-- जिन्दगी में बसन्त छाया है शीत का अब हुआ सफाया है -- फूल खिलते हैं, हँस रहीं कलियाँ फिर से मौसम बहार लाया है -- नीर नदियों में बह रहा कलकल मुद्दतों में बसन्त आया है। -- प्रेम का रंग अब बसन्ती है दौर अब आशिकी का आया है -- बौर को देखकर बगीचों में फिर से कोयल ने गान गाया है राम का बन गया नया मन्दिर अब अयोध्या में रूप आया है जंगलों में चहक रहे टेसू किसने गुलदान ये सजाया है -- खेत में हँस रही फसल सारी पीत रँग ओढ़नी ने पाया है -- प्यार की आग में धुँआ नहीं होता 'रूप' ने आशियाँ बनाया है -- |
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गुरुवार, 8 फ़रवरी 2024
ग़ज़ल "जिन्दगी में बसन्त छाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 7 फ़रवरी 2024
गीत "नयनों की भाषा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- आशा और निराशा की जो, पढ़ लेते हैं सारी भाषा। दो नयनों में ही होती हैं, सारी दुनिया की परिभाषा।। -- दुख के बादल आते ही ये, खारे जल को हैं बरसाते। सुख का जब अनुभव होता है, तब ये फूले नहीं समाते। सरल बहुत हैं-चंचल भी हैं, इनके भीतर भरी पिपासा। दो नयनों में ही होती हैं, सारी दुनिया की परिभाषा।। -- कुछ में होती है खुद्दारी, कुछ में होती है मक्कारी। कुछ ऐसी भी आँखें होती, जिनमें होती है गद्दारी। ऐसी बे-ग़ैरत आँखों से, मन में होती बहुत हताशा। दो नयनों में ही होती हैं, सारी दुनिया की परिभाषा।। -- दुनिया भर की सरिताओं का, इसमें आकर पानी ठहरा। लहर-लहरकर लहरें उठतीं, ये भावों का सागर गहरा। बिन आँखों के जग सूना है, ये जीवन की हैं अभिलाषा। दो नयनों में ही होती हैं, सारी दुनिया की परिभाषा।। -- |
मंगलवार, 6 फ़रवरी 2024
दोहे "अब तो मस्त बयार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सरदी अब घटने लगी, चहका है मधुमास। खेतों से नव-अन्न की, आने लगी सुवास।। -- बया नीड़ से झाँकती, अपने चारों ओर। हरित धरा पर हो गयी, अब तो सुन्दर भोर।। -- धूम मचाने आ गया, फिर से अब ऋतुराज। बदल गया मधुमास में, सबका आज मिजाज।। -- जोड़ों पर चढ़ने लगा, फिर से इश्क बुखार। वादों की चलने लगी, अब तो मस्त बयार।। -- लगा पिघलने हिमालय, बहता शीतल नीर। काँवड़ लेने जायेंगे, अब बहनों के वीर।। -- मौसम आवारा हुआ, उमड़ रहा है प्यार। नेह-नीर का पान कर, फूल बने उपहार।। -- बिखरे चारों ओर हैं, प्रेम-दिवस के रंग। दकियानूसी लोग तो, करें रंग में भंग।। -- |
सोमवार, 5 फ़रवरी 2024
तीन मुक्तक "दाग़ तो दाग़ है ज़िन्दग़ी के लिए" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
(१) आग से खेलना मत, जलाती है ये अपनी औकात सबको, बताती है ये सिर्फ ज़ज़्बात से बात बनती नहीं, दिल्लगी दिल-लगी बन सताती है ये (२) श्वेत परिधान हैं, सादगी के लिए सभ्यता है बनी, आदमी के लिए दाग माथे का हो या हो पौशाक का दाग़ तो दाग़ है ज़िन्दग़ी के लिए (३) सात रंगों सी सुहानी, फाग है ये ज़िन्दग़ी दोस्ती की गन्ध देती, बाग़ है ये ज़िन्दग़ी ज़िन्दग़ी में ग़लत सुर को, मत लगा देना कभी प्रीत के अनुराग जैसा, राग है ये ज़िन्द़गी -- |
रविवार, 4 फ़रवरी 2024
जन्मदिन-गीत "ज़िन्दगी की जेल में, मैं पल रहा हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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-- जन्मदिन का जश्न है केवल
छलावा, लोग कहते हैं अँधेरे को
सवेरा।। घट गया इक साल मेरी उम्र का, लोग कहते जन्मदिन है आज
मेरा।। -- आस का दामन पकड़कर चल रहा
हूँ, ज़िन्दगी की जेल में, मैं पल
रहा हूँ, इस धरा की एक ढलती शाम हूँ
मैं क्या पता कब उजड़ जाए ये
बसेरा। लोग कहते जन्मदिन है आज
मेरा।। -- टिमटिमाता हुआ सा खद्योत
हूँ मैं, सिन्धु में ठहरा हुआ जलपोत
हूँ मैं, सबल लहरों से भला कब तक
लड़ूँगा, तिमिर ने चारों तरफ से आज
घेरा। लोग कहते जन्मदिन है आज
मेरा।। -- कब तलक लंगर सम्भाले मैं
रहूँगा, कब तलक इस रोग की पीड़ा
सहूँगा, है सफर की आखिरी मंजिल अज़ल, चाँदनी के बाद आता है
अँधेरा। लोग कहते जन्मदिन है आज
मेरा।। -- |
शनिवार, 3 फ़रवरी 2024
दोहे "कुदरत का प्रारूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- कल
क्या होगा क्या पता, नहीं किसी को भान। सब
अपने ही ढंग से, लगा रहे अनुमान।। -- पल
भर में बादल घिरें, पल में खिलती धूप। तय
करता भगवान है, कुदरत का प्रारूप।। -- मौसम
के विज्ञान पर, मतकर झूठ बखान। विधि
के अटल विधान को, कोई सका न जान।। -- गीतों
के परिवेश में, बहुत जरूरी टेक। माथा-पच्ची
कीजिए, रखकर साथ विवेक।। -- मन्दिर
में भगवान का, होता है अभिषेक। अपनी
लीला का वही, जगतनियन्ता एक।। -- गंगा-यमुना
बह रहीं, कलकल करतीं शोर। सूरज
की अरुणिम प्रभा, करती भाव विभोर।। -- मन
के हर्ष-विषाद पर, मत करना अफसोस। अधिक
समय टिकती नहीं, घास-पात पर ओस।। -- |
शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2024
वैवाहिक वर्षगाँठ "खुशियों की हों तरल-तरंगें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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-- जीवन में हों नई उमंगे, वर दो ऐसा माता गंगे, -- नया गीत हो नव सरगम हों, पथ पर चलते हुए कदम हों, साज सजे हों, राग नये हों, उर-कोटर में भाव नये हों, खुशियों की हों तरल-तरंगें, वर दो ऐसा माता गंगे।। -- कभी न लालच-लोभ सताये, उन्नति के सोपान चढ़ाओ, प्रेम-प्रीत की बेल बढ़ाओ, गगन-धरा हों रंग-बिरंगे। वर दो ऐसा माता गंगे।। स्वस्थ-सलोना, जीवन जीना, मन्दिर सा मन-सदन सजाना, अपनी मंजिल को पा जाना, भाव-रस्म छूटें बेरंगे। वर दो ऐसा माता गंगे।। पूरी हों सब आस अधूरी, महके जीवन, चहके उपवन, खुशियों से जग-मग हो आँगन, छँट जायें बादल-बेढंगे। वर दो ऐसा माता गंगे।। -- |
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