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मंगलवार, 19 मई 2020

गीत "कोरोना से सारे हारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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भूख बन गई है मजबूरी,
सड़कों पर हैं राजदुलारे।
नहीं मिल रही है मजदूरी,
कोरोना से सारे हारे।।
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तन से बहता बहुत पसीना,
दूभर हुआ आज है जीना,
अपने घर जाने को आतुर,
घूम रहे हैं मारे-मारे।
नहीं मिल रही है मजदूरी,
कोरोना से सारे हारे।।
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आश्वासन पर देश चल रहा,
जन-गण को सन्देश छल रहा,
झूठे सब सरकारी दावे,
इनकी किस्मत कौन सँवारे।
नहीं मिल रही है मजदूरी,
कोरोना से सारे हारे।।
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टूटे-फूटे थे कच्चे घर,
नहीं यहाँ थेपंखे-कूलर.
महलों को मुँह चिढ़ा रही थी,
इनकी झुग्गी सड़क किनारे।
नहीं मिल रही है मजदूरी,
कोरोना से सारे हारे।।
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मिलता इनको झिड़की-ताना,
दूषित पानीझूठा खाना,
जनसेवक की सेवा में हैं,
अफसर-चाकर कितने सारे।
नहीं मिल रही है मजदूरी,
कोरोना से सारे हारे।।
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3 टिप्‍पणियां:

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