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शनिवार, 26 मई 2018

दोहे "बदन जलाता घाम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

वाक्शक्ति हमको मिली, ईश्वर से अनमोल।
सोच समझकर बात को, तोल-तोलकर बोल।।

कुछ लोगों के तंज की, करना मत परवाह।
आगे बढ़ते जाइए, मिल जायेगी राह।।

चिकनी-चुपड़ी बात से, होता जग अनुकूल।
खरी-खरी जो बोलता, उसके सब प्रतिकूल।।

खाली पड़ी जमीन पर, बने हुए हैं कक्ष।
दिखलाई देते नहीं, अब आँगन में वृक्ष।।

हरा-भरा परिवेश ही, है सच्चा उपहार।
पेड़ लगा कर भूमि का, करो आज शृंगार।।

दिखा नहीं है जेठ में, बदन जलाता घाम।
उमड़-घुमड़कर आ रहे, गरमी में घनश्याम।।

करें चाकरी देश में, सुभट महाविद्वान।
धनवानों की माँद में, बन्धक हैं गुणवान।।

परिवर्तन है ज़िन्दगी, आयेंगे बदलाव।
अनुभव के पश्चात ही, आता है ठहराव।।

चाँद चमकती है तभी, जब यौवन ढल जाय।
पीले पत्तों में नहीं, हरियाली आ पाय।।

कभी जुदाई है यहाँ, कभी यहाँ पर मेल।
हैं संयोग-वियोग का, प्यार अनोखा खेल।।

दोहों में मेरे नहीं, होता है लालित्य।
जो समाज को दे दिशा, वो ही है साहित्य।।

शुक्रवार, 25 मई 2018

दोहे "जीवन का भावार्थ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

दोहों में ही निहित है, जीवन का भावार्थ।
गरमी में अच्छे लगें, शीतल पेय पदार्थ।।

ज्यादा मीठे माल से, हो जाता मधुमेह।
कभी-कभी तो चाटिए, कुछ तीखा अवलेह।।

हमने दुनिया को दिया, कविताओं का ढंग।
किन्तु विदेशों का चढ़ा, आज हमीं पर रंग।।

राम और रहमान को, भुना रहे हैं लोग।
जनता दुष्परिणाम को, आज रही है भोग।।

वर्तमान है लिख रहा, अब अपना इतिहास।
आम आज भी आम है, खास आज भी खास।।

बढ़ जाता है हौसला, जब हो जाती जीत।
मन में अगर उमंग हो, बज उठता संगीत।

अगर इरादे नेक हों, होती नहीं थकान।
सादा भोजन भी लगे, मानो हो पकवान।।

जिनके मिलने से मिले, मन को खुशी अपार।
ऐसे सज्जनवृन्द तो, मिलने अब दुश्वार।।

लोगों ने देखा जहाँ, बेलन-तवा-परात।
अपनी चादर कोबिछा, वहीं गुजारी रात।।

लोगों को जब शहद की, मिल जाती है गन्ध।
बिना किसी अनुबन्ध के, हो जाते सम्बन्ध।।

अच्छे कामों में सदा, आते हैं अवरोध।
चूहें-छिपकलियाँ करें,
रवि का बहुत विरोध।।
  

गुरुवार, 24 मई 2018

"अक्षर बड़े अनूप" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


काले अक्षर कभी-कभीतो बहुत सताते है।
कभी-कभी सुख कासन्देशा भी दे जाते हैं।।

इनका दर्द मुझे बिल्कुलअपना जैसा लगता है।
कभी बेरुखी कभी प्यार सेसीधी बातें करता है।।

अक्षर में ही राज भरे हैंछिपे बहुत से रूप।
जख्म जिन्दगी में दे जातेअक्षर बड़े अनूप।।

जीवन के दोराहे परपूरा घर-बार पड़ा है।
किसी-किसी का तोअभिनव संसार खड़ा है।।

पग-पग पर मिलते हैंऐसे दोराहे और चौराहें।
केवल समय दिखा सकता हैसीधी-सच्ची राहें।।

चूहा-बिल्लीपिल्ला-पिल्ली सेलगते हैं काले अक्षर।
इसी लिए तो कहते हैं जीकाला अक्षर भैंस बराबर।।

बुधवार, 23 मई 2018

"गीत सुनाती माटी अपने बेटों के श्रमदान की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गीत सुनाती माटी अपनेगौरव और गुमान की।
दशा सुधारो अब तो लोगोंअपने हिन्दुस्तान की।।

खेतों में उगता है सोनाइधर-उधर क्यों झाँक रहे?
भिक्षुक बनकर हाथ पसारेअम्बर को क्यों ताँक रहे?
आज जरूरत धरती माँ कोबेटों के श्रमदान की।
दशा सुधारो अब तो लोगोंअपने हिन्दुस्तान की।।

हरियाली के चन्दन वन मेंकंकरीट के जंगल क्यों?
मानवता के मैदानों मेंदावनता के दंगल क्यों
कहाँ खो गयी साड़ी-धोतीभारत के परिधान की।
दशा सुधारो अब तो लोगोंअपने हिन्दुस्तान की।।

टोपी-पगड़ीचोटी-बिन्दीहमने अब बिसराई क्यों
अपने घर में अपनी हिन्दीसहमी सी सकुचाई क्यों?
कहाँ गयी पहचान हमारेपुरखों के अभिमान की।
दशा सुधारो अब तो लोगोंअपने हिन्दुस्तान की।।

कहाँ गया ईमान हमारा, कहाँ गया भाई-चारा?
कट्टरपन्थी में होता, क्यों मानवता का बँटवारा?
मूरत लुप्त हो गयी अब तो, अपने विमल-वितान की।।
दशा सुधारो अब तो लोगोंअपने हिन्दुस्तान की।।

मंगलवार, 22 मई 2018

दोहे "वृद्ध पिता मजबूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


करके सभी प्रयास अब, लोग गये हैं हार।
काशी में उलटी बहे, गंगा जी की धार।।

पूरी ताकत को लगा, चला रहे पतवार।
लेकिन फिर भी नाव तो, नहीं लग रही पार।।

एक नीड़ में रह रहे, बोल-चाल है बन्द।
भाई-भाई की उन्हें, सूरत नहीं पसन्द।।

पुत्र पिता को समझता, बैरी नम्बर एक।
मतलब तक ही हैं यहाँ, सब परिवारी नेक।।

खून पिलाकर पालता, जीवनभर है बाप।
लेकिन बदले में उसे, मिलता है सन्ताप।।

यौवन के अभिमान में, बहुएँ-बेटे चूर।
माता की चलती नहीं, वृद्ध पिता मजबूर।।

अवसर कभी न चूकते, करने को अपमान।
मात-पिता का चुकाते, वो ऐसे अहसान।।

जिनके लिए कृपण बने, किया महल तैयार।
अपशब्दों की वो करें, रोज-रोज बौछार।।

कहीं किसी भी हाट में, बिकती नहीं तमीज।
वैसा ही पौधा उगे, जैसा बोते बीज।।

पूर्व जन्म में किसी का, खाया था जो कर्ज।
उसको सूद समेत अब, लौटाना है फर्ज।।

जो रखता मन में नही, किसी तरह का मैल।
वो खटता है रात-दिन, ज्यों कोल्हू का बैल।।
   

सोमवार, 21 मई 2018

बालकविता "आम और लीची का उदगम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हरीलाल और पीली-पीली!
लीची होती बहुत रसीली!!
 
गायब बाजारों से केले।
सजे हुए लीची के ठेले।।
 
आम और लीची का उदगम।
मनभावन दोनों का संगम।।
 
लीची के गुच्छे हैं सुन्दर।
मीठा रस लीची के अन्दर।।
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गुच्छा बिटिया के मन भाया!
उसने उसको झट कब्जाया!!
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लीची को पकड़ादिखलाया!
भइया को उसने ललचाया!!
IMG_1180
भइया के भी मन में आया!
सोचा इसको जाए खाया!!
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गरमी का मौसम आया है!
लीची के गुच्छे लाया है!!
IMG_1177 
दोनों ने गुच्छे लहराए!
लीची के गुच्छे मन भाए!!
 

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