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पथ दिखलाने के लिए, आते हैं नवरात्र।
उनका ही सत्कार हो, जो आदर के पात्र।।
जग को देता ऊर्जा, नभ में आकर नित्य।
देवों में सबसे बड़ा, कहलाता आदित्य।।
सुबह-शाम परिवेश में, होता है लालित्य।
आराधन कर इष्ट का, रचो ललित-साहित्य।।
जो होते हैं देवता, करते नहीं अनिष्ट।
इसीलिए तो हम उन्हें, कहते अपना इष्ट।।
वसुन्धरा पर देव हैं, मात-पिता-आचार्य।
जीवन में त्रय देव का, वन्दन है अनिवार्य।।
रहते हैं जो आपके, जीवन में अनुकूल।
उनके बारे में नहीं, कहना ऊल-जुलूल।।
प्रेमभाव से कीजिए, सबका साथ विकास।
बिना बात की बात ही, कहलाती बकवास।।
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शनिवार, 24 मार्च 2018
दोहे "रचो ललित-साहित्य" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 23 मार्च 2018
दोहे "व्यर्थ यहाँ बलिदान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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अब तक नहीं शहीद का, जिसे मिला है मान।
भगत सिंह का तो गया, व्यर्थ यहाँ बलिदान।।
जो स्वतन्त्रता के लिए, यहाँ हुए बलिदान।
अमर शहीदों में नहीं, उनका नाम-निशान।।
साँठ-गाँठ करते रहे, जो गोरों के द्वार।
आजादी के बाद में, वही बने सरदार।।
बन्दी थे वो नाम के, महल बने थे जेल।
आजादी के बाद का, निर्धारित था खेल।।
गोरों के दरबार में, जिसने करी सलाम।
आजादी के बाद वो, कहलाये हुक्काम।।
अमर शहीदों का जहाँ, होता हो अपमान।
किस मुँह से उसको कहें, अपना देश महान।।
देशभक्ति का हो रहा, पग-पग पर अवसान।
नेताओं के नाम का, केवल है गुणगान।।
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गुरुवार, 22 मार्च 2018
दोहे "पानी का भण्डार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मित्रों! आज जल दिवस पर
प्रस्तुत हैं कुछ दोहे
सीमित है संसार में, पानी का भण्डार।
व्यर्थ न नीर बहाइए, जल जीवन आधार।।
किया किसी ने भी अगर, पानी को बेकार।
हो जाओगे एक दिन, पानी को लाचार।।
ओस चाटने से बुझे, नहीं किसी की प्यास।
जीव-जन्तुओं के लिए, जल जीवन की आस।।
गन्धहीन-बिन रंग का, पानी का है अंग।
जिसके साथ मिलाइए, देता उसका रंग।।
जल अमोल है सम्पदा, मानव अब तो चेत।
निर्मल जल के पान से, सोना उगलें खेत।।
वृक्ष बचाते धरा को, देते सुखद समीर।
लहराते जब पेड़ हैं, घन बरसाते नीर।।
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दोहे "कविता का आथार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
छन्द बिना होता नहीं, कविता का आथार।।
सागर के जैसी उठें, जिसमें सदा तरंग।
मन ही तो वो पात्र है, जिसमें भरी उमंग।।
या मन में उल्लास हो, या फिर हृदय उदास।
मन में जब लहरें उठे, तब समझो कुछ खास।।
रूप और लावण्य पर, मत कर इतना दर्प।
चन्दन के वन में रहें, सभी तरह के सर्प।।
पत्तों को मत सींचना, सदा सींचना मूल।
सम्बन्धों के खेत में, बोना नहीं बबूल।।
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दोहे "नया-नवेला साल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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आया
है इस बार भी, नया-नवेला साल।
करता हूँ यह कामना, दूर रहें जंजाल।१। -- आशाएँ सब पूर्ण हों, तुमसे नूतन वर्ष। सबके घर-परिवार में, सरसे फिर से हर्ष।२। -- नये वर्ष में नहीं हों, हत्या और बलात। दुनिया भर में कहीं भी, कभी न हो उत्पात।३। -- नवप्रभात तो आ गया, दुनिया में हर ओर। सुख के सूरज से सभी, होंगे भावविभोर।४। -- दौलत के मद में नहीं, कोई बने उलूक। आपस में सब लोग अब, अच्छा करें सुलूक।५। -- प्यार भरे हों गीत सब, प्यारा हो संगीत। नये साल में सभी को, मिलें सलोने मीत।६। -- सरस्वती की कृपा से, खुलें ज्ञान के सोत। सबके ही घर में जलें, जगमग-जगमग जोत।७। |
बुधवार, 21 मार्च 2018
गीत "कल-कल, छल-छल करती गंगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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मंगलवार, 20 मार्च 2018
गीत "प्यारी गौरय्या" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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खेतों में विष भरा हुआ है,
ज़हरीले हैं ताल-तलय्या।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या?
अन्न उगाने के लालच में,
ज़हर भरी हम खाद लगाते,
खाकर जहरीले भोजन को,
रोगों को हम पास बुलाते,
घटती जाती हैं दुनिया में,
अपनी ये प्यारी गौरय्या।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या??
चिड़िया का तो छोटा तन है,
छोटे तन में छोटा मन है,
विष को नहीं पचा पाती है,
इसीलिए तो मर जाती है,
सुबह जगाने वाली जग को,
अपनी ये प्यारी गौरय्या।।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या??
गिद्धों के अस्तित्व लुप्त हैं,
चिड़ियाएँ भी अब विलुप्त हैं,
खुशियों में मातम पसरा है,
अपनी बंजर हुई धरा है,
नहीं दिखाई देती हमको,
अपनी ये प्यारी गौरय्या।।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या??
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