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रविवार, 10 दिसंबर 2017

दोहे "गरम-गरम ही चाय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

धूप नहीं नभ में खिली, अंग ठिठुरता जाय।
सरदी में अच्छी लगे, गरम-गरम ही चाय।१।
आग सेंकने का चढ़ा, देखो कैसा चाव।
सरदी में अच्छा लगे, जलता हुआ अलाव।२।
ठिठुरन से जमने लगा, सारे तन का खून।
शीतल ऋतु में आग से, मिलता बहुत सुकून।३।
 
बच्चे-बूढ़े आग को, सेंक रहे हैं आज।
भीषण शीत-प्रकोप से, ठिठुरा सकल समाज।४।
पहरा देते रातभर, कभी न मानें हार। 
आग सेंकने आ गये, मेरे पहरेदार।५।

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

दोहे "प्यार नहीं व्यापार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जीवन के पथ में मिले, जाने कितने मोड़।
लेकिन मैं सीधा चला, मोड़ दिये सब छोड़।। 

पग-पग पर मिलते रहे, मुझको झंझावात।
शह पर शह पड़ती रहीं, मगर न खाई मात।।

मैं आगे बढ़ता गया, भले लक्ष्य हो दूर।
कभी उमर के सामने, नहीं हुआ मजबूर।।

साधक कभी न हारता, साधन जाता हार।
सच्ची निष्ठा से मिलें, जीवन में उपहार।।

प्यार दिलों का मेल है, प्यार नहीं व्यापार।
ढोंगी का टिकता नहीं, अधिक दिनों तक प्यार।।

सम्बन्धों की नाव पर, है संसार सवार।
ममता-माया-मोह हैं, जीवन के आधार।।

लगे हमारे देश में, रोटी के उद्योग।
आते टुकड़े बीनने, यहाँ विदेशी लोग।।



गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

"मा.मुख्यमन्त्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत द्वारा मेरी दो पुस्तकों का विमोचन"

उत्तराखण्ड के मा.मुख्यमन्त्री
श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने
मेरी दो पुस्तकों
ग़ज़लियात-ए-रूप 
 तथा 
स्मृति उपवन
का विमोचन किया।
      (6 दिसम्बर, 2017) सौ बिस्तरों वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, खटीमा के लोकार्पण के अवसर  पर पधारे उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमन्त्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने खटीमा के कवि डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक की दो पुस्तकों ग़ज़लियात-ए-रूप तथा स्मृति उपवन भी विमोचन किया। 
     इस अवसर पर नैनीताल-ऊधमसिंहनगर के सांसद मा.भगत सिंह कोश्यारी, खटीमा के विधायक मा. पुष्कर सिंह धामी, नानकमत्ता के विधायक मा. डॉ. प्रेम सिंह राणा,  उत्तराखण्ड राज्य सहकारी बैंक के अध्यक्ष मा. दानसिंह रावत, जिलापंचायत ऊधमसिंहनगर के अध्यक्ष मा. ईश्वरी प्रसाद गंगवार, खटीमा फाइबर्स के सी.एम.डी. डॉ. राकेश चन्द्र रस्तोगी तथा भा.ज.पा. के समस्त पदाधिकारियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। 
       विदित हो कि खटीमा के कवि रूपचन्द्र शास्त्री की अब तक आठ पुस्तकें सुख का सूरज, नन्हे सुमन, धरा के रंग, हँसता गाता बचपन, कदम-कदम पर घास, खिली रूप की धूप, स्मृति सुमन और गजलियात-ए-रूप प्रकाशित हो चुकीं हैं और गत वर्ष इनको दिल्ली में दोहों में कबीर सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है। माननीय मुख्यमन्त्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने डॉ. शास्त्री को देहरादून आने का आग्रह किया और इनके लेखन की भूरि-भूरि सराहना की।
इस अवसर पर खींचे गये 
कुछ चित्रों की झलक देखिए-








 

दोहे "महँगा आलू-प्याज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहरे ने सूरज ढकाथर-थर काँपे देह।
पर्वत पर हिमपात है, नहीं बरसता मेह।।
--
ऊनी कपड़े पहनकरमिलता है आराम।
बच्चे-बूढ़े ढक रहेअपनी-अपनी चाम।।
--
ख़ास मजे को लूटतेव्याकुल होते आम।
मूँगफली मेवा समझखाते सुबहो-शाम।।
--
आज घरेलू गैस केबढ़े हुए हैं भाव।
लकड़ी मिलती हैं नहींकैसे जले अलाव।।
--
हाड़ काँपता शीत सेठिठुरा देश-समाज।
गीजर-हीटर क्या करेंबिन बिजली के आज।।
--
बाजारों में हो गया, महँगा आलू-प्याज।
खाये-आलू प्याज कोकैसे निर्धन आज।।
--
गुणवानों की जेब मेंकौड़ी नहीं छदाम।
कंगाली में हो रहापरमारथ का काम।।
--
कविता लिखकर हो गयाजीवन मटियामेट।
दोहे लिखने से नहींभरता पापी पेट।।
--
कलमकार रचना करेंसन्त करें उपदेश।
आपस में मिल कर रहेंये देते सन्देश।।
  

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

अकविता "सर्दी में कम्पन, गर्मी में स्वेदकण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुहासे की चादर
मौसम ने ओढ़ ली,
ठिठुरन से मित्रता,
भास्कर ने जोड़ ली। 

निर्धनता खोज रही,
आग के अलाव,
ईंधन के बढ़ गये
ऐसे में भाव।

हो रहा खुलेआम,
जंगलों का दोहन,
खेतों में पनप रहे
कंकरीट के वन। 

ठण्ड से काँप रहा,
कोमल बदन,
कूड़े से पन्नियाँ,
बीन रहा बचपन।

खोज रहा नौनिहाल,
कचरे में रोटियाँ,
शासन नोच रहा,
गोश्त और बोटियाँ।
उदर में जल रही,
भूख की ज्वाल,
निर्धन के पेट में,
अन्न का अकाल।

कुहरा तो एक दिन,
छँट ही जायेगा.
उसके बाद सूरज भी,
गर्मी दिखायेगा।

सर्दी में कम्पन,
गर्मी में स्वेदकण,
दूषित हुआ है,
सारा वातावरण।

जिन्दगी में सब कुछ,
झेलना जरूरी है.
नूनतेल-आटा,
लाना मजबूरी है।।

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

दोहा गीत "पैंतालिसवीं वैवाहिक वर्षगाँठ"


मृग छौने की चाल अब, हुई बैल की चाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।।
--
जीवन के संग्राम में, किया बहुत संघर्ष।
वैवाहिक जीवन हुआ, आज चवालिस वर्ष।
पात्र देख कर शिष्य को, ज्ञानी देता ज्ञान।
श्रम-सेवा परमार्थ से, मिलता जग में मान।।
जो है सरल सुभाव का, वो ही है खुशहाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
सजनी घर के काम में, बँटा रही है हाथ।
चैन-अमन से कट रहा, जीवन उसके साथ।।
अपने-अपने क्षेत्र में, करते सब उद्योग।
पुत्र-पौत्र-बहुएँ सभी, करती हैं सहयोग।।
अब जीवन-संगीत में, मिले हुए सुर-ताल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
सरल-तरल है जिन्दगी, बहती सुख की धार।
एक नेक मुझको मिला, सुन्दर सा परिवार।।
होते रहते हैं कभी, आपस में मतभेद।
लेकिन घरवाले नहीं, रखते हैं मनभेद।।
हल कर देता है समय, सारे कठिन सवाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।
--
जीवन के पथ में भरे, कदम-कदम पर मोड़।
जिस पथ से मंजिल मिले, कभी न उसको छोड़।।
बैठे गंगा घाट पर, सन्त और शैतान।
देना सदा सुपात्र को, धन में से कुछ दान।।
करके दान कुपात्र को, होता बहुत मलाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

बालगीत "ऋतुएँ तो हैं आनी जानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

कुहरा करता है मनमानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।।
  
नभ में धुआँ-धुआँ सा छाया,
शीतलता ने असर दिखाया,
काँप रही है थर-थर काया,
हीटर-गीजर शुरू हो गये,
नहीं सुहाता ठण्डा पानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।। 

बालक विद्यालय को जाते,
कभी न मौसम से घबराते,
 पढ़कर सब काबिल बन पाते,
करो साधना सच्चे मन से,
कहलाओगे ज्ञानी-ध्यानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।। 

कहता पापी पेट हमारा,
बिना कमाए नही गुजारा,
नहीं काम बिन कोई चारा,
श्रम करने से जी न चुराओ,
ऋतुएँ तो हैं आनी जानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।।


चूल्हे और अलाव जलाओ,
गर्म-गर्म भोजन को खाओ,
काम समय पर सब निबटाओ,
खाना-सोना और कमाना,
जीवन की है यही कहानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।।

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

गीत "बहुत अच्छा लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


शिष्ट मधुर
 व्यवहार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

फूहड़पन के वस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
जंग लगे से शस्त्र, बुरे सबको लगते हैं,
स्वाभाविक श्रंगार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

वचनों से कंगाल, बुरे सबको लगते हैं,
जीवन के जंजाल, बुरे सबको लगते हैं,
सजा हुआ घर-बार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

चुगलखोर इन्सान, बुरे सबको लगते हैं,
सूदखोर शैतान, बुरे सबको लगते हैं,
सज्जन का सत्कार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

लुटे-पिटे दरबार, बुरे सबको लगते हैं,
दुःखों के अम्बार, बुरे सबको लगते हैं,
हरा-भरा परिवार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

मतलब वाले यार, बुरे सबको लगते हैं,
चुभने वाले खार, बुरे सबको लगते हैं,
निश्छल सच्चा प्यार, बहुत अच्छा लगता है।
सपनों का संसार, बहुत अच्छा लगता है।।

बालकविता "गिलहरी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 "गिलहरी"
बैठ मजे से मेरी छत पर,
दाना-दुनका खाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
तुमको पास बुलाने को,
मैं मूँगफली दिखलाता हूँ,
कट्टो-कट्टो कहकर तुमको,
जब आवाज लगाता हूँ,
कुट-कुट करती हुई तभी तुम,
जल्दी से आ जाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
नाम गिलहरी, बहुत छरहरी,
आँखों में चंचलता है,
अंग मर्मरी, रंग सुनहरी,
मन में भरी चपलता है,
हाथों में सामग्री लेकर,
बड़े चाव से खाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
पेड़ों की कोटर में बैठी
धूप गुनगुनी सेंक रही हो,
कुछ अपनी ही धुन में ऐंठी
टुकर-टुकरकर देख रही हो,
भागो-दौड़ो आलस छोड़ो,
सीख हमें सिखलाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!! 

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