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गदराई पेड़ों की डाली
हमें सुहाती हैं कानन में।।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।
पवन बसन्ती जब पर्वत से,
चलकर मैदानों तक आती।
सुरभित फूलों की सुगन्ध तब,
मन में नव उल्लास जगाती।
अपनी खग भाषा में तब हम,
गीत सुनाते हैं मधुबन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।
इन्द्र धनुष जब नभ में उगता,
प्यारा बहुत नजारा होता।
धरा-धाम के पाप-ताप को,
घन जब पावन जल से धोता।
जल की बून्दें बहुत सुहाती,
पड़ती हैं जब घर-आँगन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।
उदय-अस्त की बेला में हम,
देते हैं सन्देश अनोखा।
गान उसी का करते हम.
जो रखता है लेखा-जोखा।
चलता जिसकी कृपादृष्टि से,
समयचक्र सबके जीवन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।
सुख से रहना अगर चाहते,
सच से कभी न आँखें मींचो।
जीवन की सुन्दर बगिया को,
नियमित होकर प्रतिदिन सींचो।
नित्य नियम से रोज सवेरे,
सूरज उगता नील गगन में।
हम पंछी हैं रंग-बिरंगे,
चहक रहे हैं वन-उपवन में।।
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बुधवार, 21 फ़रवरी 2018
गीत "चहक रहे हैं उपवन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018
दोहे "मुख्य नाम है ओम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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व्यापक हो संसार
में, धरती हो या व्योम।
जगतनियन्ता आपका,
मुख्य नाम है ओम।।
रोम-रोम में जो
रमा, पुलकित करता रोम।
नाम भले ही भिन्न
हों, कण-कण में है ओम।।
वेदों के जो
मन्त्र हैं, उनसे करना होम।
लेकिन पहले सभी
के, उच्चारण हो ओम।।
सारे दिन शुभ दिवस
हैं, मंगल हों या सोम।
रूढ़िवाद को छोड़
कर, भजो नियम से ओम।।
निठुर नहीं बनना
कभी, रखना मन को मोम।
कहता वैदिक धर्म
है, सत्य सनातन ओम।।
सहजयोग में मुख्य
है, नित अनुलोम-विलोम।
सुमिरण करना ध्यान
से, ध्यान योग में ओम।।
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गीत "सुधरा है परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों!
पढ़िए मेरा यह मधुमास पर आधारित गीत।
फागुन की फागुनिया लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!
धूल उड़ाती पछुआ चलती, जिउरा लेत हिलोर,
देख खेत में सरसों खिलती, नाचे मन का मोर,
फूलों में पंखुड़िया लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!
निर्मल नभ है मन चञ्चल है, सुधरा है परिवेश,
माटी के कण-कण में, अभिनव उभरा है सन्देश,
गीतों में लावणियाँ लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!
छम-छम कानों में बजती हैं गोरी की पायलियाँ,
चहक उठी हैं, महक उठी हैं, सारी सूनी गलियाँ,
होली की रागनियाँ लेकर, आया मधुमास!
पेड़ों पर कोपलियाँ लेकर, आया मधुमास!!
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सोमवार, 19 फ़रवरी 2018
कविता "सेमल ने ऋतुराज सजाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों!
आज पढ़िए मेरी एक पुरानी रचना।
पाई है कुन्दन कुसुमों ने
कुमुद-कमलिनी जैसी काया।
आकर सबसे पहले
सेमल ने ऋतुराज सजाया।।
महावृक्ष है सेमल का यह,
खिली हुई है डाली-डाली।
हरे-हरे फूलों के मुँह पर,
छाई है बसन्त की लाली।।
सर्दी के कारण जब तन में,
शीत-वात का रोग सताता।
सेमलडोढे की सब्जी से,
दर्द अंग का है मिट जाता।।
जब बसन्त पर यौवन आता,
तब ये खुल कर मुस्काते हैं।
भँवरे इनको देख-देखकर,
मन में हर्षित हो जाते हैं।।
सुमन लगे हैं अब मुर्झाने,
वासन्ती अवसान हो रहा।
तब इन पर फलियाँ-फल आये,
लम्बा दिन का मान हो रहा।।
गर्मी का मौसम आते ही,
चटक उठीं सेंमल की फलियाँ।
रूई उड़ने लगी गगन में,
फूलो-फलो और मुस्काओ,
सीख यही देता है सेंमल।
तन से रहो सुडोल हमेशा,
किन्तु बनाओ मन को कोमल।।
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रविवार, 18 फ़रवरी 2018
दोहे "सौतेला व्यवहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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किया आपने था जिसे, मन से अंगीकार।
अब करते क्यों उसी से, सौतेला व्यवहार।१।
जिस चिट्ठे के साथ में, जुड़ा आपका नाम।
उस पर भी तो कीजिए, निष्ठा से कुछ काम।२।
लेखन के संसार में, चलना नहीं कुचाल।
जो सीधा-सीधा चले, होता वो खुशहाल।३।
सोच-समझ कर ही सदा, यहाँ बनाओ मित्र।
मन के मन्दिर में सदा, रक्खो उनके चित्र।४।
बिना नम्रता के सभी, होते दुष्कर काम।
अहमभाव से कभी भी, मिलता नहीं इनाम।५।
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शनिवार, 17 फ़रवरी 2018
कुमाऊं के ब्लॉग :(नवीन जोशीःनवीन समाचार से साभार)
(इस पोस्ट में यदि कुछ तथ्यात्मक सुधार अपेक्षित हों तो जरूर टिप्पणी के माध्यम से या ईमेल saharanavinjoshi@gmail.com के जरिये सुझाएँ )
कुमाऊं के ब्लॉग :
इधर ब्लॉगिंग के मौजूदा दौर की बात करें तो इस पर कुमाऊं के शुरुआती ब्लॉगर अशोक पांडे का मानना है कि ब्लॉगिंग की अब हत्या हो चुकी है, और इसकी हत्या सोशल साइटों ने की है, जिनमें ब्लॉगिंग जैसे लंबे धैर्य व साहस के बिना चट-पट अभिव्यक्ति हो जाती है, और एक ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिए जितने ज्ञान, अध्ययन व धैर्य इत्यादि की जरूरत पड़ती है, सोशल मीडिया पहले ही छोटी-छोटी अभिव्यक्तियों के जरिए उसका क्षरण कर चुका होता है।
कुमाऊं के न्यूज पोर्टल:


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