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बिन पतझड़
झड़ने लगे, नये पुराने पात।
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बदल गया है आज तो, जीने का अन्दाज।
लोगों के आचरण से, शर्मिन्दा है लाज।।
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दुराचार से जगत को, कैसे मिले निजात।
नवयुग के इस दौर में, बदल गये हालात।
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गोमाता भूखी मरे, पलते घर-घर श्वान।
मात-पिता का हो रहा, पग-पग पर अपमान।।
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तोड़ रही दम सभ्यता, आहत है परिवेश।
पुस्तक तक सीमित हुए, सन्तों के सन्देश।।
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देख दुर्दशा धर्म की, हैरत में भगवान।
फिरकों में अब बँट गये, राम और रहमान।।
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बिना विचारे हो रहा, वाणी का संधान।
अब मानव के रूप में, छिपे हुए हैवान।।
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| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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गुरुवार, 7 जनवरी 2016
दोहे "फिरकों में अब बँट गये, राम और रहमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 6 जनवरी 2016
"काव्य की आत्मा रस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
♥ रस काव्य की आत्मा है ♥
सबसे पहले
यह जानना आवश्यक है कि रस क्या होता है?
कविता पढ़ने
या नाटक देखने पर पाठक या दर्शक को जो आनन्द मिलता है उसे रस कहते हैं।
आचार्यों ने
रस को काव्य की आत्मा की संज्ञा दी है।
रस के चार
अंग होते हैं।
1- स्थायी भाव,
2- विभाव,
3- अनुभाव और
4- संचारी भाव
सहृदय
व्यक्ति के हृदय में जो भाव स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं, उन्हें स्थायी भाव
कहा जाता है। यही भाव रस का बोध पाठक को कराते हैं।
काव्य के
प्राचीन आचार्यों ने स्थायी भाव की संख्या नौ निर्धारित की थी, जिसके आधार पर रसों
की संख्या भी नौ ही मानी गई थी।
स्थायी
भाव रस
रति
शृंगार
हास हास्य
शोक
करुण
क्रोध
रौद्र
उत्साह वीर
भय
भयानक
जुगुप्सा
(घृणा) वीभत्स
विस्मय अद्भुत
निर्वेद शान्त
लेकिन
अर्वाचीन विद्वानों ने वात्सल्य के नाम से दसवाँ रस भी स्वीकार कर लिया। किन्तु
इसका भी स्थायी भाव रति ही है। अन्तर इतना है कि जब रति बालक के प्रति उत्पन्न
होती है तो उससे वात्सल्य की और जब ईश्वर के प्रति होती है तो उससे भक्ति रस की
निष्पत्ति होती है।
विभाव
जिसके कारण
सहृदय व्यक्ति को रस प्राप्त होता है , वह विभाव कहलाता है। अतः स्थायी भाव का कारण विभाव है।
यह दो प्रकार का होता है-
क- आलम्बन
विभाव
ख- उद्दीपन
विभाव
(I)
आलम्बन
विभाव
वह कारण जिस
पर भान अवलम्बित रहता है- अर्थात् जिस व्यक्ति या वस्तु के प्रति मन में रति आदि
स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं, उसे आलम्बन कहते हैं तता जिस व्यक्ति के मन में स्थायी
भाव उत्पन्न होते हैं उसे आश्रय कहते
हैं। उदाहरण के लिए पुत्र की मृत्यु पर विलाप करती हुई माता। इसमें माता आश्रय
है और पुत्र आलम्बन है। अतः यहाँ स्थायी भाव शोक है जिससे करुणरस की उत्पत्ति
होती है।
(II)
उद्दीपन
विभाव
जो आलम्बन
द्वारा उत्पन्न भावों को उद्दीप्त करते हैं, वे उद्दीपन विभाव
कहलाते हैं। जैसे- जंगल में सिंह का
गर्जन। इससे भय का स्थायी भाव उद्दीप्त होता है और सिंह का खुला मुख जंगल की
भयानकता आदि का उद्दीपन विभाव है। इससे भयानक रस की उत्पत्ति होती है।
अनुभाव
स्थायी भाव
के जाग्रत होने पर आश्रय की वाह्य चेष्टाओं को अवुबाव कहा जाता है। जैसे- भय
उत्पन्न होने पर हक्का-बक्का हो जाना, रोंगटे खड़े हो जाना, काँपना, पसीने से तर हो जाना
आदि।
यदि बिना
किसी भावोद्रेक के मात्र भौतिक परिस्थिति के कारण अगर ये चेष्टाएँ दिखाई पड़ती
हैं तो उन्हें अनुभाव नहीं कहा जाएगा। जैसे - जाड़े के कारण काँपना या गर्मी के
कारण पसीना निकलना आदि।
संचारी भाव
आश्रय के मन
में उठने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं। ये मनोविकार पानी के
बुलबुले की भाँति बनते और मिटते रहते हैं, जबकि स्थायी भाव
अन्त तक बने रहते हैं।
यहाँ यह भी
उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रत्येक रस का स्थायी भाव तो निश्चित है परन्तु एक ही संचारी अनेक रसों
में हो सकता है। जैसे - शंका शृंगार रस में भी हो सकती है और भयानक रस में भी।
यहाँ यह भी विचारणय है कि स्थायी भाव भी दूसरे रस में संचारी भाव हो जाते हैं।
जैसे - हास्य रस का स्थायी भाव "हास" शृंगार रस में संचारी भाव बन
जाता है। संचारी भाव को व्यभिचारी भाव के नाम से भी जाना जाता है।
रसों के
बारे में विस्तार से अपनी अगली किसी पोस्ट में प्रकाश डालूँगा....।
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मंगलवार, 5 जनवरी 2016
दोहे "डरा और धमका रहा, कोतवाल को चोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
भारत के शिरमौर का, देखा खूब विवेक।
बैरी के घर में स्वयं, गया काटने केक।।
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त्वरित मिलन की चाह का, देख लिया अंजाम।
सैन्य शिविर में पाक ने, मचा दिया कुहराम।।
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बेर-केर का कभी भी, होता नहीं निभाव।
जीत गयी टेढ़ी नजर, हारा सरल सुभाव।।
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रिश्तों में होता जहाँ, केवल जोड़-घटाव।
दुष्ट नहीं माने कभी, प्रीत-रीत का भाव।।
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क्या मतलब उस मिलन का, जब मन में हो मैल।
लीक न अपनी छोड़ता, कोल्हू का तो बैल।।
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घर जाकर मक्कार के, बाँट रहे उपहार।
दुष्टों की क्यों कर रहे, बार-बार मनुहार।।
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डरा और धमका रहा, कोतवाल को चोर।
क्यों गीदड़ के सामने, शेर हुआ कमजोर।।
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सोमवार, 4 जनवरी 2016
दोहे "खाने में सबको मिले, रोटी-चावल-दाल"
![]() शस्य-श्यामला धरा पर, बनें सुखद संयोग।
नये साल में लोग
सब, होंवे सुखी निरोग।।
--
सरिताओं में फिर
बहे, पावन-निर्मल घार।
नाविक के कर में
रहे, नौका की पतवार।।
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जागरूक हों देश
में, नगर-गाँव के लोग।
मानवता के काम को,
करें सभी आयोग।।
--
झील और तालाब में,
बनें नहीं शैवाल।
धरती पर आयें
नहीं, कहीं कभी भूचाल।।
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नये-नवेले वर्ष
में, सुधरें सबके हाल।
खाने में सबको
मिले, रोटी-चावल-दाल।।
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फिर सुख का सूरज
उगें, निर्मल हो आकाश।
मित्र-पड़ोसी में
बढ़े, आपस में विश्वास।।
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नये साल में देश में, ऐसा हो कश्मीर।
दीन-हीनता दूर हो,
ऐसा बहे समीर।।
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रविवार, 3 जनवरी 2016
"उपवन मुस्कायेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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उपवन मुस्कायेगा!!
कुहासे की चादर,
धरा पर बिछी हुई।
नभ ने ढाँप ली है,
अमल-धवल रुई।।
दिवस हैं छोटे,
रोशनी मऩ्द है।
शीत की मार है,
विद्यालय बन्द है।।
जल रहे हैं अलाव,
आँगन चौराहों पर।
चहल-पहल कम है,
पगदण्डी-राहों पर।।
सूरज अदृश्य है,
पड़ रहा पाला है।।
पर्वत ने ओढ़ लिया,
बर्फ का दुशाला है।।
मन में एक आशा है,
अब बसन्त आयेगा!
खिल जायेंगे नव सुमन,
उपवन मुस्कायेगा!!
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शनिवार, 2 जनवरी 2016
गीत "उत्कर्षों के उच्च शिखर पर चढ़ते जाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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उत्कर्षों के उच्च शिखर पर चढ़ते जाओ।
पथ आलोकित है, आगे को बढ़ते जाओ।।
पगदण्डी है कहीं सरल तो कहीं विरल है,
लक्ष्य नही अब दूर, सामने ही मंजिल है,
जीवन के कोरे पन्नों को पढ़ते जाओ।
पथ आलोकित है, आगे को बढ़ते जाओ।।
अपने को तालाबों तक सीमित मत करना,
गंगा की लहरों-धाराओं से मत डरना,
आँधी, पानी, तूफानों से लड़ते
जाओ।
पथ आलोकित है, आगे को बढ़ते जाओ।।
जो करता है कर्म, वही फल भी पाता है,
बिना परिश्रम नही निवाला भी आता है,
ज्ञान सिन्धु से मन की गागर भरते जाओ।
पथ आलोकित है, आगे को बढ़ते जाओ।।
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शुक्रवार, 1 जनवरी 2016
"नये साल का अभिनन्दन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
गये साल को है प्रणाम!
है नये साल का अभिनन्दन।।
लाया हूँ स्वागत करने को
थाली में कुछ अक्षत-चन्दन।।
है नये साल का अभिनन्दन।।
गंगा की धारा निर्मल हो,
मन-सुमन हमेशा खिले रहें,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के,
हृदय हमेशा मिले रहें,
पूजा-अजान के साथ-साथ,
होवे भारतमाँ का वन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।
नभ से बरसें सुख के बादल,
धरती की चूनर धानी हो,
गुरुओं का हो सम्मान सदा,
जन मानस ज्ञानी-ध्यानी हो,
भारत की पावन भूमि से,
मिट जाए रुदन और क्रन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।
नारी का अटल सुहाग रहे,
निश्छल-सच्चा अनुराग रहे,
जीवित जंगल और बाग रहें,
सुर सज्जित राग-विराग रहें,
सच्चे अर्थों में तब ही तो,
होगा नूतन का अभिनन्दन।
है नये साल का अभिनन्दन।।
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