![]() यौवन गया, बुढ़ापा आया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। आँखों के परदे पर सारे घूम रहे हैं चित्र सलोने, जीवित होकर झूम रहे हैं जीवन के सब खेल-खिलौने, सारे झंझावातों से मैंने जमकर संघर्ष किया, हार नहीं मानूँगा, मैंने ऐसा शिवसंकल्प लिया, खट्टा-मीठा अनुभव पाया, नहीं कभी मन को भटकाया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। लहरों से में लड़ा हमेशा, हिम्मत को पतवार बनाया, सागर के भँवरों में मैंने, चप्पू को हथियार बनाया, जो छलनी में दूध दूहता, खाली हाथ लौट आता है, जो चिड़िया की आँख देखता, वो ही लक्ष्य बेध पाता है, निर्बल पर नहीं हाथ उठाया, बलवानों पर दाँव चलाया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। चीर पर्वतों की छाती को, बहता कल-कल जल का धारा, जीते-जी तुम हार न मानों, जीवन मिलना कठिन दुबारा, आये हो तो कुछ कर जाओ, दुनिया में कुछ नाम कमाओ, समय बहुत ही मूल्यवान है, आलस में मत समय गँवाओ, जिसने माँ का मान बढ़ाया, वो ही है माता का जाया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। |
