जिस बालक का ईश पर, था अनुराग अनन्य।
उस नानक के जन्म से, देश हो गया
धन्य।।
जाते हैं करतारपुर, जत्थों में सिख
लोग।
आया सत्तर साल में, आज सुखद संयोग।।
सरिताओं में बह रहा, अब तो पावन नीर।
गंगा में डुबकी लगा, निर्मल करो
शरीर।।
नदी-झील का मिट गया, अब तो सारा पंक।
पूनम की इस रात में, खुलकर हँसा
मयंक।।
सरिताओं के तीर पर, जुटे हुए हैं
लोग।
जगह-जगह पर बन गया, मेलों का संयोग।।
किया कार्तिक मास ने, सरदी का आगाज।
हर गंगे की गूँजती, कानो में आवाज।।
मेले में खिचड़ी पका, लोग हो रहे
मस्त।
भेद-भाव के हो गये, दुर्ग यहाँ पर
ध्वस्त।।
फल के ठेले हैं सजे, फूलों की दूकान।
बच्चों के मुख पर दिखी, मेले में मुस्कान।।
सबजी बिकती धान से, दाम नहीं है पास।
बिन पैसे के कृषक का, मेला हुआ उदास।।
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शुक्रवार, 8 नवंबर 2019
दोहे "आज सुखद संयोग" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 7 नवंबर 2019
गीत "खाली पन्नों को भरता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
घर-आँगन-कानन में जाकर मैं,
अपनी तुकबन्दी करता हूँ।
अनुभावों का अनुगायक हूँ,
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।
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है नहीं मापनी का गुनिया,
अब तो अतुकान्त लिखे दुनिया।
असमंजस में हैं सब बालक,
क्या याद करे इनको मुनिया।
मैं बन करके पागल कोकिल,
खाली पन्नों को भरता हूँ।
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।
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आयुक्त फिरें मारे-मारे,
उन्मुक्त हुए बन्धन सारे।
जीवन उपवन के शब्दों में,
अब तुप्त हो गये बंजारे।
पतझर की मारी बगिया में,
मैं सुमन सुगन्धित झरता हूँ।
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।
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दे पन्त-निराला की मिसाल,
चौकीदारी करते विडाल।
निर्मल कैसे अब नीर रहे,
कचरा गंगा में रहे डाल।
मिलते हैं मोती बगुलों को,
मैं घास-पात को चरता हूँ।
मैं कवि लिखने से डरता हूँ।।
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मंगलवार, 5 नवंबर 2019
दोहे "लिखने का है रोग (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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देते मुझको हौसला, कदम-कदम पर मीत।
बन जाते हैं इसलिए, ग़ज़लें,
दोहे-गीत।।
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शब्द और व्याकरण का, मुझे नहीं कुछ
ज्ञान।
इसीलिए करता नहीं, मैं झूठा अभिमान।।
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टंकण कर लेता तभी, जब आते कुछ भाव।
शब्दों में करता नहीं, जोड़-तोड़
बदलाव।।
गीत-ग़ज़ल दोहे लिखे, किये कई
अनुवाद।
रचनाओं से स्वयं की, करता खुद
संवाद।।
नहीं मुझे यह ज्ञात है, कैसे बनते
छन्द।
किन्तु नित्य लिखकर मुझे, मिलता है आनन्द।।
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कंकड़-काँटों से भरी, राह बहुत
विकराल।
फिर भी प्रतिदिन लक्ष्य पर, सीधी
चलता चाल।।
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जब भी आकर घेरते, जीवन में अवरोध।
करवाते हैं भूल का, तब वो मुझको बोध।।
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मेरे मन की बात को, श्लाघा कहते लोग।
लेकिन तन-मन में बसा, लिखने का है
रोग।।
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ग़ज़ल "ख़ुदगर्ज़ी का हुआ ज़माना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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नहीं रहा अब समय पुराना
ख़ुदगर्ज़ी का हुआ ज़माना
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कैसे बुने कबीर चदरिया
उलझ गया है ताना-बाना
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पसरी है सब जगह मिलावट
नकली पानी नकली दाना
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देशभक्त हैं दुखी देश में
लूट रहे मक्कार खज़ाना
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आजादी अभिशाप बन गयी
हुआ बेसुरा आज तराना
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दीन-धर्म के फन्दे में है
मानवता का अब अफसाना
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'रूप' देखकर दे देते वो
हमें भीख में कुछ नज़राना
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सोमवार, 4 नवंबर 2019
बाल कविता "मेरी प्यारी पोती" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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इतनी जल्दी क्या है बिटिया,
सिर पर पल्लू लाने की। अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग, समय बिताने की।।
मम्मी-पापा तुम्हें देख कर,
मन ही मन हर्षाते हैं।
जब वो नन्ही सी बेटी की,
छवि आखों में पाते है।।
जब आयेगा समय सुहाना,
देंगे हम उपहार तुम्हें। तन मन धन से सब सौगातें, देंगे बारम्बार तुम्हें।। दादी-बाबा की प्यारी, तुम सबकी राजदुलारी हो। घर आंगन की बगिया की, तुम मनमोहक फुलवारी हो।। सबकी आँखों में बसती हो, इस घर की तुम दुनिया हो। प्राची तुम हो बड़ी सलोनी, मेरी प्यारी मुनिया हो।। |
रविवार, 3 नवंबर 2019
बालगीत "नाम गिलहरी-बहुत छरहरी," (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
"गिलहरी"
बैठ मजे से मेरी छत पर,
दाना-दुनका खाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
![]()
तुमको पास बुलाने को,
मैं मूँगफली दिखलाता हूँ,
कट्टो-कट्टो कहकर तुमको,
जब आवाज लगाता हूँ,
कुट-कुट करती हुई तभी तुम,
जल्दी से आ जाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
![]()
नाम गिलहरी, बहुत छरहरी,
आँखों में चंचलता है,
अंग मर्मरी, रंग सुनहरी,
मन में भरी चपलता है,
हाथों में सामग्री लेकर,
बड़े चाव से खाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
![]()
पेड़ों की कोटर में बैठी
धूप गुनगुनी सेंक रही हो,
कुछ अपनी ही धुन में ऐंठी
टुकर-टुकरकर देख रही हो,
भागो-दौड़ो आलस छोड़ो,
सीख हमें सिखलाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
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शनिवार, 2 नवंबर 2019
गीतिका "नगमगी 'रूप' ढल जायेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सुबह होगी तो सूरज निकल
जायेगा
वक्त के साथ सब कुछ बदल
जायेगा
जिन्दगी में कभी हार मत
मानना
धूप में बर्फ सारा पिघल
जायेगा
दिल की कोटर में भी तो जलाओ दिया
देखकर रौशनी मनल मचल
जायेगा
पोथियाँ तो जगत की पढ़ो
प्यार से
दम्भ का आशियाँ खुद दहल
जायेगा
जूझना मत कभी बे-वजहा आप
से
नेह का दीप जीवन में जल
जायेगा
अपने अशआर तो अंजुमन में
कहो
बात कहने से दिल भी बहल जायेगा
इस जहाँ में अमर कोई होता
नहीं
एक दिन नगमगी 'रूप' ढल
जायेगा
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