![]() अपनी सीमा को पहचानो।
अपने को बरगद मत मानो।।
जहाँ उजाला होता पहले,
वहाँ कुटिल मत कदम बढ़ाओ।
जिसने ज्ञान दिया दुनिया को,
उसको मत तुम पाठ पढ़ाओ।
नाहक बैर न मन में ठानो।
अपने को बरगद मत मानो।।
चक्रव्यूह में नहीं फँसेंगे,
हम देहाती सीधे-सादे।
काले अँग्रेजों के सारे,
हम कर देंगे विफल इरादे।
जनता की ताकत को जानो।
अपने को बरगद मत मानो।।
फसल उगायें हम मेहनत से,
दाम लगायेंगे परदेशी।
पावन वसुन्धरा पर आकर,
लाभ कमायेंगे परदेशी।
ख़ाक यहाँ की मत तुम छानो।
अपने को बरगद मत मानो।।
माँ का दूध पिया है हमने,
तुम बोतल पर पलने वाले।
नहीं सामने टिक पायेंगे,
बैसाखी पर चलने वाले।
मत कमान को हमपर तानो।
अपने को बरगद मत मानो।।
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शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
"अपने को बरगद मत मानो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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