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अमृत वर्षा कर रही, शरदपूर्णिमा रात।
आज अनोखी दे रहा, शरदचन्द्र सौगात।।
खिला हुआ है गगन में, उज्जवल-धवल मयंक।
नवल-युगल मिलते गले, होकर आज निशंक।।
निर्मल हो बहने लगा, सरिताओं में नीर।
मन्द-मन्द चलने लगा, शीतल-सुखद समीर।।
शरदपूर्णिमा आ गयी, लेकर यह सन्देश।
तन-मन, आँगन-गेह का, करो स्वच्छ परिवेश।
फसल धान की आ गयी, खुशियाँ लेकर साथ।
नहीं रहे खाली कभी, मजदूरों का हाथ।।
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गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017
दोहे "उज्जवल-धवल मयंक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
गीत "भक्तों के अधिकार में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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बात करते हैं हम पत्थरों से सदा,
हम बसे हैं पहाड़ों के परिवार में।
प्यार करते हैं हम पत्थरों से सदा,
ये तो शामिल हमारे हैं संसार में।।
देवता हैं यही, ये ही भगवान हैं,
सभ्यता से भरी एक पहचान हैं,
हमने इनको सजाया है घर-द्वार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।
दर्द सहते हैं और आह भरते नही,
ये कभी सत्य कहने से डरते नही,
गर्जना है भरी इनकी हुंकार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।
साथ करते नही सिरफिरों का कभी,
ध्यान धरते नही काफिरों का कभी,
ये तो रहते हैं भक्तों के अधिकार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।
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बुधवार, 4 अक्टूबर 2017
दोहागीत "गुरू ज्योति का पुंज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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यज्ञ-हवन करके करो, गुरूदेव का ध्यान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।।
(१)
भूल गया है आदमी, ऋषियों के सन्देश।
अचरज से हैं देखते, ब्रह्मा-विष्णु-महेश।
गुरू-शिष्य में हो सदा, श्रद्धा-प्यार अपार।
गुरू पूर्णिमा पर्व को, करो आज साकार।
गुरु की महिमा का करूँ, कैसे आज बखान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।।
(२)
संस्कार देता गुरू, पाता सिख अमिताभ।
बिना दीक्षा के नहीं, शिक्षा का कुछ लाभ।
अन्तस को दे रौशनी, गुरू ज्योति का पुंज।
गुरु के शुभ आशीष से, सुरभित होय निकुंज।
सद्गुरु अपने शिष्य को, देता हरदम ज्ञान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।।
(३)
तीन गुरू संसार में, मात-पिता-आचार्य।
इन तीनों की कृपा से, बनते सारे कार्य।
आया कैसा समय है, बदल गयी है रीत।
गुरुओं के प्रति है नहीं, पहले जैसी प्रीत।
श्रद्धा के बिन शिष्य का, कैसे हो उत्थान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।।
(४)
दुराचरण की नाक में, कैसे पड़े नकेल।
सम्बन्धों की विश्व में, सूख रही है बेल।
मर्यादा दम तोड़ती, बिगड़ गया परिवेश।
बदनामी को झेलता, राम-कृष्ण का देश।
कदम-कदम पर हो रहा, गुरुओ का अपमान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।।
(५)
पश्चिम की अश्लीलता, अपनाते हैं लोग।
भोगवाद को देखकर, सहम गया है योग।
अब तो पूजा-पाठ से, मोह हो गया भंग।
सी.ड़ी. में ही कर रहे, पण्डित जी सत्संग।
गिरगिट जैसा रंग अब, बदल रहा इंसान।
जग में मिलता है नहीं, बिना गुरू के ज्ञान।।
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मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017
बालकविता "छुक-छुक करती आती रेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 2 अक्टूबर 2017
बालकविता "छाते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 1 अक्टूबर 2017
दोहे "गाँधी जी का चित्र" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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रहे
नहीं इस देश में, अब दूषित परिवेश।।
साफ-सफाई
पर रहे, लोगों का अब ध्यान।
होगा सारे जगत में, अपना देश महान।।
कभी
नहीं पनपे यहाँ, छुआ-छूत का बीज।
सभी
मनाये प्यार से, ईद-दिवाली तीज।।
हर
दफतर में हैं टँगा, गाँधी जी का चित्र।
लेकिन
फिर भी घूस का, चलता खेल विचित्र।।
नहीं
काम बिना घूस के, यह चल पड़ा रिवाज।
खेल
घिनौना देखकर, शरमिन्दा है लाज।।
बापू
जी की सीख को, भूल गये सब आज।
इसीलिए
तो देश का, बिगड़ा हुआ मिजाज।।
बिना
काम के माँगते, लोग जहाँ अधिकार।
जन्म
वहाँ पर किसलिए, लेंगे अब अवतार।।
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दोहे "अनुबन्धों का प्यार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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हिन्दी पखवाड़ा गया, गया दिलों से जोश।
अंगरेजी के सामने, हिन्दी है खामोश।।
पर्व दशहरा पर जले, पुतले लाख-हजार।
मन के रावण को नहीं, लोग सके हैं मार।।
सम्बन्धों में है भरा, अनुबन्धों का प्यार।
परम्पराओं तक सभी, सिमट गये त्यौहार।।
उपवन में मंगल नहीं, मौसम है प्रतिकूल।
अब तो पेड़-पहाड़ भी, नहीं रहे अनुकूल।।
आपाधापी है मची, दुनियाभर में आज।
केवल मतलब के लिए, होते हैं सब काज।।
भवनों की मजबूत अब, नहीं रही प्राचीर।
कहाँ आचमन को करें, दूषित गंगा नीर।।
पण्डित-मुल्ला-पादरी, फेंक रहे हैं पाश।
धरम-करम का कर रहे, ये ही सत्यानाश।।
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