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रविवार, 25 फ़रवरी 2018

कविता "भय मानो मीठी मुस्कानों से" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
आज घर की पुरानी अलमारी में 
जीर्ण-शीर्ण अवस्था में 
1970 से 1973 तक की 
एक पुरानी डायरी मिल गयी।
जिसमें मेरी यह रचना भी है-
सब तोप तबर बेकार हुए, 
अब डरो न तीर कमानों से।
भय मानो तो ऐ लोगों! 
मानो मीठी मुस्कानों से।।

शासन से कह दो, अब करना 
फौजों का निर्माण नहीं।
छाँट-छाँट कर वीर सजीले, 
भरती करना ज्वान नहीं।।

सागर में डुबो फेंक दो सब, 
बन्दूकों और हथियारों को।
सेना में भरती करलो, 
कुछ सुन्दर-सुन्दर नारों को।।

बनी-ठनी जब ये बालाएँ, 
रणस्थल में चालेंगी।
लाखों ही वीरों के दिल के 
टुकड़े हजार कर डालेंगी।।

सजी-धजी बालाओं का तो 
सारे जग में चर्चा है।
कुछ अधिक नहीं देना होगा, 
बस मामूली सा खर्चा है।।

कुछ पाउडर-क्रीम लवेंडर और 
कुछ देना होठों की लाली।
बस इतने से ही खर्चे में 
होगी सीमा की रखवाली।।

जो काम नहीं कर सकी अरे 
गाँधी की फटी लँगोटी रे।
वो काम सहज कर जायेंगी, 
नागिन सी इनकी चोटी रे।।

तोप तमंचे गोलों की, 
अब नहीं यहाँ परवाह हमें।
सुन्दर-सुन्दर नारी दो, 
भगवान यही है चाह हमें।।
  


शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

गीत "धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों।
आज घर की पुरानी अलमारी में 
जीर्ण-शीर्ण अवस्था में 
1970 से 1973 तक की 
एक पुरानी डायरी मिल गयी।
जिसमें मेरी यह रचना भी है-
फूलों की मुझको चाह नहीं,
मैं काँटों को स्वीकार करूँ।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

सागर पर जिनने पुल बाँधा,
नल-नील भले ही खो जाये।
मैं सिन्धु सुखाने वाले,
कुम्भज का आदर मनुहार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अम्बर चाहे मत लौटा हमको,
महावीर, गौतम, गाँधी।
दे दे प्रताप. इन्दिरा, सुभाष,
मैं गोविन्दसिंह से प्यार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अब नहीं चाहिए पांचाली,
खिँच गया चीर दुर्गा न बनी।
लक्ष्मीबाई को लौटा दे,
फिर अरिमुण्डों से हार भरूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

ले नूरजहाँ लाखों चाहे,
बस एक पद्मिनी ही दे दे।
चन्दन-अबीर समझूँ गुलाल,
माथे पर उसकी क्षार धरूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

काबा-काशी या यरूशलम,
बद्रीनारायण छोटे हैं।
हैं कुरूक्षेत्र-हल्दीघाटी,
इम्फाल तीर्थ सत्कार करू।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

दे शूल जो बाणों पर चढ़कर,
नाचें सदैव गाण्डीवों पर।
जो जूड़ों पर चढ़ मुरझाते,
उन फूलों से क्या प्यार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

मोहन! बंशी की चाह नहीं,
दो देवदत्त या पाञ्चजन्य।
चरखा लो, चक्र सुदर्शन दो,
मैं प्रलयंकर गुंजार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

अब नहीं चाहिए चरण कमल,
दे दे अंगद का एक पाँव।
भू डोल उठे, अरि वक्षस पर,
मैं ऐसा वज्र प्रहार करूँ।।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।

माँ सरस्वती वीणा रख कर,
धारण त्रिशूल कर दुर्गा बन।
तेरे चरणों में शीश झुका,
मैं अभिनन्दन शत बार करूँ।।
फूलों की मुझको चाह नहीं,
मैं काँटों को स्वीकार करूँ।
चन्दन से मुझको मोह नहीं,
ज्वाला को अंगीकार करूँ।।
  

गीत "आई होली-खिलता फागुन आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आँचल में प्यार लेकर,
भीनी फुहार लेकर.
आई होली, आई होली,
आई होली रे!

चटक रही सेंमल की कलियाँ
चलती मस्त बयारे।
मटक रही हैं मन की गलियाँ,  
बजते ढोल नगारे।
निर्मल रसधार लेकर
फूलों के हार लेकर,
आई होली, आई होली,
आई होली रे!

मीठे सुर में बोल रही है
बागों में कोयलिया।  
कानों में रस घोल रही है
कान्हा की बाँसुरिया।
रंगों की धार लेकर
अभिनव शृंगार लेकर,
आई होली, आई होली,
आई होली रे!

लहराती खेतों में फसलें
तन-मन है लहराया.  
वासन्ती परिधान पहनकर
खिलता फागुन आया,
महकी मनुहार लेकर
गुझिया उपहार लेकर,
आई होली, आई होली,
आई होली रे!

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

गीत "अपने मन को बहलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मधुमेह हुआ जबसे हमको,
मीठे से हम कतराते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
1806mawa248
आलूचावल और रसगुल्ले,
खाने को मन ललचाता है,
हम जीभ फिराकर होठों पर,
आँखों को स्वाद चखाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
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गुड़ की डेली मुख में रखकर,
हम रोज रात को सोते थे,
बीते जीवन के वो लम्हें,
बचपन की याद दिलाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
 IMG_0887
हर सामग्री का जीवन में,
कोटा निर्धारित होता है,
उपभोग किया ज्यादा खाकर,
अब जीवन भर पछताते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
थोड़ा-थोड़ा खाते रहते तो,
जीवन भर खा सकते थे,
पेड़ा और बालूशाही को,
हम देख-देख ललचाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।
 
हमने खाया मन-तन भरके,
अब शिक्षा जग को देते हैं,
खाना मीठा पर कम खाना,
हम दुनिया को समझाते हैं।
गुझिया-बरफी के चित्र देख,
अपने मन को बहलाते हैं।।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

होली गीत "त्योहारों की रीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मन में आशायें लेकर के,
आया हैं मधुमास,
चलो होली खेलेंगे।
मूक-इशारों को लेकर के,
आया है विश्वास,
चलो होली खेलेंगे।।

मन-उपवन में सुन्दर-सुन्दरसुमन खिलें हैं,
रंग बसन्ती पहनेधरती-गगन मिले हैं,
बाग-बहारों को लेकर के,
छाया है उल्लास,
चलो होली खेलेंगे।

सरिता का सागर में,  ठौर-ठिकाना सा है,
प्रेम-प्रीत का मौसमबड़ा सुहाना सा है,
शोख नजारों को ले करके,
आया है दिन खास,
चलो होली खेलेंगे।

सपने जो देखे थेवो साकार करेंगे ,
बैर-भाव को भूल लोग अब प्यार करेंगे,
चाँद सितारों को ले करके,
आया है आकाश,
चलो होली खेलेंगे।

सुन्दर है संगीत, मिलन का गीत सुनाओ,
त्योहारों की रीत, गले से अब लग जाओ,
नेक विचारों को लेकर के,
जाओ सबके पास,
चलो होली खेलेंगे।

खुशियों की सौगात लिए,
होली आयी है,
चाँदी जैसी रात लिए,
होली आयी है,
सूर्य उजाला लेकर के,
लाया है धवल प्रकाश,
चलो होली खेलेंगे।


बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

गीत "चहक रहे हैं उपवन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गदराई पेड़ों की डाली
हमें सुहाती हैं कानन में।।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

पवन बसन्ती जब पर्वत से,
चलकर मैदानों तक आती।
सुरभित फूलों की सुगन्ध तब,
मन में नव उल्लास जगाती।
अपनी खग भाषा में तब हम,
गीत सुनाते हैं मधुबन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

इन्द्र धनुष जब नभ में उगता,
प्यारा बहुत नजारा होता।
धरा-धाम के पाप-ताप को,
घन जब पावन जल से धोता।
जल की बून्दें बहुत सुहाती,
पड़ती हैं जब घर-आँगन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

उदय-अस्त की बेला में हम,
देते हैं सन्देश अनोखा।
गान उसी का करते हम.
जो रखता है लेखा-जोखा।
चलता जिसकी कृपादृष्टि से,
समयचक्र सबके जीवन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

सुख से रहना अगर चाहते,
सच से कभी न आँखें मींचो।
जीवन की सुन्दर बगिया को,
नियमित होकर प्रतिदिन सींचो।
नित्य नियम से रोज सवेरे,
सूरज उगता नील गगन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।

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