक।।
--
रूप-रंग सबका अलग, होता भिन्न विवेक।
उर मन्दिर को छोड़कर, मन्दिर में अभिषेक।।
--
कविता-कानन में मिले, हमको छन्द अनेक।
सबकी अपनी मापनी, सबकी अपनी टेक।।
--
एक मुखी रुद्राक्ष तो, मिलना है आसान।
लेकिन दुर्लभ जगत में, एक मुखी इंसान।।
--
सात सुरों से ही बने, दुनिया में संगीत।
जग में आवागमन की, रही एक ही रीत।।
--
चरैवेति की सीख को. सरिताओं से सीख।
सागर भी जन के लिए, जिनसे माँगे भीख।।
--
सहज-सरल पगडण्डियाँ, खोज रहा हर एक।
पन्थ भले ही हों अलग, लेकिन मंजिल एक।।

गीत "इस जीवन की भोर तुम्हारे हाथों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आसमान का छोर, तुम्हारे हाथो में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

लहराती-बलखाती, पेंग बढ़ाती है,
नीलगगन में ऊँची उड़ती जाती है,
होती भावविभोर तुम्हारे हाथो में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

वसुन्धरा की प्यास बुझाती है गंगा,
पावन गंगाजल करता तन-मन चंगा,
सरगम का मृदु शोर तुम्हारे हाथों में।।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

उपवन में कलिकाएँ जब मुस्काती हैं,
भ्रमर और तितली को महक सुहाती है,
इस जीवन की भोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

प्रणय-प्रेम के बिना अधूरी पावस है,
बिन मयंक के छायी घोर अमावस है,
चन्दा और चकोर तुम्हारे हाथो में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में।।

शनिवार, 20 मई 2017

अकविता "मानवता मर गई है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

नारी की व्यथा


मैं
धरती माँ की बेटी हूँ
इसीलिए तो
सीता जैसी हूँ
मैं हूँ
कान्हा के अधरों से
गाने वाली मुरलिया,
इसीलिए तो
गीता जैसी हूँ।

मैं
मन्दालसा हूँ,
जीजाबाई हूँ
मैं
पन्ना हूँ,
मीराबाई हूँ।

जी हाँ
मैं नारी हूँ,
राख में दबी हुई
चिंगारी हूँ।

मैं पुत्री हूँ,
मैं पत्नी हूँ,
किसी की जननी हूँ
किसी की भगिनी हूँ।

किन्तु
आज लोगों की सोच
कितनी गिर गई है,
मानवता
कितनी मर गई है।

दुनिया ने मुझे
मात्र अबला मान लिया है,
और केवल
भोग-विलास की
वस्तु जान लिया है!

यही तो है मेरी कहानी,
आँचल में है दूध
और आँखों में पानी!

शुक्रवार, 19 मई 2017

आलेख "समास अर्थात शब्द का छोटा रूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

      
समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि "समास वह क्रिया हैजिसके द्वारा कम-से-कम शब्दों मे अधिक-से-अधिक अर्थ प्रकट किया जाता है। समास’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है छोटा-रूप। अतः जब दो या दो से अधिक शब्द (पद) अपने बीच की विभक्तियों का लोप कर जो छोटा रूप बनाते हैंउसे समास की संज्ञा दी गयी है।
सामासिक शब्द
     समास के नियमों से निर्मित शब्द सामासिक शब्द कहलाता है। इसे समस्तपद भी कहते हैं। समास होने के बाद विभक्तियों के चिह्न (परसर्ग) लुप्त हो जाते हैं। जैसे-राजपुत्र।
समास-विग्रह
     सामासिक शब्द में दो पद (शब्द) होते हैं। पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं। जैसे-गंगाजल। इसमें गंगा पूर्वपद और जल उत्तरपद है।
     संस्कृत में समासों का बहुत प्रयोग होता है। अन्य भारतीय भाषाओं में भी समास उपयोग होता है। समास के बारे में संस्कृत में एक सूक्ति प्रसिद्ध है:
वन्द्वो द्विगुरपि चाहं मद्गेहे नित्यमव्ययीभावः।
तत् पुरुष कर्म धारय येनाहं स्यां बहुव्रीहिः॥
       समास को शब्द या समस्त पद कहते हैं। जैसे रसोई के लिए घर’ शब्दों में से के लिए’ विभक्ति का लोप करने पर नया शब्द बनारसोई घर’, जो एक सामासिक शब्द है।
किसी समस्त पद या सामासिक शब्द को उसके विभिन्न पदों एवं विभक्ति सहित पृथक् करने की क्रिया को समास का विग्रह कहते हैं - 
जैसे विद्यालय अर्थात विद्या के लिए आलय,
माता-पिता=माता और पिता।
समास के छ: भेद होते है-
1. अव्ययीभाव समास - (Adverbial Compound)
2. तत्पुरुष समास - (Determinative Compound)
3. कर्मधारय समास - (Appositional Compound)
4. द्विगु समास - (Numeral Compound)
5. द्वंद्व समास - (Copulative Compound)
6. बहुव्रीहि समास - (Attributive Compound)
1. अव्ययीभाव समास:
अव्ययीभाव समास में प्रायः
(i)पहला पद प्रधान होता है।
(ii) पहला पद या पूरा पद अव्यय होता है।
(वे शब्द जो लिंगवचनकारककाल के अनुसार नहीं बदलतेउन्हें अव्यय कहते हैं)
(iii)यदि एक शब्द की पुनरावृत्ति हो और दोनों शब्द मिलकर अव्यय की तरह प्रयुक्त होवहाँ भी अव्ययीभाव समास होता है।
(iv) संस्कृत के उपसर्ग युक्त पद भी अव्ययीभव समास होते हैं-
यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
यथाशीघ्र = जितना शीघ्र हो
यथाक्रम = क्रम के अनुसार
यथाविधि = विधि के अनुसार
यथावसर = अवसर के अनुसार
यथेच्छा = इच्छा के अनुसार
प्रतिदिन = प्रत्येक दिन। दिन-दिन। हर दिन
प्रत्येक = हर एक। एक-एक। प्रति एक
प्रत्यक्ष = अक्षि के आगे
घर-घर = प्रत्येक घर। हर घर। किसी भी घर को न छोड़कर
हाथों-हाथ = एक हाथ से दूसरे हाथ तक। हाथ ही हाथ में
रातों-रात = रात ही रात में
बीचों-बीच = ठीक बीच में
साफ-साफ = साफ के बाद साफ। बिल्कुल साफ
आमरण = मरने तक। मरणपर्यन्त
आसमुद्र = समुद्रपर्यन्त
भरपेट = पेट भरकर
अनुकूल = जैसा कूल है वैसा
यावज्जीवन = जीवनपर्यन्त
निर्विवाद = बिना विवाद के
दर असल = असल में
बाकायदा = कायदे के अनुसार
2. तत्पुरुष समास:
(i)तत्पुरुष समास में दूसरा पद (पर पद) प्रधान होता है अर्थात् विभक्ति का लिंगवचन दूसरे पद के अनुसार होता है।
(ii) इसका विग्रह करने पर कत्र्ता व सम्बोधन की विभक्तियों (नेहेअरे) के अतिरिक्त किसी भी कारक की विभक्ति प्रयुक्त होती है तथा विभक्तियों के अनुसार ही इसके उपभेद होते हैं।
जैसे 
(क) कर्म तत्पुरुष (को)
कृष्णार्पण = कृष्ण को अर्पण
नेत्र सुखद = नेत्रों को सुखद
वन-गमन = वन को गमन
जेब कतरा = जेब को कतरने वाला
प्राप्तोदक = उदक को प्राप्त
(ख) करण तत्पुरुष (से/के द्वारा)
ईश्वर-प्रदत्त = ईश्वर से प्रदत्त
हस्त-लिखित = हस्त (हाथ) से लिखित
तुलसीकृत = तुलसी द्वारा रचित
दयार्द्र = दया से आर्द्र
रत्न जडि़त = रत्नों से जडि़त
(ग) सम्प्रदान तत्पुरुष (के लिए)
हवन-सामग्री = हवन के लिए सामग्री
विद्यालय = विद्या के लिए आलय
गुरु-दक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
बलि-पशु = बलि के लिए पशु
(घ) अपादान तत्पुरुष (से पृथक्)
ऋण-मुक्त = ऋण से मुक्त
पदच्युत = पद से च्युत
मार्ग भ्रष्ट = मार्ग से भ्रष्ट
धर्म-विमुख = धर्म से विमुख
देश-निकाला = देश से निकाला
(च) सम्बन्ध तत्पुरुष (काकेकी)
मन्त्रि-परिषद् = मन्त्रियों की परिषद्
प्रेम-सागर = प्रेम का सागर
राजमाता = राजा की माता
अमचूर =आम का चूर्ण
रामचरित = राम का चरित
(छ) अधिकरण तत्पुरुष (मेंपेपर)
वनवास = वन में वास
जीवदया = जीवों पर दया
ध्यान-मग्न = ध्यान में मग्न
घुड़सवार = घोड़े पर सवार
घृतान्न = घी में पक्का अन्न
कवि पुंगव = कवियों में श्रेष्ठ
3. द्वन्द्व समास
(i)द्वन्द्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं।
(ii) दोनों पद प्रायः एक दूसरे के विलोम होते हैंसदैव नहीं।
(iii)इसका विग्रह करने पर और’, अथवा या’ का प्रयोग होता है।
माता-पिता = माता और पिता
दाल-रोटी = दाल और रोटी
पाप-पुण्य = पाप या पुण्य/पाप और पुण्य
अन्न-जल = अन्न और जल
जलवायु = जल और वायु
फल-फूल = फल और फूल
भला-बुरा = भला या बुरा
रुपया-पैसा = रुपया और पैसा
अपना-पराया = अपना या पराया
नील-लोहित = नीला और लोहित (लाल)
धर्माधर्म = धर्म या अधर्म
सुरासुर = सुर या असुर/सुर और असुर
शीतोष्ण = शीत या उष्ण
यशापयश = यश या अपयश
शीतातप = शीत या आतप
शस्त्रास्त्र = शस्त्र और अस्त्र
कृष्णार्जुन = कृष्ण और अर्जुन
4. बहुब्रीहि समास
(i)बहुब्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता।
(ii) इसमें प्रयुक्त पदों के सामान्य अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ की प्रधानता रहती है।
(iii)इसका विग्रह करने पर वालाहैजोजिसकाजिसकी,जिसकेवह आदि आते हैं।
गजानन = गज का आनन है जिसका वह (गणेश)
त्रिनेत्र = तीन नेत्र हैं जिसके वह (शिव)
चतुर्भुज = चार भुजाएँ हैं जिसकी वह (विष्णु)
षडानन = षट् (छः) आनन हैं जिसके वह (कार्तिकेय)
दशानन = दश आनन हैं जिसके वह (रावण)
घनश्याम = घन जैसा श्याम है जो वह (कृष्ण)
पीताम्बर = पीत अम्बर हैं जिसके वह (विष्णु)
चन्द्रचूड़ = चन्द्र चूड़ पर है जिसके वह
गिरिधर = गिरि को धारण करने वाला है जो वह
मुरारि = मुर का अरि है जो वह
आशुतोष = आशु (शीघ्र) प्रसन्न होता है जो वह
नीललोहित = नीला है लहू जिसका वह
वज्रपाणि = वज्र है पाणि में जिसके वह
सुग्रीव = सुन्दर है ग्रीवा जिसकी वह
मधुसूदन = मधु को मारने वाला है जो वह
आजानुबाहु = जानुओं (घुटनों) तक बाहुएँ हैं जिसकी वह
नीलकण्ठ = नीला कण्ठ है जिसका वह
महादेव = देवताओं में महान् है जो वह
मयूरवाहन = मयूर है वाहन जिसका वह
कमलनयन = कमल के समान नयन हैं जिसके वह
कनकटा = कटे हुए कान है जिसके वह
जलज = जल में जन्मने वाला है जो वह (कमल)
वाल्मीकि = वल्मीक से उत्पन्न है जो वह
दिगम्बर = दिशाएँ ही हैं जिसका अम्बर ऐसा वह
कुशाग्रबुद्धि = कुश के अग्रभाग के समान बुद्धि है जिसकी वह
मन्द बुद्धि = मन्द है बुद्धि जिसकी वह
जितेन्द्रिय = जीत ली हैं इन्द्रियाँ जिसने वह
चन्द्रमुखी = चन्द्रमा के समान मुखवाली है जो वह
अष्टाध्यायी = अष्ट अध्यायों की पुस्तक है जो वह
5. द्विगु समास
(i)द्विगु समास में प्रायः पूर्वपद संख्यावाचक होता है तो कभी-कभी परपद भी संख्यावाचक देखा जा सकता है।
(ii) द्विगु समास में प्रयुक्त संख्या किसी समूह का बोध कराती है अन्य अर्थ का नहींजैसा कि बहुब्रीहि समास में देखा है।
(iii)इसका विग्रह करने पर समूह’ या समाहार’ शब्द प्रयुक्त होता है।
दोराहा = दो राहों का समाहार
पक्षद्वय = दो पक्षों का समूह
सम्पादक द्वय = दो सम्पादकों का समूह
त्रिभुज = तीन भुजाओं का समाहार
त्रिलोक या त्रिलोकी = तीन लोकों का समाहार
त्रिरत्न = तीन रत्नों का समूह
संकलन-त्रय = तीन का समाहार
भुवन-त्रय = तीन भुवनों का समाहार
चैमासा/चतुर्मास = चार मासों का समाहार
चतुर्भुज = चार भुजाओं का समाहार (रेखीय आकृति)
चतुर्वर्ण = चार वर्णों का समाहार
पंचामृत = पाँच अमृतों का समाहार
पं चपात्र = पाँच पात्रों का समाहार
पंचवटी = पाँच वटों का समाहार
षड्भुज = षट् (छः) भुजाओं का समाहार
सप्ताह = सप्त अहों (सात दिनों) का समाहार
सतसई = सात सौ का समाहार
सप्तशती = सप्त शतकों का समाहार
सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह
अष्ट-सिद्धि = आठ सिद्धियों का समाहार
नवरत्न = नौ रत्नों का समूह
नवरात्र = नौ रात्रियों का समाहार
दशक = दश का समाहार
शतक = सौ का समाहार
शताब्दी = शत (सौ) अब्दों (वर्षों) का समाहार
6. कर्मधारय समास
(i)कर्मधारय समास में एक पद विशेषण होता है तो दूसरा पद विशेष्य।
(ii) इसमें कहीं कहीं उपमेय उपमान का सम्बन्ध होता है 
तथा विग्रह करने पर रूपी’ शब्द प्रयुक्त होता है 
पुरुषोत्तम = पुरुष जो उत्तम
नीलकमल = नीला जो कमल
महापुरुष = महान् है जो पुरुष
घन-श्याम = घन जैसा श्याम
पीताम्बर = पीत है जो अम्बर
महर्षि = महान् है जो ऋषि
नराधम = अधम है जो नर
अधमरा = आधा है जो मरा
रक्ताम्बर = रक्त के रंग का (लाल) जो अम्बर
कुमति = कुत्सित जो मति
कुपुत्र = कुत्सित जो पुत्र
दुष्कर्म = दूषित है जो कर्म
चरम-सीमा = चरम है जो सीमा
लाल-मिर्च = लाल है जो मिर्च
कृष्ण-पक्ष = कृष्ण (काला) है जो पक्ष
मन्द-बुद्धि = मन्द जो बुद्धि
शुभागमन = शुभ है जो आगमन
नीलोत्पल = नीला है जो उत्पल
मृग नयन = मृग के समान नयन
चन्द्र मुख = चन्द्र जैसा मुख
राजर्षि = जो राजा भी है और ऋषि भी
नरसिंह = जो नर भी है और सिंह भी
मुख-चन्द्र = मुख रूपी चन्द्रमा
वचनामृत = वचनरूपी अमृत
भव-सागर = भव रूपी सागर
चरण-कमल = चरण रूपी कमल
क्रोधाग्नि = क्रोध रूपी अग्नि
चरणारविन्द = चरण रूपी अरविन्द
विद्या-धन = विद्यारूपी धन
इति समास प्रकरणम्...!!

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