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रविवार, 30 अप्रैल 2017

दोहे "मुखपोथी से प्यार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

टिप्पणियाँ मिलती नहीं, ब्लॉग बन गया भार।
लोगों को अब हो गया, मुखपोथी से प्यार।।
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जालजगत पर बन गये, रावण भी रघुराज।
मुखपोथी पर जम गये, नौसिखिए कविराज।।
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जिनको छन्दविधान की, कोई नहीं तमीज।
वो भी अब लिखने लगे, कविता जैसी चीज।।
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वाह-वाह सुनकर यहाँ, मिलता बड़ा सुकून।
अधिक प्रशंसा का नहीं, ज्ञात उन्हें मजमून।।
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सारहीन वो टिप्पणी, जिसमें मिलती वाह।
सारयुक्त होती वही, जो करती आगाह।।
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कड़ुआ खा थू-थू करें, मीठा करते गप्प।
अधिक मधुर रस को यहाँ, करो न भइया हप्प।।
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ज्यादा मीठे माल से, हो जाता मधुमेह।
कभी-कभी तो चाटिए, कुछ तीखा अवलेह।।

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

दोहे "बित्ते भर की जीभ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


समझदार होती अगर, मुख में घिरी जबान।
करते बत्तीस दाँत क्यों, रखवाली दरबान।।
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अगर लगाई जीभ पर, मन ने नहीं लगाम।
उलटी-ओछी बात से, मच जाता कुहराम।।
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रसना तो रस के लिए, कर देती मजबूर।
वाणी के ही घाव का, बन जाता नासूर।।
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जिसने जग में कर लिया, वाणी पर अधिकार।
कर लेंगे उसको सभी, मन से अंगीकार।।
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बित्ते भर की जीभ से, अपने बनते गैर।
बिना मोल बिन भाव के, हो जाता है बैर।।
--
कोमल है जब जीभ तो, बोलो कोमल बोल।
सम्बन्धों के खेल में, वाणी है अनमोल।।
--
रसना में जिनके नहीं, रस का हो सम्बन्ध।
कुसुम काग़ज़ी हों अगर, कैसे आये गन्ध।।
  

अकविता "पिघलते रहेंगे चेहरे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

धूप के संसार में
लोग
मोम जैसे बन गये हैं,
चेहरे,
सुबह को कुछ और है,
परन्तु
शाम तक,
पिघल जाते हैं
और
बदसूरत होकर
वह
अपना रूप,
आकृति
सब कुछ बदल लेते हैं
बस यही तो खेल है
ज़िन्दग़ी का
बचपन के बाद यौवन
यौवन के बाद बुढ़ापा
और उसके बाद मौत
और मौत के बाद
सब कुछ खत्म...
आदि काल से ही
चलती रही है
कभी नहीं रुकेगी
यह परम्परा
आती रहेगी धूप
पिघलते रहेंगे चेहरे...

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

मेरा एक पुराना गीत "चाँद बने बैठे चेले हैं"

सुख के बादल कभी न बरसे,
दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

अनजाने से अपने लगते,
बेगाने से सपने लगते,
जिनको पाक-साफ समझा था,
उनके ही अन्तस् मैले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

बन्धक आजादी खादी में,
संसद शामिल बर्बादी में,
बलिदानों की बलिवेदी पर,
लगते कहीं नही मेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

दोहे "मोह हो गया भंग" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिल्ली के सुलतान को, शायद आया होश।
गजभर लम्बी जीभ अब, बिल्कुल है खामोश।।
--
दिल्ली वालों ने किया, नहीं आप को माफ।
नगरनिगम के क्षेत्र में, किया सूपड़ा साफ।।
--
खिला कमल फिर से वहाँ, गयीं झाड़ुएँ हार।
धीरे-धीरे आप का, खिसक रहा आधार।।
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कथनी-करनी में दिखा, अलग-अलग जब रंग।
जनता का तब आप से, मोह हो गया भंग।।
--
हाँडी माटी की चले, और काठ की नाव।
देश-काल अनुसार ही, होता अलग चुनाव।।
--
टकरा कर पाषाण से, देख लिया परिणाम।
शीश नवा कर कीजिए, प्रभु को सदा प्रणाम।।
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अन्ना जी की आड़ ले, बनने चले कबीर।
ज्यादा दिन चलते नहीं, जग में नाटकवीर।।
   

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

दोहे "मेहनत की पतवार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खाली कभी न बैठिए, करते रहिए काम।
लिखने-पढ़ने से सदा, होगा जग में नाम।।
--
खाली रहे दिमाग तो, मन में चढ़े फितूर।
खुराफात इंसान को, कर देती मग़रूर।।
--
करे किनारा सुजन जब, मिट जाते सम्बन्ध।
दुनियादारी में धरे, रह जाते अनुबन्ध।।
--
नहीं कभी अभिमान से, बनती कोई बात।
ज्ञानी-सन्त-महन्त की, मिट जाती औकात।।
--
धन-दौलत-सौन्दर्य पर, मत करना अभिमान।
सेवा करके गुरू की, माँग लीजिए ज्ञान।।
--
गुरू चाहता शिष्य से, इतना ही प्रतिदान।
जीवनभर करता रहे, चेला उसका मान।।
--
मन में रहे उदारता, आदर के हों भाव।
मेहनत की पतवार से, पार लगेगी नाव।।
  

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

"ग़ज़ल हो गयी क्या" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ज़ज़्बात के बिन, ग़ज़ल हो गयी क्या
बिना दिल के पिघले, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई मक़सद, नहीं सिलसिला है
बिना बात के ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई कासिद, नहीं कोई चिठिया
बिना कुछ लिखे ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

जरूरत के पाबन्द हैं, लोग अब तो
बिना दिल मिले ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

नज़र वो नहीं है, नज़ारे नहीं हैं
तन्हाइयों में, ग़ज़ल हो गयी क्या

नहीं कोई माशूक, आशिक नहीं है
तआरुफ़ बिना ही, ग़ज़ल हो गयी क्या

हुनर की जरूरत, न सीरत से मतलब
महज रूप से ही, ग़ज़ल हो गयी क्या 

गीत "अमलतास के झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अमलतास के पीले गजरेझूमर से लहराते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

ये मौसम की मार, हमेशा खुश हो कर सहते हैं,
दोपहरी में क्लान्त पथिक को, छाया देते रहते हैं,
सूरज की भट्टी में तपकर, कंचन से हो जाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

उछल-कूद करते मस्ती में, गिरगिट और गिलहरी भी,
वासन्ती आभास कराती, गरमी की दोपहरी भी,
प्यारे-प्यारे सुमन प्यार से, आपस में बतियाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

लुभा रहे सबके मन को, जो आभूषण तुमने पहने,
अमलतास तुम धन्य, तुम्हें कुदरत ने बख्शे हैं गहने,
सड़क किनारे खड़े तपस्वी, अभिनव “रूप” दिखाते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

दोहे "बत्ती नीली-लाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नहीं मिलेगी किसी को, बत्ती नीली-लाल।
अफसरशाही को हुआ, इसका बहुत मलाल।।
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लाल बत्तियों पर लगी, अब भगवा की रोक।।
सत्ता भोग-विलास में, छाया भारी शोक।।
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लालबत्तियाँ पूछतीं, शासन से ये राज़।
इतने दशकों बाद क्यों, गिरी अचानक ग़ाज़।।
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नेताओं का पड़ गया, चेहरा आज सफेद।
पलक झपकते मिट गया, आम-खास का भेद।।
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देखे कब तक चलेगा, यह शाही फरमान।
दशकों की जागीर का, लुटा आज अभिमान।।
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समय-समय की बात है, समय-समय का फेर।
नहीं मिलेगी भोज में, तीतर और बटेर।।
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अच्छा है यह फैसला, भले हुई हो देर।
एक घाट पर पियेंगे, पानी, बकरी-शेर।।
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भारी मन से हो रहा, निर्णय यह स्वीकार।
सजी-धजी इस कार का, उजड़ गया सिंगार।।

दोहे "पुस्तक-दिन हो सार्थक, ऐसा करो उपाय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पढ़े-लिखे करते नहीं, पुस्+तक से सम्वाद।
इसीलिए पुस्+तक-दिवस, नहीं किसी को याद।।
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पुस्+तक उपयोगी नहीं, बस्ते का है भार।
बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।।
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अभिरुचियाँ समझे बिना, पौध रहे हैं रोप।
नन्हे मन पर शान से, देते कुण्ठा थोप।।
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बालक की रुचियाँ समझ, देते नहीं सुझाव।
बेमतलब की पुस्+तकें, भर देंगी उलझाव।।
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शिक्षामन्त्री हो जहाँ, शिक्षा से भी न्यून।
कैसे हों लागू वहाँ, हितकारी कानून।।
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पाठक-पुस् तक में हमें, करना होगा न्याय।
पुस्+तक-दिन हो सार्थक, ऐसा करो उपाय।।

कुण्डलियाँ "कम्प्यूटर और जालजगत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कम्प्यूटर और इण्टरनेट 
(चार कुण्डलियाँ)
(१)
जालजगत है देवताकम्प्यूटर भगवान।
शोभा है यह मेज कीऑफिस की है शान।।
ऑफिस की है शानबनाता अनुबन्धों को।
सारे जग में सदाबढ़ाता सम्बन्धों को।।
कह मयंक कविरायअनागत ही आगत है।
सबसे ज्ञानी अब दुनिया में जालजगत है।।

(२)
कम्प्यूटर अब बन गयाजीवन का आधार।
इसके बिन चलता नहीचिट्ठों का व्यापार।।
चिट्ठों का व्यापारलेख-रचना का आँगन।
चिट्ठी-पत्रीबातचीत का, है यह साधन।।
कह मयंक कविराययही है उन्नत ट्यूटर।
खाता-बही हटायलगाओ अब कम्प्यूटर।।
(३)
चिट्ठाकारी को लगाबेनामी का रोग।
टिप्पणियों को दानकरदेते मोहन भोग।।
देते मोहन भोगसृजन का लक्ष यही है। 

सन्देशों में अपनेपन का, पक्ष नहीं है।। 
कह मयंक हथियार बिना है मारामारी।
टिपियाने का नामआज है चिट्ठाकारी।।

(४)
झूठी सुन तारीफ कोमन ही मन हर्षाय।
जब सुनते आलोचनाहृदय कुन्द हो जाए।।
हृदय कुन्द हो जायविरोधी बन जाते हैं।
खुदगर्जीँ में सच कोसहन न कर पाते हैं।।
मुखपोथी(FACEBOOK) की दुनिया, होती बहुत अनूठी।
हर्षित होते लोगप्रशंसा सुन कर झूठी।।

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