-- राजनीति वारांगना, शत्रु-मीत का खेल। पलभर में होता यहाँ, दुश्मन के संग
मेल।1। -- सारे जग में हैं यही, राजनीति के ढंग। लोग बदलते हैं यहाँ, गिरगिट जैसे रंग।2। -- लम्बे वृक्ष खजूर की, खोज रहे सब छाँव। लाभ दिखाई दे जिधर, उधर बढ़ाते पाँव।3। -- बरगद-पीपल की नहीं, आज किसी को चाह। बूढ़ों की अब देश में, कौन करे परवाह।4। -- धीरे-धीरे घट रहे, खेत और खलिहान। धरती में उगने लगे, कुटिया महल-वितान।5। -- जंगल और जमीन पर, लगा रहे हैं घात। पर्यावरण बिगड़ रहा, चिन्ता की है बात।6। -- वीर हमेशा देश पर, देते हैं बलिदान। सबसे प्यारी है मगर, नेताओं को जान।7। -- अंग रक्षकों की मिली, भारी-भरकम फौज। जनता के जनतन्त्र में, जनसेवक की मौज।8। -- |
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