-- पर्व अहोई-अष्टमी, व्रत-पूजन का पर्व। माताओं को पुत्र पर, दुनियाभर में गर्व।। -- -- |
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रविवार, 16 अक्टूबर 2022
दोहे "अहोई अष्टमी-माताओं की आस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 27 अक्टूबर 2021
दोहे "पर्वों का परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- सारे जग से भिन्न है, अपना भारत देश। रहता बारह मास ही, पर्वों का परिवेश।। पर्व अहोई-अष्टमी, दिन है कितना खास। जिसमें बेटों के लिए, होते हैं उपवास।। दुनिया में दम तोड़ता, मानवता का वेद। बेटा-बेटी में जहाँ, दुनिया करती भेद।। पुरुषप्रधान समाज में, नारी का अपकर्ष। अबला नारी का भला, कैसे हो उत्कर्ष।। बेटा-बेटी के लिए, हों समता के भाव। मिल-जुलकर मझधार से, पार लगाओ नाव।। एक पर्व ऐसा रचो, जो हो पुत्री पर्व। व्रत-पूजन के साथ में, करो स्वयं पर गर्व।। बेटा-बेटी समझ लो, कुल के दीपक आज। बदलो पुरुष प्रधान का, अब तो यहाँ रिवाज।। |
शनिवार, 22 अक्टूबर 2016
दोहे "पुत्रों के लिए, होते हैं उपवास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आज अहोई-अष्टमी, दिन है कितना खास।
जिसमें पुत्रों के लिए, होते हैं उपवास।।
दुनिया में दम तोड़ता, मानवता का वेद।
बेटा-बेटी में बहुत, जननी करती भेद।।
पुरुषप्रधान समाज में, नारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भला, कैसे हो उत्कर्ष।।
बेटा-बेटी के लिए, समता के हों भाव।
मिल-जुलकर मझधार से, पार लगाओ नाव।।
एक पर्व ऐसा रचो, जो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ में, करो स्वयं पर गर्व।।
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सोमवार, 2 नवंबर 2015
पाँचदोहे "अहोई-अष्टमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कृष्णपक्ष की अष्टमी, और कार्तिक मास।
जिसमें पुत्रों के लिए, होते हैं उपवास।।
दुनिया में दम तोड़ता, मानवता का वेद।
बेटा-बेटी में बहुत, जननी करती भेद।।
पुरुषप्रधान समाज में, नारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भला, कैसे हो उत्कर्ष।।
बेटा-बेटी के लिए, हों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार से, पार लगाओ नाव।।
एक पर्व ऐसा रचो, जो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ में, करो स्वयं पर गर्व।।
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