-- खुद को वाद-विवाद से, रखना हरदम दूर। मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।। -- आडम्बर को देखकर, ईश हुआ हैरान। आज आदमी हो गया, धरती का भगवान।। छल-फरेब मन में भरा, होठों पर हरिनाम। काम-काम को छल रहा, अब तो आठों याम।। ठोंगी साधू-सन्त तो, मद में रहते चूर। मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।१। -- गेँहूँ-चावल-दाल से, भरे हुए गोदाम। अकस्मात कैसे बढ़े, खान-पान के दाम।। पहले जैसे हैं कहाँ, हरे-भरे मैदान। घटते ही अब जा रहे, खेत और खलिहान। आपे से बाहर हुई, अरहर-मूँग-मसूर। मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।२। -- प्रजातन्त्र में बढ़ गया, कितना भ्रष्टाचार। जालसाजियों को रही, बचा आज सरकार।। नकली लिए उपाधियाँ, शासक करते राज। घोटालों में लिप्त हैं, बड़े-बड़े अधिराज। जनता के ही राज में जनता है मजबूर। मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।३। -- सत्ता पाने के लिए, होते पूजा जाप। मतलब में सब कह रहे, आज गधे को बाप।। दाता थे जो अन्न के, आज हुए कंगाल। लालाओं ने भर लिया, गोदामों में माल। मजदूरी मिलती नहीं, पढ़े-लिखे मजदूर। मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।४। -- पुख़्ता करने में लगे, नेतागण बुनियाद। निर्धन श्रमिक-किसान की, कौन सुने फरियाद।। कहने को आजाद है, लोकतन्त्र में लोग। सबकी किस्मत में नहीं, लड्डू-माखनभोग।। अपनी कलम-कृपाण से, लिखता हूँ भरपूर।। मरे हुए को मारना, दुनिया का दस्तूर।५। -- |
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मंगलवार, 6 जून 2023
दोहागीत "जनता है मजबूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 5 जून 2023
दोहे "पर्यावरण बचाइए, बचे रहेंगे आप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- प्राणवायु का पेड़ ही, होते हैं आधार। पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का सिंगार।। -- पेड़ लगाना भूमि पर, मानव का है कर्म। पर्यावरण सुधारना, हम सबका है धर्म।। -- हरितक्रान्ति से ही मिटे, धरती का सन्ताप। पर्यावरण बचाइए, बचे रहेंगे आप।। -- पेड़ भगाते रोग को, बनकर वैद्य-हकीम। प्राणवायु देते हमें, बरगद, पीपल-नीम।। -- कहने से वातावरण, होगा नहीं पवित्र। धरा बचाने के लिए, वृक्ष लगाओ मित्र।। -- जागरूक होगा नहीं, जब तक हर इंसान। हरा-भरा तब तक नहीं, भू का हो परिधान।। -- कंकरीट जबसे बना, जीवन का आधार। तबसे पर्यावरण की, हुई करारी हार।। -- पेड़ कट गये भूमि के, बंजर हुई जमीन। प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।। -- नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव। दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।। -- |
यात्रा संस्मरण "महेन्द्रनगर नेपाल की यात्रा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
रविवार, 4 जून 2023
ग़ज़ल "टूटी पतवार लिए बैठा हूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- गम का अम्बार लिए बैठा हूँ लुटा दरबार लिए बैठा हूँ -- नाव अब पार लगेगी टूटी पतवार लिए बैठा हूँ -- जा चुकी है कभी की सरदारी फिर भी दस्तार लिए बैठा हूँ -- बेईमानों के बीच में रहकर पाक किरदार लिए बैठा हूँ -- इश्क के खेल का खिलाड़ी हूँ जीत में हार लिए बैठा हूँ -- देख हालत बुरी ज़माने की दिल में अंगार लिए बैठा हूँ -- रुपहले “रूप” के इदारों में मैं कल़मकार लिए बैठा हूँ -- |
शनिवार, 3 जून 2023
ग़ज़ल "गिरे शिवधाम के पत्थर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- भले हों नाम के पत्थर मगर हैं काम के पत्थर -- समन्दर में भी तिरते हैं अगर हों राम के पत्थर -- बढ़े जब पाप धरती पर गिरे शिवधाम के पत्थर -- हुआ है आम बेचारा चले हुक्काम के पत्थर -- कभी जो मुफ्त मिलते थे हुए अब दाम के पत्थर -- बचेंगी बस्तियाँ कैसे खिसकते बाँध के पत्थर -- हमेशा झेलता है “रूप” क्यों इलज़ाम के पत्थर -- |
शुक्रवार, 2 जून 2023
ग़ज़ल "मुश्किल से मिलती है यहाँ दो जून की रोटी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- महीना जेठ का का आया, हुई हैं रात अब छोटी बड़ी मुश्किल से मिलती है, मगर दो जून की रोटी -- श्रमिक को हो गया दूभर. यहाँ दो जून का खाना बढ़ी महँगाई तो मजदूर की, किस्मत हुई खोटी -- उन्हें क्या फर्क पड़ता है, नहीं बाजार जो जाते जिन्हें हर माह मिल जाती, पगारें मुफ्त में मोटी -- हमारे देश में नेताओं का, ईमान गिरवीं है सियासत में मुनाफा देखकर, बैठा रहे गोटी -- हमेशा रंग बदला है, हमेशा “रूप” बदला है कभी दाढ़ी बढ़ाते हैं, रखाते हैं कभी चोटी -- |
गुरुवार, 1 जून 2023
गीत "रूप न ऐसा हमको भाता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- सूरज आग उगलता जाता। नभ में घन का पता न पाता।१। -- जन-जीवन है अकुलाया सा, कोमल पौधा मुर्झाया सा, सूखा सम्बन्धों का नाता। नभ में घन का पता न पाता।२। -- सूख रहे हैं बाँध सरोवर, धूप निगलती आज धरोहर, रूठ गया है आज विधाता। नभ में घन का पता न पाता।३। -- दादुर जल बिन बहुत उदासा, चिल्लाता है चातक प्यासा, थक कर चूर हुआ उद्गाता। नभ में घन का पता न पाता।४। -- बहता तन से बहुत पसीना, जिसने सारा सुख है छीना, गर्मी से तन-मन अकुलाता। नभ में घन का पता न पाता।५। -- खेतों में पड़ गयी दरारें, कब आयेंगी नेह फुहारें, “रूप” न ऐसा हमको भाता। नभ में घन का पता न पाता।६। -- |
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आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
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आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
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"चौपाई लिखिए" बहुत समय से चौपाई के विषय में कुछ लिखने की सोच रहा था! आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख। यहाँ ...
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