उधार की जिन्दगी लौट आई है फिर से पटरी पर बहुत दिनों से सूद नही दिया था इसीलिए तो साहूकार ब्याज वसूलने आया था आखिर तीन दिनों में सूद चुकता कर ही दिया अभी तो असल चुकाना बाकी है तब तक तो.... अपने को बन्धक रखना ही होगा लेकिन इस बार साहूकार मेरे द्वार पर नही आयेगा बल्कि मुझे ही उसके दर पर जाना होगा कर्जा जो चुकाना है! |
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सोमवार, 7 सितंबर 2009
‘‘कर्जा जो चुकाना है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
रविवार, 6 सितंबर 2009
‘‘जहर वेदना के पिये जा रहे हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
| घुटन और सड़न में जिए जा रहे हैं, जहर वेदना के पिये जा रहे हैं। फकत नाम की है यहाँ राष्ट्र-भाषा, चढ़ी है जुबाँ पर यहाँ आंग्ल-भाषा, सभी काम इसमें किये जा रहे हैं। चुनावों में हिन्दी ध्वजा गाड़ते हैं, संसद में अंग्रेजियत झाड़ते हैं, ये सन्ताप माँ को दिये जा रहे हैं। जिह्वा कलम कर विदेशों में जाते, ये हिन्दी को नीचा हमेशा दिखाते, ये नौका भँवर में लिए जा रहे है। भारत की है जान दिल और जिगर है ये सन्तों की वाणी अमर है अजर है, फटे आवरण को सिये जा रहे है। |
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शनिवार, 5 सितंबर 2009
‘‘नफरत की मशालें जल नही सकती’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
हमारे मुल्क में गन्दी तिजारत फल नही सकती। जो दहशतगर्द हैं उनकी यहाँ पर चल नही सकती।।
अहिंसा का चमन सींचा है बापू ने सखावत से, यहाँ सौदागरों की दाल अब तो गल नही सकती।
वफादारी की धारा खून में बहती हमारे है, जफाएँ मूँग सीनो पर हमारे दल नही सकती।
धर्म-निरपेक्ष भारत में सभी रहते मुहब्बत से, फरेबी और फितरत इस वतन में पल नही सकती।
तिरंगा जान हैं अपनी, तिरंगा शान है अपनी, हमारे दिल में नफरत की मशालें जल नही सकती।
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शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
‘‘अकेले नही इस जमाने में हम हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
आज फिर किसी ब्लागर मित्र को टिपियाते हुए फिर से ये गज़ल बन गई है-
मगर दिल-जिगर में बहुत जोर-दम हैं।
मगर उनको एतबार खुद पे ही कम हैं।
कदम दर कदम पर भरे पेंच-औ-खम हैं।
अकेले नही इस जमाने में हम हैं। |
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गुरुवार, 3 सितंबर 2009
‘‘मिटा देंगे पल भर में भूगोल सारा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
अमन का चमन ये वतन है हमारा। नही दानवों का यहाँ है गुजारा।। खदेड़ा हैं गोरों को हमने यहाँ से, लहू दान करके बगीचा सँवारा। बजें चैन की वंशियाँ मन-सुमन में, नही हमको हिंसा का आलम गवारा। दिया पाक को देश का पाक हिस्सा, अनुज के हकों को नही हमने मारा। शुरू से सहा आज तक सह रहे हैं, छोटा समझ कर दिया है सहारा। दरियादिली बुजदिली मत समझना, समझदार बन कर समझना इशारा। हिदायत हमारी है सीमा न लाँघो, मिटा देंगे पल भर में भूगोल सारा। |
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‘‘आज शिक्षक दिवस है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
विद्याएँ लुप्तप्रायः छात्र कहाँ जायें शिक्षा का शोर ट्यूशन का जोर सजी हैं दूकानें लोग लगे हैं कमाने-खाने गुरू गायब विद्यालयों की भरमार जगत-गुरू के अच्छे नही हैं आसार ज्ञान की अमावस है आज शिक्षक दिवस है नोट- यह रचना 5 सितम्बर को प्रकाशित होनी थी, परन्तु भूलवश् आज 3 सितम्बर को ही हो गयी है। सखेद! |
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मंगलवार, 1 सितंबर 2009
‘‘बिन्दी के बिना, मेरा श्रंगार?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
जी हाँ, मैं सागर हूँ, बून्दें मेरा अस्तित्व हैं, जल मेरा प्राण है, किन्तु यदि ये बून्दें ही बगावत पर उतर आयें तो??? ............................................. जी हाँ, मैं पहाड़ हूँ, पत्थर मेरा अस्तित्व हैं, किन्तु यदि ये ही दरकने लगे तो??? ................................................. जी हाँ, मैं हिन्दी हूँ, भारत माता के माथे की बिन्दी हूँ, किन्तुबिन्दी के बिना, मेरा श्रंगार ??? ....................................... |
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