बच्चे गुझिया बना रहे हैं, होली की है तैयारी। दहीबड़े, पापड़-मठरी की, कल को आयेगी बारी।। जब गुझिया बन जायेंगी, तब इन को तल देगी दादी, खाने-पीने, मौज मनाने की, होली पर आजादी, खेत-बाग-वन चहक रहे हैं, महक रही है फुलवारी। दहीबड़े, पापड़-मठरी की, कल को आयेगी बारी।।
होली का त्यौहार उमंगें- आशाएँ लेकर आता, बैर-भाव को भुला दीजिए, सीख हमें ये सिखलाता, खुश हो करके मिलो सभी से, है कुटुम्भ धरती सारी। दहीबड़े, पापड़-मठरी की, कल को आयेगी बारी।।
इन मोहक पकवानों को सब, कई दिनों तक खायेंगे, गली-मुहल्ले के लोगों को, रंगों से नहलायेंगे, बाबा जी पोती-पोतों को, दिलवायेंगे पिचकारी। दहीबड़े, पापड़-मठरी की, कल को आयेगी बारी।। -- |
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सोमवार, 6 मार्च 2023
बालगीत "रंगों से नहलायेंगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 5 मार्च 2023
गीत "मेरे पौत्र प्रांजल का जन्मदिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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होली गीत "लाल-हरी रंगोली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
गाँव-गली और बाजारों में घूम रहीं हैं टोली। हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।। कोई पीकर भंग नाचता, कोई सुरा चढ़ाए, कोई राग-रागनी गाता, कोई ढोल बजाए, मस्तक-चेहरों पर चित्रित है लाल-हरी रंगोली। हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।। पश्चिम से पछुवा चलती है, पूरब से पुरवाई, जाड़े का अब अन्त हो गया, रुत गर्मी की आई, अम्बुआ की गदराई डालों पर, कोयल है बोली। हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।। हरी बालियों ने गेहूँ की, धारा रूप सलोना, दूर-दूर तक खेतों में, कंचन का बिछा बिछौना, डर लगता है घन जब नभ में, करता आँखमिचौली। हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।। जन-गण-मन की है अभिलाषा, रूठे मिलें गले से, होली लेकर आती आशा, रिश्ते बनें भले से, कल तक जो थे अलग-थलग, वो बन जाएँ हमजोली। हुल्लड़ और धमाल मचाने, फिर से आई होली।। -- |
शनिवार, 4 मार्च 2023
दोहे "रंग-बिरंगे गाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- केसरिया परिधान से, मन में भरो उमंग। होली में अपनाइए, टेसू के ही रंग।1। वासन्ती मौसम हुआ, लोग हो रहे दंग। होली के त्यौहार में, बहुत निराले ढंग।2। -- होली ने मन में भरा, प्यार और उन्माद। जल जाती है होलिका, बच जाता प्रहलाद।3। -- देवर-भाभी के हुए, रंग-बिरंगे गाल। गुझिया-मठरी कुरकुरे, मन को करे निहाल।4। -- ठण्डाई में डालिए, अदरख-तुलसीपत्र। खेलो होली प्यार से, यत्र-तत्र-सर्वत्र।5। -- देख खेत में धान्य को, खुश हो रहे किसान। होली में दे दीजिए, होलक का शुभ दान।6। -- भेद-भाव को भूलकर, खेलो होली मित्र। नशा छोड़कर कीजिए, वातावरण पवित्र।7। -- |
शुक्रवार, 3 मार्च 2023
दोहे "रंगों का उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- प्रेम और सौहार्द्र है, होली का आधार। गले मिलो सब प्यार से, कहता ये त्यौहार।1। -- बैर-भाव को भूलकर, कर लो सबसे प्यार।। खुश हो करके बाँटिए,
रंगों का उपहार।2। हँसी-ठिठोली को करो,
मर्यादा के संग। जो लगवाये प्यार से,
उसे लगाओ रंग।3। -- सम्बन्धों में चाहिए,
रहना सदा उदार। सतरंगी सपने करो, जीवन में साकार।4। -- दुनिया में कायम रहे, भाईचारा-प्यार। रंगभेद को मेटता, होली का त्यौहार।5। -- जो खुश होकर खेलता, उससे खेलो रंग। मन भरके मनमीत को, आज लगाओ अंग।6। -- रंगों की बौछार हो, या पानी की धार। मीठा है नमकीन भी, होली का त्यौहार।7। -- होली के त्यौहार पर, मन में भरो उमंग। होता भाँग-शराब से, सदा रंग में भंग।8। -- जैसे गंगा जी नीर में, उठती लहर-तरंग। वैसे ही अपनाइए, सरल-तरल कुछ ढंग।9। -- शीतलता कम हो गयी, आया फागुन मास। जीवन में छाया हुआ, हर्ष
और उल्लास।10। -- चलता है पछुआ पवन, खिली
हुई है धूप। गेहूँ ने धारण किया, कंचन
जैसा रूप।11। -- |
गुरुवार, 2 मार्च 2023
गीत "ढंग निराला होली के त्यौहार का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- वासन्ती मौसम आया है, -- |
बुधवार, 1 मार्च 2023
पन्द्रह दोहे "होली में अब फाग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बहता पानी ही करे, कल-कल शब्द निनाद। कर्मों से ही व्यक्ति को, रक्खा जाता याद।1। लेखन-पाठन का करो, सच्चे मन से काम। दुनियाभर में आपका, हो जायेगा नाम।2। उपवन में खिलने लगे, रंग-बिरंगे फूल। प्यार बाँटने के लिए, मौसम है अनुकूल।3। उग्रवाद-अलगाव की, सुलग रही है आग। लोग खून से खेलते, होली में अब फाग।4। धर्म-जाति के नाम पर, बढ़ने लगा जुनून। राजनीति के जाल में, सिसक रहा कानून।5। नगर-गाँव में बढ़ रहे, अब तो खूब दलाल। रोटीखोरों ने किया, वतन आज कंगाल।6। दुशमन की जय बोलकर, जला रहे जो देश। देश निकाले का उन्हें, जारी हो आदेश।7। जो भी पाकिस्तान के, बोल रहे हैं बोल। अब उन सबके नाम को, करो देश से गोल।8। अब पछुआ चलने लगी, सर्दी गयी सिधार। कुछ दिन में आ जायगा, होली का त्यौहार।9। महक रहा सारा चमन, चहक रहा मधुमास। होली का होने लगा, जन-जन को आभास।10। अंगारा बनकर खिला, वन में वृक्ष पलाश। रंग, गुलाल-अबीर की, आने लगी सुवास।11। गेहूँ पर हैं बालियाँ, कुन्दन सा है रूप। सरसों और मसूर को, सुखा रही है धूप।12। अम्मा मठरी बेलती, सजनी तलती जाय। सजना इनको प्यार से, चटकारे ले खाय।13। भाषण से मिटती नहीं, कभी किसी की भूख। फल देने वाले शजर, गये कभी के सूख।14। ब्लॉग-जगत का अब नहीं, रहा सुनहरा काल। मुखपोथी पर मिल रहा, सभी तरह का माल।15। *मुखपोथी अर्थात *फेसबुक |
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