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चाँद दिखाई दिया दूज का,
फिर से रात हुई उजियाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
भर सोलह सिंगार धरा ने,
फिर से अपना रूप निखारा।
सजनी ने साजन की खातिर,
सावन में तन-बदन सँवारा।
आँगन-कानन में बरसी है,
बारिश बनकर आज मवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
आँगन के कट गये पेड़ सब,
पड़े हुए झूले घर-घर में।
झूल रहीं खुश हो बालाएँ,
गूँज रहे मल्हार नगर में।
मस्त फुहारें लेकर आयी,
नभ पर छाई बदरी काली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
उपवन में कोमल कलियों की,
भीग रही है चूनर धानी।
खेतों में लहराते बिरुए,
आसमान का पीते पानी।
पुरवय्या के झोंखे आते,
बल खाती पेड़ों की डाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
घेवर-फेनी और जलेबी,
अच्छी लगती चौमासे में।
लेकिन अब त्यौहार हमारे,
हैं मँहगाई के फाँसे में।
खास आदमी मजे उड़ाते,
जेब आम की बिल्कुल खाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
शर्माया-सकुचाया सा,
उग आया चाँद गगन में।
आया है त्यौहार तीज का,
हर्ष समाया मन में।
महिलाएँ आँगन उपवन में ,
झूल रहीं होकर मतवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
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शनिवार, 6 अगस्त 2016
गीत "महिलाएँ आँगन उपवन में झूल रहीं होकर मतवाली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 5 अगस्त 2016
दोहे "आयी सावन तीज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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करने को पाठन-पठन, आया सावन मास।
ज्ञान बढ़ाने के लिए, चौमासा है
खास।।
--
आते सावन मास में, भिन्न-भिन्न त्यौहार।
पर्वों में ही निहित है, जीवन का
आधार।।
--
हर-भरा परिवेश ले, आयी सावन तीज।
घर-घर में बनते सभी, व्यञ्जन
बहुत लजीज।।
--
घर-आँगन झूले पड़े, झूल रही हैं
नार।
अपनी-अपनी दुल्हिनें, देख रहे
भरतार।।
--
नारी को प्रभु ने दिया, अद्भुत सुन्दर
रूप।
राधा जी के सामने, बिम्बा हैं
विद्रूप।।
--
चोटी-बिन्दी-चूड़ियाँ, माथे पे
सिन्दूर।
बाला-वृद्धा-यौवना, मस्ती में हैं चूर।।
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अपने मन के मीत को, कैसे दें उपहार।
मँहगाई ने कर दिये, फीके सब त्यौहार।।
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बुधवार, 3 अगस्त 2016
दोहे "पड़ी कूप में भाँग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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जब से सत्ता में बढ़ी, शैतानों की माँग।
मुर्गे पढ़ें नमाज को, गुर्गे देते
बाँग।।
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हुए नशे में चूर सब, पड़ी कूप में भाँग।
एक दूसरे की सभी, खीँच रहे हैं टाँग।।
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संसद में सब गा रहे, अपने-अपने गीत।
यहाँ निठल्ले खा रहे, ठूँस-ठूँस नवनीत।।
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बाहर बने कपोत से, भीतर से सब काग।
मात्र दिखावे के लिए, अलग-अलग हैं राग।।
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केँचुलियों में ढक लिए, सबने काले दाग।
डसने को अब देश को, आये आदम नाग।।
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आज पिशाचों की हुई, दल-दल में भरमार।
थामी सबने हाथ में, छल-बल की पतवार।।
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उनकी पूजा हो रही, जिनके खोटे कर्म।
राजनीति की कैद में, पड़ा हुआ अब धर्म।।
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मेरी बालकविता "जय विजय के अगस्त-2016 अंक में प्रकाशित"
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उमड़े बादल काले-काले
पल में तोला, पल में माशा
नभ में होता आज तमाशा
कुदरत के हैं अजब नजारे
सात रंग लगते हैं प्यारे
गर्मी का हो गया सफाया
धनुष सभी के मन को भाया
बादल कितना हुआ मगन है
हर्षित होता नीलगगन है
इन्द्र देव कर रहे सिफारिश
रिमझिम-रिमझिम होती बारिश
चपला जी भरके चमकेगी
धरती की भी प्यास बुझेगी
सड़क बन गयी ताल-तलैया
नाच रहे सब ता-ता-थैया
नहीं रहेगा चातक प्यासा
शुरू हो गया अब चौमासा
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| (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') |
मंगलवार, 2 अगस्त 2016
बालकविता "रंग-बिरंगी तितली आई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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तितली आई! तितली आई!!
रंग-बिरंगी तितली आई।।
कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।
आँखों को लगते हैं प्यारे।।
फूलों पर खुश हो मँडलाती।
अपनी धुन में हो इठलाती।।
जब आती बरसात सुहानी।
पुरवा चलती है मस्तानी।।
तब तुम अपनी चाल दिखाती।
लहरा कर उड़ती बलखाती।।
पर जल्दी ही थक जाती हो।
दीवारों पर सुस्ताती हो।।
बच्चों के मन को भाती हो।
इसीलिए पकड़ी जाती हो।।
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सोमवार, 1 अगस्त 2016
दोहे "आफत की बरसात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() आवारा बादल हुए, बरस रहे दिन-रात।
आठ दिनों से हो रही, लगातार बरसात।।
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घर बारिश में टपकते, परेशान मजदूर।
रोटी-रोजी के लिए, हुए बहुत मजबूर।।
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फसल धान की खेत में, जल में गयी समाय।
बचने को सैलाब से, कोई नहीं उपाय।।
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कुछ भागों में आ गयी, बहुत भयंकर बाढ़।।
उफन रहे बरसात में, नदी-गधेरे-गाढ़।।
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कल तक सूखा झेलते, अब बारिश की मार।
निर्धन-श्रमिक-किसान का, खिसक रहा आधार।।
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कुदरत की आगे नहीं, चलती कोई बिसात।
पर्वत में मैदान में, आफत की बरसात।।
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तरकारी का हाट में, अब तो हुआ अभाव।
आसमान छू रहे, दालों के भी को भाव।।
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जीवन जीने की रही, राह आज आसान।
मँहगाई को देख कर, परेशान इंसान।।
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मत के बदले में मिला, जनता को उपहार।
कृत्रिम हुए अभाव का, शासन जिम्मेदार।।
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हिन्दी व्याकरण "रेफ लगाने की विधि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
“रेफ लगाने की विधि”
अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्रुटियाँ करते हैं। उनके लिए व्याकरण के कुछ सरल गुर प्रस्तुत कर रहा हूँ!
हिन्दी में रेफ अक्षर के नीचे “र” लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है ?
यदि ‘र’ का उच्चारण अक्षर के बाद हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के नीचे लगेगी जिस के बाद ‘र’का उच्चारण हो रहा है ।
उदाहरण के लिए -
प्रकाश, सम्प्रदाय, नम्रता, अभ्रक, चन्द्र आदि ।
हिन्दी में रेफ या अक्षर के ऊपर "र्" लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र्’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है ? “र्" का उच्चारण जिस अक्षर के पूर्व हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के ऊपर लगेगी जिस के पूर्व‘र्’ का उच्चारण हो रहा है ।
उदाहरण के लिए -
आशीर्वाद, पूर्व, पूर्ण, वर्ग, कार्यालय आदि ।
रेफ लगाने के लिए आपको केवल यह अन्तर समझना है कि जहाँ पूर्ण "र" का उच्चारण हो रहा है वहाँ सदैव उस अक्षर के नीचे रेफ लगाना है जिसके पश्चात "र" का उच्चारण हो रहा है ।
जैसे - प्रकाश, सम्प्रदाय, नम्रता, अभ्रक, आदि में
"र" का उच्चारण हो रहा है ।
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