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गुरुवार, 17 अगस्त 2017

कविता "सुख के सूरज से सजी धरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


तुम शब्दयुक्त हो छन्दमुक्त,
बहती हो निर्मल धारा सी।
तुम सरल-तरल अनुप्रासयुक्त,
हो रजत कणों की तारा सी।

आलेख पंक्तियाँ जोड़-तोड़कर
बन जाती हो गद्यगीत।
संयोग-वियोग, भक्ति रस से,
छलकाती हो तुम प्रीत-रीत।

उपवन में गन्ध तुम्हारी है,
कानन में है मृदुगान भरा।
लगती रजनी उजियारी सी,
सुख के सूरज से सजी धरा।

मेरे कोमल मन के नभ पर,
तुम अनायास छा जाती हो।
इतनी हो सुघड़-सलोनी सी,
सपनों में निशि-दिन आती हो।

तुम छन्द-काव्य से ओत-प्रोत,
कोमल भावों की रचना हो।
जिसमें अनुराग निहित मेरा,
वो सुरसवती सी रसना हो।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

गीत "स्वार्थ छलने लगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

करते-करते भजन, स्वार्थ छलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

झूमती घाटियों में, हवा बे-रहम
घूमती वादियों में, हया  बे-शरम
शीत में है तपन, हिम पिघलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे
फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे
गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

हो रहा हर जगह, धन से धन का मिलन
रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन,  
नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।  
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

गीतिका "आजादी की वर्षगाँठ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चौमासे में श्याम घटा जब आसमान पर छाती है।
आजादी के उत्सव की वो मुझको याद दिलाती है।।

देख फुहारों को उगते हैं, मेरे अन्तस में अक्षर,
इनसे ही कुछ शब्द बनाकर तुकबन्दी हो जाती है।

खुली हवा में साँस ले रहे हम जिनके बलिदानों से,
उन वीरों की गौरवगाथा, मन में जोश जगाती है।

लाठी-गोली खाकर, कारावास जिन्होंने झेला था,
वो पुख़्ता बुनियाद हमारी आजादी की थाती है।

खोल पुरानी पोथी-पत्री, भारत का इतिहास पढ़ो,
यातनाओं के मंजर पढ़कर, छाती फटती जाती है।

आओ अमर शहीदों का, हम प्रतिदिन वन्दन-नमन करें,
आजादी की वर्षगाँठ तो, एक साल में आती है।

दोहे "आजादी का जश्न" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डरा रही नर-नार को, बन्दूकों की छाँव।
नहीं सुरक्षित अब रहे, सीमाओं पर गाँव।।
--
देख दुर्दशा गाँव की, मन में बहुत मलाल।
विद्यालय जाँये भला, कैसे अपने बाल।।
--
आजादी के जश्न को, मना रहा है देश।
लेकिन मेरे गाँव का, बिगड़ रहा परिवेश।।
--
फसलें भी चौपट हुईं, खेत बने शमसान।
गोलों की बौछार से, सहमा हुआ किसान।।
--
मनमोहन-मनमौन थे, मोदी हैं खामोश।
भारत की सरकार को, कब आयेगा होश।।
--
ऐसी हालत देख कर, आजादी भी रोय।
आतंकी घुसपैठ पर, कैसे काबू होय।।
--
भरे पड़ें है देश में, कितने गुरू-कसाब।
फाँसी देकर कीजिए, उनका जल्द हिसाब।।
--
नक्शे पर से मेटिये, पाक नाम का देश।
गूँज रहा है गगन में, जन-गण का सन्देश।।

सोमवार, 14 अगस्त 2017

देशभक्तिगीत "भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आप सबको स्वतन्त्रता-दिवस की
हार्दिक शुभकामनाएँ।
--
"मुझको प्राणों से प्यारा है अपना वतन"
जिसकी माटी में चहका हुआ है सुमन,
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।
जिसकी घाटी में महका हुआ है पवन,
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।

जिसके उत्तर में अविचल हिमालय खड़ा,
और दक्षिण में फैला है सागर बड़ा.
नीर से सींचती गंगा-यमुना चमन।
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।।

वेदकुरआन-बाइबिल का पैगाम है,
ज़िन्दगी प्यार का दूसरा नाम है,
कामना है यही हो जगत में अमन।
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।।

सिंह के दाँत गिनता, जहाँ पर भरत,
धन्य आजाद हैं और विस्मिल-भगत,
प्राण आहूत करके किया था हवन।
मुझको प्राणों से प्यारा है अपना वतन।।

यह धरा देवताओं की जननी रही,
धर्मनिरपेक्ष दुनिया में है ये मही,
अपने भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन।
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।।

रविवार, 13 अगस्त 2017

दोहागीत "कमा रहे हैं माल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


तन के उजले मन के गन्दे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

शब्दकोश तक रह गयाअब तो जग में प्यार।
अपने सुख के ही लिएकरते सब व्यापार।।
भोग-विलासों में सब अन्धे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

मतलब में पहचानतेकरते प्यार-अपार।
हित-साधन के बाद मेंदेते हैं दुत्कार।।
निशिदिन फेंक रहे हैं फन्दे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

ग्राम-नगरपरदेश मेंफैला इनका जाल।
कुटिलचाल चलते हुएकमा रहे है माल।।
दुनिया भर में फैले धन्धे।
कितने बदल गये हैं बन्दे।।

शनिवार, 12 अगस्त 2017

गीत "फटी घाघरा-चोली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहाँ खो गई मीठी-मीठी इन्सानों की बोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

कहाँ गयीं मधुरस में भीगी निश्छल वो मुस्कानें,
कहाँ गये वो देशप्रेम से सिंचित मधुर तराने,
किसकी कारा में बन्दी है सोनचिरैया भोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

लुप्त कहाँ हो गया वेद की श्रुतियों का उद्-गाता,
कहाँ खो गया गुरू-शिष्य का प्यारा-पावन नाता,
ढोंगी-भगत लिए फिरते क्यों चिमटा-डण्डा-झोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

मक्कारों को दूध-मलाई मिलता घेवर-फेना,
भूखे मरते हैं सन्यासी, मिलता नहीं चबेना,
सत्याग्रह पर बरसाई जाती क्यों लाठी-गोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

लोकतन्त्र में राजतन्त्र की क्यों फैली है छाया,
पाँच साल में जननायक ने कैसे द्रव्य कमाया,
धरती की बेटी की क्यों है फटी घाघरा-चोली।
किसने नदियों की धारा में विष की बूटी घोली।।

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

कविता ''धान खेत में लहराते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



कई दिनों से नभ में,
बादल ने डाला है डेरा।
सूरज मना रहा है छुट्टी,
दिन में हुआ अन्धेरा।।
हरियाली बिखरी धरती पर,
दादुर गाते गान मधुर।
शाम ढली तो सन्नाटे को,
चीर रहा झींगुर का सुर।
आसमान का पानी पीकर,
धान खेत में लहराते।
काफल-सेब, खुमानी-आड़ू,
छटा अनोखी दिखलाते।
बाहर पानी-भीतर पानी,
पानी की है ग़जब रवानी।
इठलाती-बलखाती आयी,
नद-नालों में नई जवानी।
बरस रहा चौमास झमाझम,
बारिश में मत जाओ।
आलू, प्याज और बैंगन के,
गरम पकौड़े खाओ।
 
पढ़कर के अख़बार, आओ
काग़ज़ की नाव बनायें।
गड्ढों के ठहरे पानी में,
अपनी नौका तैरायें।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

ग़ज़ल "हम तुम्हें हाल-ए-दिल सुनाएँगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जो भी आगे कदम बढ़ायेंगे।
फासलों को वही मिटायेंगे।।
 तुम हमें याद करोगे जब भी,
हम बिना पंख उड़ के आयेंगे।
    यही हसरत तो मुद्दतों से है,
हम तुम्हें हाल-ए-दिल सुनाएँगे। 
 ज़िन्दगी का यही फ़साना है,
कभी रोयेंगे कभी गायेंगे।
 खामियाँ हैं, नसीहतें भी हैं,
गल्तियों से, सुधार लायेंगे।
 रूप और रंग तो दिखावा है,
प्यार से प्यार आज़मायेंगे।

बुधवार, 9 अगस्त 2017

दोहे "समय-समय का फेर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मिट्टी को कंचन करे, नहीं लगाता देर।
दिखा रहा है आइनासमय-समय का फेर।१।

समय-समय की बात हैसमय-समय के ढंग।
जग में होते समय केअलग-अलग ही रंग।२।

पल-पल में है बदलतासरल कभी है वक्र।
रुकता-थकता है नहींकभी समय का चक्र।३।

समय न करता है दयाजब अपनी पर आय।
ज्ञानी-ध्यानी-बली कोदेता धूल चटाय।४।

गया समय आता नहींकरनी को कर आज।
मत कर सोच-विचार तूकरले अपने काज।५।

जीवन के अध्याय में, समय न होता मीत।
दुनियाभर में समय की, होती अपनी रीत।६।

देख रहा है मनुज सब, होकर लापरवाह।
लेकिन चाहत की सदा, बढ़ती जाती चाह।७।

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

देशभक्तिगीत "अपना वतन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिसकी माटी में चहका हुआ है सुमन,
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।
जिसकी घाटी में महका हुआ है पवन,
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।

जिसके उत्तर में अविचल हिमालय खड़ा,
और दक्षिण में फैला है सागर बड़ा.
नीर से सींचती गंगा-यमुना चमन।
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।।

वेदकुरआन-बाइबिल का पैगाम है,
ज़िन्दगी प्यार का दूसरा नाम है,
कामना है यही हो जगत में अमन।
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।।

सिंह के दाँत गिनता, जहाँ पर भरत,
धन्य आजाद हैं और विस्मिल-भगत,
प्राण आहूत करके किया था हवन।
मुझको प्राणों से प्यारा है अपना वतन।।

यह धरा देवताओं की जननी रही,
धर्मनिरपेक्ष दुनिया में है ये मही,
अपने भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन।
मुझको प्राणों से प्यारा वो अपना वतन।।

सोमवार, 7 अगस्त 2017

गीत "भाई-बहन का प्यार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हरियाला सावन ले आया, नेह भरा उपहार।
कितना पावन, कितना निश्छल राखी का त्यौहार।।

यही कामना करती मन में, गूँजे घर में शहनाई,
खुद चलकर बहना के द्वारे, आये उसका भाई,
कच्चे धागों में उमड़ा है भाई-बहन का प्यार।
कितना पावन, कितना निश्छल राखी का त्यौहार।।

तिलक लगाती और खिलाती, उसको स्वयं मिठाई,
आज किसी के भइया की, ना सूनी रहे कलाई,
भाई के ही कन्धों पर, होता रक्षा का भार।
कितना पावन, कितना निश्छल राखी का त्यौहार।।

पौध धान के जैसी बिटिया, बढ़ी कहीं पर-कहीं पली,
बाबुल के अँगने को तजकर, अन्जाने के संग चली,
रस्म-रिवाज़ों ने खोला है, नूतन घर का द्वार।
कितना पावन, कितना निश्छल राखी का त्यौहार।।

रखती दोनों घर की लज्जा, सदा निभाती नाता,
राखी-भइयादूज, बहन-बेटी की याद दिलाता,
भइया मुझको भूल न जाना, विनती बारम्बार।
कितना पावन, कितना निश्छल राखी का त्यौहार।।

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