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बुधवार, 2 जनवरी 2013

"कोयल-सबके अन्तस मैले हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नये साल की नयी सुबह में, 
कोयल आयी है घर में। 
कुहू-कुहू गाने वालों के, 
चीत्कार पसरा सुर में।।
निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने, 
उसको बहुत सताया था। 
कुदरत का कानून तोड़कर, 
जंगल राज चलाया था।
बँधी हुई आँगन में रस्सी, 
बैठी गयी उसके ऊपर। 
अनजानी आफत को पाकर, 
काँप रही है, वो थर-थर।
दूषित है परिवेश आज का, 
लगा खून का चस्का है। 
इस दुनिया में अबलाओं की, 
कोई नहीं सुरक्षा है।
चारों ओर छिपे हैं डाकू, 
लूटमार का आलम है। 
लाचारी की दशा देखकर, 
आँख बहातीं शबनम हैं।
इन्सानों के घर में आकर, 
खोज रही ये चैन-अमन। 
अस्मत की खातिर ही इसने, 
छोड़ा अपना बाग-चमन।
लगता है अब इस धरती में,
सबके अन्तस मैले हैं। 
कंस और रावण के वंशज, 
जगह-जगह पर फैले हैं।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सटीक और सुन्दर प्रस्तुति
    मेरी नई पोस्ट ;"काश ! हम सभ्य न होते !"

    उत्तर देंहटाएं
  2. दूषित है परिवेश आज का,
    लगा खून का चस्का है।
    इस दुनिया में अबलाओं की,
    कोई नहीं सुरक्षा है।
    भावुक करती रचना.सुन्दर प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  3. लगता है अब इस धरती में,
    सबके अन्तस मैले हैं।
    कंस और रावण के वंशज,
    जगह-जगह पर फैले हैं।।
    बिल्‍कुल सही कहा आपने ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. लगता है अब इस धरती में,
    सबके अन्तस मैले हैं।
    कंस और रावण के वंशज,
    जगह-जगह पर फैले हैं।।………………लाजवाब प्रस्तुति अन्तस को छू गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बढ़िया रचना ||
    शुभकामनायें गुरु जी ||

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... कौअल के माध्यम से कहने का प्रयास ...
    आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. कोयल मनुष्‍यों के घर में तो बेमौत ही मर जाएगी। बहुत अच्‍छी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपने सटीक विवेचना की है .प्रकृति में नर और मादा पुरुष और प्रकृति के अधिकार समान हैं इस लिए एक संतुलन है ,प्रति -सम हैं प्रकृति के अवयव ,दो अर्द्धांश एक जैसे हैं .आधुनिक मानव एक

    अपवाद है .एक अर्द्धांश को दोयम दर्जे का समझा जाता है उसके विरोध को पुरुष स्वीकार नहीं कर पाता ,उसकी समझ में नहीं आता है वह क्या करे लिहाजा वह प्रति क्रिया करता है .घर में नारी

    स्थापित हो तो बाहर समाज में भी हो .इस दिशा में हर स्तर पर काम करना होगा .बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तभी थमेंगे .

    प्रासंगिक वेदना को स्वर दिया है .

    नये साल की नयी सुबह में,
    कोयल आयी है घर में।
    कुहू-कुहू गाने वाली के,
    चीत्कार पसरा सुर में।।

    अभी तो कोयलों में काग बहुत बाकी हैं अभी कुछ और करो ,कवि कुछ और करो .

    विशेष :शास्त्री जी नर कक्कू गाता है (मादा कक्कू )कोयल का आवाहन करता है मेटिंग काल होती है यह प्रेम मिलन की .इस तरह यह प्रतीक सही नहीं बैठता है .जिसे हम मादा समझ रहे हैं वह नर है .

    उत्तर देंहटाएं
  9. सब के मन के दर्द को आप ने शब्द देदिया..बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  10. कौओं की सताई कोयल यहाँ बेमौत मर जाती है , सार्थक रचना !!

    उत्तर देंहटाएं
  11. कंस और रावण के वंशज,
    जगह-जगह पर फैले हैं।।sahi baat hai.....

    उत्तर देंहटाएं
  12. कंस और रावण के वंशज...जगह-जगह पर फैले हैं...पक्षियों में भी...नववर्ष की शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं


  13. ♥(¯`'•.¸(¯`•*♥♥*•¯)¸.•'´¯)♥
    ♥नव वर्ष मंगलमय हो !♥
    ♥(_¸.•'´(_•*♥♥*•_)`'• .¸_)♥




    लगता है अब इस धरती में,
    सबके अन्तस मैले हैं
    कंस और रावण के वंशज,
    जगह-जगह पर फैले हैं

    आप चुटकियों में हर स्थिति में हर छोटी-बड़ी घटना-दुर्घटना पर शानदार कविता लिख देते हैं ...
    :)
    कमाल है !

    आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी
    इस सचित्र पोस्ट के लिए विशेष बधाई !
    आपकी लेखनी से सदैव सुंदर , सार्थक , श्रेष्ठ सृजन होता रहे …
    आप लिखते रहें , हम पढ़ते रहें !

    मंगलकामनाओं शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार
    ◄▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼▲▼►

    उत्तर देंहटाएं
  14. कान सभी अब काले बहरे,
    चीख चीख तू कुछ भी कह ले।

    उत्तर देंहटाएं

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