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रविवार, 30 जून 2019

ग़ज़ल "ग़ज़लियात-ए-रूप से एक नज़्म-कदम बढ़ायेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो भी आगे कदम बढ़ायेंगे।
फासलों को वही मिटायेंगे।।

 तुम हमें याद करोगे जब भी,
हम बिना पंख उड़ के आयेंगे।

    यही हसरत तो मुद्दतों से है,
हम तुम्हें हाल-ए-दिल सुनाएँगे। 

 ज़िन्दगी का यही फ़साना है,
कभी रोयेंगे, कभी गायेंगे।

 खामियाँ हैं, नसीहतें भी हैं,
आदतों में, सुधार लायेंगे।

 'रूप' और रंग तो दिखावा है,
प्यार से प्यार आज़मायेंगे।

शनिवार, 29 जून 2019

गीत "उड़नखटोला द्वार टिका है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आशा पर संसार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ ही वृक्ष लगाती,
आशाएँ विश्वास जगाती,
आशा पर परिवार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ श्रमदान कराती,
पत्थर को भगवान बनाती,
आशा पर उपहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशा यमुनाआशा गंगा,
आशाओं से चोला चंगा,
आशा पर उद्धार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाओं में बल ही बल है,
इनसे जीवन में हलचल है.
खान-पान आहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ हैंतो सपने है,
सपनों में बसते अपने हैं,
आशा पर व्यवहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाओं के रूप बहुत हैं,
शीतल छाया धूप बहुत है,
प्रीतरीतमनुहार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाएँ जब उठ जायेंगी,
दुनियादारी लुट जायेंगी,
उड़नखटोला द्वार टिका है।
आशाओं पर प्यार टिका है।।

शुक्रवार, 28 जून 2019

गीत "सम्बन्धों की परिभाषा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मानव दानव बन बैठा हैजग के झंझावातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

होड़ लगी आगे बढ़ने कीमची हुई आपा-धापी,
मुख में राम बगल में चाकूमनवा है कितना पापी,
दिवस-रैन उलझा रहता हैघातों में प्रतिघातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

जीने का अन्दाज जगत मेंकितना नया निराला है,
ठोकर पर ठोकर खाकर भीखुद को नही संभाला है,
ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकरलिपटा गन्दी बातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

मित्रपड़ोसीऔर भाईभाई के शोणित का प्यासा,
भूल चुके हैं सीधी-सादीसम्बन्धों की परिभाषा।
विष के पादप उगे बाग मेंजहर भरा है नातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

एक चमन में रहते-सहतेजटिल-कुटिल मतभेद हुए,
बाँट लिया गुलशन को लेकिन, दूर न मन के भेद हुए,
खेल रहे हैं ग्राहक बन करदुष्ट-बणिक के हाथों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

गुरुवार, 27 जून 2019

दोहे "लोग हुए उन्मुक्त" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
मानसरोवर में नहीं, दिखते हैं अब हंस।
ओढ़ लबादा कृष्ण का, घूम रहे हैं कंस।।

पुस्तक तक सीमित हुए, वेदों के सन्देश।
भारत का बदला हुआ, लगता है परिवेश।।

भावप्रवण अब हैं नहीं, चलचित्रों के गीत।
वाद्य यन्त्र हैं पश्चिमी, कर्कश है संगीत।।

गति-यति, तुक-लय का हुआ, बिल्कुल बेड़ा गर्क।।
कथित सुखनवर दे रहे, तथ्यहीन सब तर्क।।

काव्यशास्त्र का है नहीं, जिनको कुछ भी ज्ञान।
वो समझाते काव्य का, लोगों को विज्ञान।।

योगशास्त्र की है नहीं, जिनको जरा तमीज।
धर्मगुरू बनकर वही, बाँट रहे ताबीज।।

कैसा ये जनतन्त्र है, लोग हुए उन्मुक्त।
नगर गाँव-जंगल हुए, अब दूषण से युक्त।।

मंगलवार, 25 जून 2019

दोहे "धूप बहुत विकराल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

होती है बरसात की, धूप बहुत विकराल।
स्वेद पोंछते-पोंछते, गीला हुआ रुमाल।।

धूप-छाँव हैं खेलते, आँखमिचौली खेल।
सूरज-बादल का हुआ, नभ में अनुपम मेल।।

चौमासे में हो रहे, जगह-जगह सत्संग।
सब के मन को मोहते, इन्द्र धनुष के रंग।।

एला और लवंग के, बहुत निराले ढंग।
लहराती आकाश में, उड़ती हुई पतंग।।

पानी से लवरेज हैं, झील और तालाब।
उपवन में हंसने लगे, गेंदा और गुलाब।।

बादल फटे पहाड़ पर, प्रलय भरे हुंकार।
प्राण बचाने के लिए, मचती चीख-पुकार।।

फटते जब ज्वालामुखी, आते हैं भूचाल।
जीव-जन्तुओं पर तभी, मँडराता है काल।।

सोमवार, 24 जून 2019

दोहे "झरने करते शोर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
रिम-झिम बारिश पड़ रही, भीग रहे वन-बाग।
मौसम की बरसात से, खुश हो रहे तड़ाग।।

सड़कों में जल का जहाँ, होने लगा भराव।
कागज की बच्चे वहाँ, चला रहे हैं नाव।।

घन का गर्जन हो रहा, नभ में चारों ओर।
चातक दादुर-मोर के, मन में उठी हिलोर।।

शीतल मन्द-बयार से, छाया है आनन्द।
बारिश पड़ते ही हुए, कूलर-एसी बन्द।।

फसलों का बरसात से, है गहरा सम्बन्ध।
खेतों में उठने लगी, सोंधी-सोंधी गन्ध।।

इन्द्र देवता ने किया, धरती पर अहसान।
धान रोपने के लिए, अब चल पड़े किसान।।

नद-नाले उफना रहे, झरने करते शोर।
अबकी बार अषाढ़ में, बारिश है घनघोर।।
 

रविवार, 23 जून 2019

दोहे "श्यामल अब आकाश" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

नभ में बादल छा गये, गाओ राग मल्हार।
मानसून अब आ गया, पड़ने लगी फुहार।।

लोगों के अब हो गया, इन्तजार का अन्त।
आनन्दित होने लगे, निर्धन और महन्त।।

घनी घटाओं से हुआ, श्यामल अब आकाश।
सूरज ने भी ले लिया, अकस्मात अवकाश।।

चम-चम बिजली चमकती, बादल करते शोर।
लहराते हैं पेड सब, होकर भाव-विभोर।।

इन्द्र देवता ने दिया, खेतों को उपहार।
सूखी धरती की भरी, जल ने सभी दरार।।

नैसर्गिक सुख का हुआ, लोगों को आभास।
आमों में भी आ गयी, अब कुदरती मिठास।।

पहली बारिश से खुली, इन्तजाम की पोल।
जलभराव से नगर का, बदल गया भूगोल।।

शनिवार, 22 जून 2019

कूर्मा़ञ्चली कविता " म्यर इजा" (गरिमा दीपक पन्त)

गरिमा दीपक पन्त की कविता
पहाड़ी भाषा में
पहली बार कविता लिखने की कोशिश की है।
आप सभी का आशीर्वाद चाहूँगी।
-गरिमा दीपक पन्त
इजा भावना छि, अहसास छि,
इजा जीवन छि, अनमोल छि,
इजा नान्तिनक लिजी लोरी छि,
इजा अहसास छि,सुखद पलक्क
इजा भूमि जस्स छि
जैके कोई सीमा निछि ।
भूमि जस्स महान छि इजा
इजा झरना छि,मिठू- मिट्ठ पाणि छि।
इजा त्याग्क मूर्ति छि,
इजक कोई मोल निछि
इजा खुटमै स्वर्ग छैं
इजाक् उन खुटमै
म्यर कोटि-कोटि नमन छि।।

बालकविता "मत पंछी पिंजडे में धरना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तोता पेड़ों का बासिन्दा।
कहलाता आजाद परिन्दा।।

आसमान जिनका संसार।
वो ही उड़ते पंख पसार।।
जब कोई भी थक जाता है।
डाली पर वो सुस्ताता है।।

खाने का सामान धरा है।
पर मन में अवसाद भरा है।।
parrot_2
लोहे का हो या कंचन का।
बन्धन दोनों में जीवन का।।

अत्याचार कभी मत करना।
मत पंछी पिंजडे में धरना।।
tota
जेल नहीं होती सुखदायी।
कारावास बहुत दुखदायी।।

मत देना इसको अवसाद।
करना तोते को आज़ाद।।

शुक्रवार, 21 जून 2019

समर सलिल पत्रिका में "बिकती नहीं तमीज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वैसा ही पौधा उगे, जैसा बोते बीज। 
कहीं किसी भी हाट में, बिकती नहीं तमीज।

करके सभी प्रयास अब, लोग गये हैं हार।
काशी में अब भी बहे, पतित-पावनी धार।।

पूरी ताकत को लगा, चला रहे पतवार।
लेकिन नहीं विपक्ष की, नाव लग रही पार।।

कृपण बने खुद के लिए, किया महल तैयार।
अपशब्दों की वो करें, रोज-रोज बौछार।।

पूर्व जन्म में किसी का, खाया था जो कर्ज।
उसको सूद समेत अब, लौटाना है फर्ज।।

रखना नहीं दिमाग में, राजनीति में मैल।
खटते रहना रात-दिन, ज्यों कोल्हू का बैल।।

गुरुवार, 20 जून 2019

"छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


छोटे पुत्र विनीत का, जन्मदिवस है आज।
बादल नभ में खुशी से, बजा रहा है साज।।

पूरे किये विनीत ने, इकतालीस बसन्त।
खुशियाँ कुल परिवार में, पसरी हैं अत्यन्त।।

अपने-अपने ढंग से, लाये सब उपहार।
इस अवसर पर दे रहा, मैं तो प्यार अपार।।

मेरे कर्मों का दिया, प्रभु ने ये प्रतिदान।
पढ़-लिख करके बन गये, दोनों पुत्र महान।।

अनुकम्पा का ईश की, कैसे करूँ बखान।
सेवारत सरकार में, मेरी हैं सन्तान।।

इस पड़ाव में उमर के, नहीं मुझे कुछ चाह।
बस मुझको परिवार की, मिलती रहे पनाह।।

देता शुभ आशीष मैं, तुमको सौ-सौ बार।
रहना घर-परिवार में, बनकर सदा उदार।।

अभ्यागत के लिए तुम, बन्द न करना द्वार।
कभी किसी भी मोड़ पर, होना मत लाचार।।

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