-- ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है रात में उगता हुआ माहताब है -- था कभी ओझल हुआ जो रास्ता अब नज़र आने लगा मेहराब है -- आसमां से छँट गयीं अब बदलियाँ अब खुशी का आ गया सैलाब है -- पत्थरों में प्यार का ज़ज़्बा बढ़ा अब बगीचे में ग़ुलों पर आब है -- फूल पर मँडरा रहा भँवरा रसिक एक बोसे के लिए बेताब है -- शाम ढलने पर कुमुद हँसने लगे भा रहा कीचड़ भरा तालाब है -- रोज़ आती रौशनी की रश्मियाँ ख़्वाब का ये “रूप” भी नायाब है -- |
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बुधवार, 23 अक्टूबर 2024
ग़ज़ल "अब बगीचे में ग़ुलों पर आब है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 21 अक्टूबर 2024
आलेख “दुनिया का सबसे कुशल वास्तुविद” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 20 अक्टूबर 2024
दोहे "करवे का त्यौहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
--करती सभी सुहागिनें, निज पतियों पर गर्व। |
शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024
दोहे "विजय पर्व के बाद में, लोग हुए निःशंक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
त्यौहारों पर किसी का, रहे न खाली हाथ। पञ्च पर्व दीपावली, लाती अपने साथ।। -- नौ दिन ही नवरात्र के, होते पुत्री पर्व। देवी हैं सब बेटियाँ, जिन पर हमको गर्व।। -- विजय पर्व के बाद में, लोग हुए निःशंक। अँधियारे को चीरकर, नभ में हँसे मयंक।। -- साजन-सजनी के लिए, चौथ दिवस है खास। सजनी करवाचौथ पर, रखती है उपवास।। -- कुलदीपक के है लिए, पर्व अहोई खास। होती अपने तनय पर माताओं को आस।। -- खुश हो करके बाँटिए, लोगों को उपहार। मास कार्तिक में बहुत, आते हैं त्यौहार।। -- चाहे कोई वार हो, कोई हो तारीख। संस्कार देते हमें, कदम-कदम पर सीख।। -- |
बुधवार, 16 अक्टूबर 2024
दोहे "शरद पूर्णिमा पर हँसा, खुलकर आज मयंक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शरद पूर्णिमा पर हँसा, खुलकर आज मयंक। |
मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024
दोहे "साले हैं उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- अपनी सजनी से अगर, पाना चाहो प्यार। जीवनभर करते रहो, सालों की मनुहार।। -- होते हैं ससुराल का, साले ही आधार। समय-समय पर बाँटिए, सालों को उपहार।। -- घर का हो गर चाहते, आप शान्त परिवेश। धन पर करने दीजिए, निज सालों को ऐश।। -- साधारण से हों अगर, जीजा के परिधान। मिलता है ससुराल में, बस उसको अपमान।। -- अगर देखना चाहते, दुनिया में मक्कार। मन में आये उभर कर, सालों का आकार।। -- जीवन अपना ढालिए, सालों के अनुसार। सालों से करना नहीं, नोंक-झोंक-तकरार।। -- सतयुग या कलिकाल हो, कहता जीवन शास्त्र। साले जीजा के लिए, रहे दया के पात्र।। -- रूप सुहाना हो भले, आदत में हैं कंस। बगुलों को तो भूल से, समझ न लेना हंस।। -- खान-पान में चाहिए, रोगी को अनुपान। बिन अनुभव बेकार है, दुनियाभर का ज्ञान।। -- |
सोमवार, 14 अक्टूबर 2024
दोहे "साली रस की खान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- सम्बन्धों का है यहाँ, अजब-गजब संसार। घरवाली से भी अधिक, साली से है प्यार।। -- अपनी बहनों से नहीं, भाई करते प्यार। किन्तु सालियों से करें, प्यारभरी मनुहार।। -- जीजा-साली का बहुत, होता नाता खास। जिनके साली हैं नहीं, वो हैं बहुत उदास।। -- साली से अनुराग है, सालों से ससुराल। साली जीजा का रखे, सबसे ज्यादा ख्याल।। -- साली जीजा के लिए, होती है अनुकूल। लगती उसकी गालियाँ, जीजा जी को फूल।। -- साली के बिन तो लगे, सूना सब संसार। सम्बन्धों का सालियाँ, होती हैं आधार।। -- छोटी हो चाहे बड़ी, साली रस की खान। इसीलिए तो सब करें, साली का गुणगान।। -- साली है ऐसा सुमन, जिसमें है मकरन्द। साली की तो गन्ध से, मिल जाता आनन्द।। -- कभी रहे इकरार तो, कभी रहे इनकार। जीजा साली में चले, मधुर-मधुर तकरार।। -- जब करती हैं सालियाँ, खुलकर हँसी मजाक। घरवाली यह देखकर, रह जाती आवाक।। ---- आधी घरवाली नहीं, कहना इसको मित्र। रखना हरदम चाहिए, अपना साफ चरित्र।। |
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आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
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आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
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