-- मै प्यार का हूँ राही और प्यार माँगता हूँ। मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।। -- सूनी सी ये डगर हैं, अनजान सा नगर हैं, चन्दा से चाँदनी का आधार माँगता हूँ। मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।। -- सूरज चमक रहा है, जग-मग दमक रहा है, किरणों से रोशनी का संसार माँगता हूँ। मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।। -- यह प्रीत की है डोरी, ममता की मीठी लोरी. मैं स्नेहसिक्त पावन परिवार माँगता हूँ। मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।। -- |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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सोमवार, 7 अगस्त 2023
गीत "रोशनी का संसार माँगता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
रविवार, 6 अगस्त 2023
दोहे "मित्र शब्द का है नहीं, कोई अन्य विकल्प" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आज मित्रता-दिवस पर, कर लेना संकल्प। मित्र शब्द का है नहीं, कोई अन्य विकल्प।। -- सौ-सौ बार विचारिए, क्या होता है मित्र। खूब जाँचिए-परखिए, उसका चित्त-चरित्र।। -- हम तो प्रतिदिन माँगते, दुनियाभर की खैर। अमन-चैन से सब रहें, अपने हों या गैर।। -- जिस पग पर काँटे चुभें, वहाँ न रखना पैर। जहाँ एक दिन मित्रता, बाकी दिन हो बैर।। -- मतलब की अब मित्रता, मतलब का सब प्यार। मतलब के ही तो लिए, होती है मनुहार।। -- हँसी-खेल मत समझिए, दुनिया बड़ी विचित्र। जीवन में है मित्रता, पावन और पवित्र।। -- जिसको अपना कह दिया, वो जीवनभर मीत। सच्ची होनी चाहिए, दिल में उपजी प्रीत।। -- उनसे कैसी मित्रता, जो करते हैं घात। ऐसे लोगों से बचो, जो करते उत्पात।। -- करते मुख के सामने, मीठी-मीठी बात। होता नहीं कुतर्क से, कोई भी विख्यात।। -- मनवाना जो चाहता, अपनी बात बलात्। वो दुर्जन करता सदा, सज्जन पर आघात।। -- दुष्ट नहीं माने कभी, धर्म-कर्म उपदेश। उलटे लगते हैं उसे, उपयोगी सन्देश।। -- बिना विचारे जो करे, वाणी का संधान। वो मानव के रूप में, साक्षात् हैवान।। -- |
शनिवार, 5 अगस्त 2023
गीत "स्वतन्त्रता का नारा है बेकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
-- जिस उपवन में पढ़े-लिखे हों रोजी को लाचार। उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।। -- जिनके बंगलों के ऊपर, निर्लज्ज ध्वजा लहराती, रैन-दिवस चरणों को जिनके, निर्धन सुता दबाती, जिस आँगन में खुलकर होता सत्ता का व्यापार। उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।। -- मुस्टण्डों को दूध-मखाने, बालक भूखों मरते, जोशी, मुल्ला, पीर, नजूमी, दौलत से घर भरते, भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार। उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।। -- |
शुक्रवार, 4 अगस्त 2023
दोहे "तुलसीदास-कण-कण में श्री राम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
श्रावण शुक्ला सप्तमी, दिवस आज है खास। माँ हुलसी की कोख से, जनमे तुलसीदास।। -- मानस के इस सन्त का, जन्म दिवस है आज। मना रहा अनुभाव से, जिसको आज समाज।। -- मर्यादित श्री राम का, लिया सबल आधार। मानस की महिमा सभी, करते हैं स्वीकार।। -- अपने भारत देश में, कण-कण में श्री राम। राम नाम के जाप से, बनते बिगड़े काम।। -- कविवर तुलसीदास ने, दिया हमें उपहार। दोहा-चौपाई हरें, मन के सकल विकार।। -- जिसने सत् साहित्य का, चमन किया गुलजार। उस हुलसी के लाल को, नमन हजारों बार। -- जो करता है भक्ति का, जन-जन में संचार। उसकी ही होती सदा, जग में जय-जयकार।। -- |
गुरुवार, 3 अगस्त 2023
गीत "बहुत चाव से खाया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- गया आम का मौसम, प्लम बाजारों में अब छाया। इनको देख-देख कर देखो, सबका मन ललचाया।। -- लाल-लाल हैं जितने पोलम, वो हैं खट्टे-मीठे, लेकिन जो महरून रंग के, वो लगते हैं मीठे, पर्वत से शृंगार उतर कर, मैदानों में आया। -- अल्मौड़ा, चौखुटिया, नैनीताल और चम्पावत, प्लम के पेड़ों के बागीचे, फैले हैं बहुतायत, हरे-भरे इन वृक्षों ने है, मन को बहुत लुभाया। -- ये मौसम की मार झेलकर, कितने हुए रसीले, बारिश का पानी पीकर, हो जाते नीले-पीले, बच्चों और बड़ों ने इनको बहुत चाव से खाया। -- |
बुधवार, 2 अगस्त 2023
ग़ज़ल "गैरों से सहारों की, कभी उम्मीद मत करना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- खिजाओं से बहारों की, कभी उम्मीद मत करना घटाओं में सितारों की, कभी उम्मीद मत करना -- भले हों दूर वे घर से, मगर अपने तो अपने हैं गैरों से सहारों की, कभी उम्मीद मत करना -- हुए गद्दीनशीं जो हैं, लुटा भरपूर दौलत को यहाँ उनसे सुधारों की, कभी उम्मीद मत करना -- गरज से ही डराते हैं, बरसते जो नहीं बादल फुहारों की यहाँ उनसे, कभी उम्मीद मत करना -- मजहब के नाम पर सबको, पढ़ाते पाठ नफरत का अमन की उन इदारों से, कभी उम्मीद मत करना -- फिदा केशर की क्यारी पर, यहाँ बहरूपिये कितने विदेशी चाटुकारों पर, कभी उम्मीद मत करना -- मठों में भ्रष्ट सन्यासी, जहाँ हो 'रूप' के लोभी वहाँ अच्छे विचारों की, कभी उम्मीद मत करना -- |
मंगलवार, 1 अगस्त 2023
दोहे "आती नहीं तमीज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- बतलाते खुद को सभी, दुनिया में नाचीज। लेकिन बिन मतलब नहीं, होते लोग अजीज।। -- पहनो चाहे कण्ठ में, कितने ही ताबीज। लेकिन अनुभव के बिना, आती नहीं तमीज।। -- हद से ज्यादा चतुर तो, होता नहीं उदार। उनसे मत करना कभी, जीवन में व्यापार।। -- आज समझ में आ गयी, दुनिया की औकात। मतलब के संसार में, है मतलब की बात।। -- भोलेपन में मत कभी, करना कुछ उपकार। कृतज्ञता को मानता, नहीं आज संसार।। -- जो करते हद से अधिक, चिकनी-चुपड़ी बात। अक्सर ऐसे लोग ही, पहुँचाते आघात।। -- घर-घर जाकर खोजते, जो हैं नित्य शिकार। उन लोगों की मित्रता, मत करना स्वीकार।। -- |
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