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सोमवार, 30 नवंबर 2020

गीत "रो रहा समृद्धशाली व्याकरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सभ्यताशालीनता के गाँव में,
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
कर्णधारों की कुटिलता देखकर,
देश का दूषित हुआ वातावरण।
--
सुर हुए गायबमृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान कीसम्मान में,
आब खोता जा रहा अन्तःकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
--
शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
--
लग रहे घट हैं भरेपर रिक्त हैं,
लूटने में राज कोसब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ है आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
--

रविवार, 29 नवंबर 2020

दोहे "देव दिवाली पर्व" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दीपों का त्यौहार है, देव दिवाली पर्व।

परम्परा पर देश की, हम सबको है गर्व।।

--

गुरु नानक का जन्मदिन, देता है सन्देश।
जीवन में धारण करो, सन्तों के उपदेश।।
--
गुरू पूर्णिमा पर्व पर, खुद को करो पवित्र।
मेले में जाना नहीं, घर में रहना मित्र।।
--
कोरोना के काल में, मन हो रहा उचाट।
सरिताओं के आज हैं, सूने-सूने घाट।।
--
गंगा के तट पर नहीं, आज लगाना भीड़।
नहीं बनाना घाट पर, पटकुटियों के नीड़।।
--
कहता है इस साल तो, हर-हर का हरद्वार।
मैली मत करना कभी, गंगा जी की धार।।
--
गंगा जी के नाम से, भारत की पहचान।
करती तीनों लोक में, गंगा मोक्ष प्रदान।।

--

शनिवार, 28 नवंबर 2020

दोहे "खास हो रहे मस्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एकल कवितापाठ का, अपना ही आनन्द।
रोज़ गोष्ठी को करो, करके कमरा बन्द।।
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कोरोना के काल में, मजे लूटता खास।
मँहगाई की मार से, होता आम उदास।।
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कम शब्दों के मेल से,  दोहा बनता खास।
सरस्वती जी का अगर, रहे हृदय में वास।।
--
फिर से पैदा हो गये, बाबर-औरंगजेब।
इनमें उनकी ही तरह, भरे हुए हैं ऐब।।
--
सम्बन्धों की आड़ में, वासनाओं का खेल।
झूठी कर तारीफ को, करते तन का मेल।।
--
आम आदमी पिस रहा, खास हो रहे मस्त।
खोटे सिक्कों ने करी, न्याय व्यवस्था ध्वस्त।।
--
सामाजिक परिवेश में, जब से आयी मोच।
तब से लोगों की हुई, कितनी गन्दी सोच।।
--

शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

गीत "आसमान का छोर, तुम्हारे हाथों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आसमान का छोर, तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
लहराती-बलखाती, पेंग बढ़ाती है,
नीलगगन में ऊँची उड़ती जाती है,
होती भावविभोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
वसुन्धरा की प्यास बुझाती है गंगा,
पावन गंगाजल करता तन-मन चंगा,
सरगम का मृदु शोर तुम्हारे हाथों में।।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
उपवन में कलिकाएँ जब मुस्काती हैं,
भ्रमर और तितली को महक सुहाती है,
जीवन की है भोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--
प्रणय-प्रेम के बिना अधूरी पावस है,
बिन मयंक के छायी घोर अमावस है,
चन्दा और चकोर तुम्हारे हाथों में।
कनकइया की डोर तुम्हारे हाथों में।।
--

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

ग़ज़ल "कठिन बुढ़ापा बीमारी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हिम्मत अभी नहीं हारी है
जंग ज़िन्दगी की जारी है
--
मोह पाश में बँधा हुआ हूँ
ये ही तो दुनियादारी है
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ज्वाला शान्त हो गई तो क्या
दबी राख में चिंगारी है
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किस्मत के सब भोग भोगना
इस जीवन की लाचारी है
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चार दिनों के सुख-बसन्त में
मची हुई मारा-मारी है
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हाल भले बेहाल हुआ हो
जान सभी को ही प्यारी है
--
उसकी लीला-वो ही जाने
ना जाने किसकी बारी है
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ढल जायेगा 'रूप' एक दिन
कठिन बुढ़ापा बीमारी है 
--

बुधवार, 25 नवंबर 2020

दोहे "देवोत्थान प्रबोधिनी एकादशी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कातिक की एकादशी, होती देवउठान।
दुनिया में सबसे अलग, भारत की पहचान।।
--
तुलसी का परिणय दिवस, देता है सन्देश।
शुभ कर्मों का बन गया, भारत में परिवेश।।
--
प्रबोधिनी एकादशी, दिन होता है खास।
वन्दन देवों का करो, रखकर व्रत-उपवास।।
--
तुलसी के फेरे लगा, करना पूजन आप।
शान्त चित्त से कीजिए, नारायण का जाप।।
--
गन्ने का मंडप बना, जला दीजिए जोत।
ग्यारस के दिन से खुलें, शुभ कर्मों के स्रोत।।

--

मंगलवार, 24 नवंबर 2020

बालकविता "कौआ होता अच्छा मेहतर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कौआ बहुत सयाना होता।
कर्कश इसका गाना होता।।


पेड़ों की डाली पर रहता।
सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।


कीड़े और मकोड़े खाता।
सूखी रोटी भी खा जाता।।


श्राद्ध पक्ष में सबको भाता।
पुरखों तक भोजन पहुँचाता।।


सड़े मांस पर यह ललचाता।
काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।


साफ सफाई करता बेहतर।
कौआ होता अच्छा मेहतर।।

--

सोमवार, 23 नवंबर 2020

बालकविता "ये हैं चौकीदार हमारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे।
ये हैं चौकीदार हमारे।।


हमको ये लगते हैं अच्छे।
दोनों ही हैं सीधे-सच्चे।।
न्हाते नित्य नियम से दोनों।
साबुन साबुन भी मलवाते दोनों।। 

बाँध चेन में इनको लाते।
बाबा कंघी से सहलाते।।
IMG_1731इन्हें नहीं कहना बाहर के।
संगी-साथी ये घरभर के।।

सुन्दर से हैं बहुत सलोने।
लगते दोनों हमें खिलौने।।

रविवार, 22 नवंबर 2020

बालकविता "बिल्ली मौसी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी,
क्यों इतना गुस्सा खाती हो।
कान खड़ेकर बिना वजह ही
रूप भयानक दिखलाती हो।।

--

 छल और कपट तुम्हारे मन में,

धोखा जग को देती हो?
झाँसा देने को मौसी तुम,
आँख मूँद क्यों बैठी हो?

--

मुझे न छोटा जन्तु समझना,
आफत का परकाला हूँ।।
तुम खाला हो कितनी भोली,
मैं ज्ञानी-मतवाला हूँ।
--
मैं गणेश जी का वाहन हूँ,
मैं दुनिया में भाग्यवान हूँ।
चाल समझता तेरी बिल्ली,
गुणी, चतुर सौभाग्यवान हूँ।।

--


 

शनिवार, 21 नवंबर 2020

बालगीत "जोकर खूब हँसाये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
जो काम नही कर पायें दूसरे,
वो जोकर कर जाये।
सरकस मे जोकर ही,
दर्शक-गण को खूब रिझाये।
--
नाक नुकीली, चड्ढी ढीली,
लम्बी टोपी पहने,
उछल-कूद कर जोकर राजा,
सबको खूब हँसाये।
--
चाँटा मारा साथी को,
खुद रोता जोर-शोर से,
हाव-भाव से, शैतानी से,
सबका मन भरमाये।
--
लम्बा जोकर तो सीधा है,
बौना बड़ा चतुर है,
उल्टी-सीधी हरकत करके,
बच्चों को ललचाये।
--

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

बालगीत "सीधा प्राणी गधा कहाता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से

एक बालगीत

कितना सारा भार उठाता।
लेकिन फिर भी गधा कहाता।।


रोज लाद कर अपने ऊपर,
कपड़ों के गट्ठर ले जाता।
वजन लादने वाले को भी,
तरस नही इस पर है आता।।


जिनसे घर में चूल्हा जलता,
उन लकड़ी-कण्डों को लाता।
जिनसे पक्के भवन बने हैं,
यह उन ईंटों को पहुँचाता।।
 
यह सीधा-सादा प्राणी है,
घूटा और घास को खाता।
जब ढेंचू-ढेंचू करता है,
तब मालिक है मार लगाता।।
 
सीधा प्राणी गधा कहाता,
सिर्फ काम से इसका नाता।
भूखा-प्यासा चलता जाता।
फिर भी नही किसी को भाता।।

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

दोहे "छठपूजा त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उगते ढलते सूर्य का, छठपूजा त्यौहार।
कोरोना के काल में, माता हरो विकार।।
 
अपने-अपने नीड़ से, निकल पड़े नर-नार।
सरिताओं के तीर पर, उमड़ा है संसार।।
 
अस्तांचल की ओर जब, रवि करता प्रस्थान।
छठ पूजा पर अर्घ्य तब, देता हिन्दुस्थान।।
 
परम्पराओं पर टिका, अपना भारतवर्ष।
माता जी जय बोलकर, लोग मनाते हर्ष।।
 
षष्टी मइया कीजिए, सबका बेड़ा पार।
मात की अरदास को, उमड़ा है संसार।।
 
छठपूजा के दिवस पर, कर लेना उपवास।
अन्तर्मन से कीजिए, माता की अरदास।।
 
उदित-अस्त रवि को सदा, अर्घ्य चढ़ाना नित्य।
देता है जड़-जगत को, नवजीवन आदित्य।।
 
कठिन तपस्या के लिए, छठ का है त्यौहार।
व्रत पूरा करके करो, ग्रहण शुद्ध आहार।।
 
पूर्वांचल से हो गया, छठ माँ का उद्घोष।
दुनियाभर में किसी का, रहे न खाली कोष।।

बुधवार, 18 नवंबर 2020

मेरी बालकविता “कंप्यूटर”, हिन्दी की टेक्सटबुक (अंकुर हिन्दी पाठमाला) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आज “चैतन्य का कोना” ब्लॉग पर
अचानक ही डॉ. मोनिका शर्मा की
इस पोस्ट पर भी नजर पड़ी।
 
ब्लॉगिंग से जुड़े सभी लोग
रूपचंद्र शास्त्री 'मयंकजी की
बाल कवितायेँ पढ़ ही चुके हैं ।
मुझे भी उनकी बाल कवितायेँ बहुत पसंद हैं । 
आज चैतन्य की हिन्दी की टेक्सटबुक 
(अंकुर हिन्दी पाठमाला) खोली तो 
इन दिनों स्कूल में पढ़ाई जा रही
बाल कविता “कंप्यूटर”
रूपचंद्र शास्त्री जी की ही थी ।
बहुत अच्छा लगा....
सुखद आश्चर्य हुआ कि मैं उन्हें पहले से जानती हूँ  :) 
जब से ब्लॉगिंग की दुनिया से जुड़ी हूँ,
उनकी बालसुलभ रचनाएँ पढ़ती आ रही हूँ

"कम्प्यूटर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 मन को करता है मतवाला।
कम्प्यूटर है बहुत निराला।।
यह इसका अनिवार्य भाग है।
कम्प्यूटर का यह दिमाग है।।
चलते इससे हैं प्रोग्राम।
सी.पी.यू.है इसका नाम।।
गतिविधियाँ सब दिखलाता है।
यह मॉनीटर कहलाता है।।
सुन्दर रंग हैं न्यारे-न्यारे।
आँखों को लगते हैं प्यारे।।
इसमें कुंजी बहुत समाई ।
टाइप इनसे करना भाई।।
सोच-सोच कर बटन दबाना।
हिन्दी-इंग्लिश लिखते जाना।।
यह चूहा है सिर्फ नाम का।
माउस होता बहुत काम का।।
यह कमाण्ड का ऑडीटर है।
इसके वश में कम्प्यूटर है।।
कविता लेख लिखो जी भर के।
तुरन्त छाप लो इस प्रिण्टर से।।
नवयुग का कहलाता ट्यूटर।
बहुत काम का है कम्प्यूटर।।

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

दोहे "लुटा सभी मकरन्द" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

--
जीवन के दो चक्र हैं, सुख-दुख जिनके नाम।
दोनों ही हालात में, धीरज से लो काम।।
--
सरल सुभाव अगर नहीं, धर्म-कर्म सब व्यर्थ।
वक्र स्वभाव मनुष्य का, करता सदा अनर्थ।।
--
जीवन प्रहसन के सभी, इस दुनिया में पात्र।
सबका जीवन है यहाँ, चार दिनों का मात्र।।
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छन्द-शास्त्र गायब हुए, मुक्त हुआ साहित्य।
गीत और संगीत में, नहीं रहा लालित्य।।
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रत्तीभर चक्खा नहीं, लिया नहीं आनन्द।
छत्ते में डाका पड़ा, लुटा सभी मकरन्द।।
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जिनकों फूलों ने दिये, घाव हजारों बार।
काँटों पर उनको भला, कैसे हो इतबार।।
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हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर।
उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।।
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