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शनिवार, 24 जून 2017

बालकविता "बारिश आई अपने द्वारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रिमझिम-रिमझिम पड़ीं फुहारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।

तन-मन में थी भरी हताशा,
धरती का था आँचल प्यासा,
झुलस रहे थे पौधे प्यारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।

आँधी आई, बिजली कड़की,
जोर-जोर से छाती धड़की,
अँधियारे ने पाँव पसारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।

जल की मोटी बूँदें आयी,
शीतलता ने अलख जगाई,
खुशी मनाते बालक सारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।

अब मौसम हो गया सुहाना,
आम रसीले जमकर खाना,
पर्वत से बह निकले धारे।
बारिश आई अपने द्वारे।।

शुक्रवार, 23 जून 2017

कविता "चौमासा बारिश से होता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सावन सूखा बीत न जाये।
नभ की गागर रीत न जाये।।

कृषक-श्रमिक भी थे चिन्ताकुल।
धान बिना बारिश थे व्याकुल।। 

रूठ न जाये कहीं विधाता।
डर था सबको यही सताता।।

लेकिन बादल है घिर आया। 
घटाटोप अंधियारा छाया।। 
अम्बुआझार चली पुरवायी।
शायद बारिस की रुत आयी।।

बिजली कड़कीबादल गरजा।
सूरज का दिल भी है लरजा।। 

मोटी-मोटी बुन्दियाँ आयी।
लोगों के मन को अति भायी।।

पहली बारिश को पा करके।
नहा रहे बालक जी भरके।।

चौमासा बारिश से होता।
खेतीहर फसलों को बोता।।

वर्षा प्रतिदिन जल बरसाना।
बारिश मत धोखा दे जाना।।

बुधवार, 21 जून 2017

कविता "छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिन है,
इस अवसर पर मेरे कुछ उद्गार...
खाओ आज मिठाई जमकर,
जन्मदिवस है आज तुम्हारा।
महके-चहके जीवन बगिया,
आलोकित हो जीवन सारा।।
बाबा-दादी, स्वर्गलोक से,
सब देंगे अपना प्यार तुम्हें।
वर्षगाँठ है आज तुम्हारी,
सब देंगे उपहार तुम्हें।। 
मम्मी-पापा जी भरकर,
अपने आशीषों को देंगे।
बदले में अपनें बच्चों की,
मुस्कानों से मन भर लेंगे।।
केक सलोना आप काटना,
हमें खिलाना, खुद भी खाना।

खुशियाँ पसरेंगी आँगन में,
जन्मदिवस हर साल मनाना।।
प्राची के संग भाई प्राञ्जल,
देते तुमको आज बधाई।
इस पावन अवसर पर,
चाची ने भी खुशियाँ खूब मनाई।।

मंगलवार, 20 जून 2017

दोहागीत "बहुत जरूरी योग" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सुबह-शाम कर लीजिए, सच्चे मन से योग।
तन-मन को निर्मल करे, योग भगाए रोग।१।
--
दुनियाभर में बन गया, योग-दिवस इतिहास।
योगासन सब कीजिए, अवसर है यह खास।।
मानुष जन्म मिला हमें, करने को शुभकाम।
पापकर्म करके इसे, मत करना बदनाम।।
थोड़े से ही योग से, काया रहे निरोग।।
तन-मन को निर्मल करे, योग भगाए रोग।२।
--
सारे जग को दे दिया, हमने अब सन्देश।
हो जाता है योग से, निर्मल सब परिवेश।।
सरदी-गरमी हो भले, चाहे हो बरसात।
करना योग प्रचार को, देश-नगर देहात।।
भोगवाद के समय में, बहुत जरूरी योग।
तन-मन को निर्मल करे, योग भगाए रोग।३।
--
योग हमारा कर्म है, योग हमारा धर्म।
प्राणिमात्र कल्याण का, छिपा योग में मर्म।
गूँजा पूरे विश्व में, ऋषियों का पैगाम।
मन की मुक्त उड़ान पर, देता योग लगाम।।
सहययोग करना सदा, मत करना हठयोग।
तन-मन को निर्मल करे, योग भगाए रोग।४।
--
चहक जायेगा सुमन जब, महकेगा उद्यान।
वेदों ने हमको दिया, मन्त्रों में विज्ञान।।
जगतनियन्ता ईश ने, हमको दिया विधान।
जीवन जीने के लिए, राह चुनों आसान।।
दुनियादारी का करो, संयम से उपभोग।
तन-मन को निर्मल करे, योग भगाए रोग।५।

सोमवार, 19 जून 2017

दोहे "अपनायेंगे योग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

योग-ध्यान का दे दिया, अब जग को सन्देश।
विश्वगुरू कहलायगा, फिर से भारत देश।।
--
खुश होकर अपना लिया, सबने अपना योग।
भारत के पीछे चले, दुनियाभर के लोग।।
--
पातंजलि की राह पर, चलने लगा हुजूम।
रामदेव के योग की, दुनियाभर में धूम।।
--
ऋषि-मुनियों के योग से, होंगे सभी निरोग।
भोगवाद को छोड़कर, अपनायेंगे योग।।
--
भारत ने ही दिया था, अपना योग सुझाव।
राष्ट्रसंघ में हो गया, पारित यह प्रस्ताव।।
--
अल्प-अवधि में सभी ने, मान लिया अनुरोध।
नहीं किसी भी देश ने, इसका किया विरोध।।
--
पिछले दशकों में नहीं, जागी थी सरकार।
वर्तमान सरकार ने, किया सपन साकार।।
--
जैसे-जैसे आ रहा, योग-दिवस नज़दीक।
कट्टरपन्थी छोड़ कर, लोग हुए निर्भीक।।
--
योग-दिवस का बन गया, आज सुखद-संयोग।
सबको करना चाहिए, नित्य-नियम से योग।।

रविवार, 18 जून 2017

दोहे "पितृ-दिवस-पिता सबल आधार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


पूज्य पिता जी आपका
वन्दन शत्-शत् बार।
बिना आपके है नहीं
जीवन का आधार।।
--
बचपन मेरा खो गया
हुआ वृद्ध मैं आज।
सोच-समझकर अब मुझे, 
करने हैं सब काज।।
--
जब तक मेरे शीश पर
रहा आपका हाथ।
लेकिन अब आशीष का
छूट गया है साथ।।
--
तारतम्य टूटा हुआ, उलझ गये हैं तार।
कौन मुझे अब करेगा, पिता सरीखा प्यार।।
--
माँ ममता का रूप है, पिता सबल आधार।
मात-पिता सन्तान को, करते प्यार अपार।।
--
सूना सब संसार है, सूना घर का द्वार।
बिना पिता जी आपके, फीके सब त्यौहार।।
--
तात मुझे बल दीजिएउठा सकूँ मैं भार।
एक-नेक बनकर रहेमेरा ये परिवार।।
 

गीत "पल में तोला, पल में माशा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबका अपना-अपना होता,
जीने का अन्दाज़ निराला।
अक्षर-अक्षर मिलकर ही तो,
बनती है शब्दों की माला।।

भाषा-भूषा, प्रान्त-देश का,
सम्प्रदाय का झगड़ा छोड़ो,
जो सीधे-सच्चे मानव हैं,
उनसे अपना नाता जोड़ो,
नभ जब सूरज उगता है,
लाता अपने साथ उजाला।
अक्षर-अक्षर मिलकर ही तो,
बनती है शब्दों की माला।।

पल में तोला, पल में माशा,
कभी हताशा कभी निराशा,
मन है प्यासा पंछी जैसा,
जिसकी बुझती नहीं पिपासा,
कभी न भरता इसका प्याला।
अक्षर-अक्षर मिलकर ही तो,
बनती है शब्दों की माला।।

पहन हंस सा रूप सलोना,
लगता बिल्कुल सीधा-सादा,
छल-फरेब के इस मूरत का,
समझ न पाये लोग इरादा,
विषधर तो विषधर ही होता,
काला हो चाहे पनियाला।
अक्षर-अक्षर मिलकर ही तो,
बनती है शब्दों की माला।।

“रूप” रंग का भूखा भँवरा,
गुंजन करता उपवन-उपवन,
सुमनों की सुगन्ध पाने को,
डोल रहा है कानन-कानन,
नटखट-निडर, रसिक सन्यासी,
झूम रहा बनकर मतवाला।
अक्षर-अक्षर मिलकर ही तो,
बनती है शब्दों की माला।।

शनिवार, 17 जून 2017

"अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई की 159वीं पुण्यतिथि पर" (श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान)

अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की

159वीं पुण्यतिथि पर 
उन्हें अपने श्रद्धासुमन समर्पित करते हुए

श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की
यह अमर कविता सम्पूर्णरूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ!
सिंहासन हिल उठेराजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछीढालकृपाणकटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पायाशिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्यमुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हायविधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय-विनय नहीं सुनता हैविकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं-नब्वाबों के उसने पैरों को ठुकराया,
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी देहली कीलिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर मेंहुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुरतंजौरसताराकरनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंधपंजाबब्रह्म पर अभी हुआ था वज्रनिपात,
बंगालेमद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोई रनिवासों मेंबेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लोलखनऊ के लो नौलख हार,
यों परदे की इज्जत पर देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटिया में थी विषम वेदनामहलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में थाअपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधुंपंत-पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आगझोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरमन से आई थी,
झाँसी चेतीदिल्ली चेतीलखनउ लपटें छाई थीं,
मेरठकानपूरपटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुरकोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

नानाधुंधुंपंतताँतियाचतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह, मौलवीठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी वो कुर्बानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचाआगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच लीहुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आईकर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि परगया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दीकिया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिलीपर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख थाउसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
परपीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आयाथा यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ानया घोड़ा थाइतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरेहोने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधारचिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेजतेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र थी कुल तेईस कीमनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथसिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहासलगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजयमिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

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