7 फरवरी
रोज-डे (गुलाबदिवस)
प्रणय कड़ी में रोज-डे, बाँट रहा मुस्कान।
पीता सबकी वेदना, कभी न होता म्लान।।
--00--
ढोंग-दिखावा दिवस हैं, पश्चिम के सब वार।
रोज बदलते है जहाँ, सबके ही दिलदार।।
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सबसे अच्छा विश्व में, अपना भारत देश।
नैसर्गिक अनुभाव के, सजे यहाँ परिवेश।।
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कामुकता-अश्लीलता, बढ़ती जग में आज।
इसके ही कारण हुआ, दूषित देश समाज।।
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एक दिवस ही प्रतिज्ञा, एक दिवस ही प्यार।
एक दिवस ही चूमना, पश्चिम के किरदार।।
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प्रतिदिन करते क्यों नहीं, प्रेम-प्रीत-व्यवहार।
एक दिवस के लिए क्यों, चुम्बन का व्यापार।।
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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017
दोहे "गुलाब-दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गीत "पढ़ लेते हैं सारी भाषा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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आशा और निराशा की जो,
पढ़ लेते हैं सारी भाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
दुख के बादल आते ही ये,
खारे जल को हैं बरसाते।
सुख का जब अनुभव होता है,
तब ये फूले नहीं समाते।
सरल बहुत हैं-चंचल भी हैं,
इनके भीतर भरी पिपासा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
कुछ में होती है खुद्दारी,
कुछ में होती है मक्कारी।
कुछ ऐसी भी आँखें होती,
जिनमें होती है गद्दारी।
ऐसी बे-ग़ैरत आँखों से,
मन में होती बहुत हताशा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
दुनिया भर की सरिताओं का,
इसमें आकर पानी ठहरा।
लहर-लहरकर लहरें उठतीं,
ये भावों का सागर गहरा।
बिन आँखों के जग सूना है,
ये जीवन की हैं अभिलाषा।
दो नयनों में ही होती हैं,
सारी दुनिया की परिभाषा।।
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रविवार, 5 फ़रवरी 2017
दोहे "चहका है मधुमास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सरदी अब घटने लगी, चहका है मधुमास।
खेतों से नव-अन्न की, आने लगी सुवास।।
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बया नीड़ से झाँकती, अपने चारों ओर।
हरित धरा पर
हो गयी, अब तो सुन्दर भोर।।
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धूम मचाने आ गया, फिर से अब ऋतुराज।
बदल गया मधुमास में, सबका आज मिजाज।।
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जोड़ों पर चढ़ने लगा, फिर से इश्क बुखार।
वादों की चलने लगी, अब तो मस्त बयार।।
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लगा पिघलने हिमालय, बहता शीतल नीर।
काँवड़ लेने जायेंगे, अब बहनों के वीर।।
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मौसम आवारा हुआ, उमड़ रहा है प्यार।
नेह-नीर का पान कर, फूल बने उपहार।।
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बिखरे चारों ओर हैं, प्रेम-दिवस के रंग।
दकियानूसी लोग तो, करें रंग में भंग।।
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शनिवार, 4 फ़रवरी 2017
गीत "उम्र छियासठ साल हो गयी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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हँसी-खुशी से बचपन बीता,
सुख से बीती सकल जवानी।
कठिन बुढ़ापे का पथ आया,
जीवन की है यही कहानी।।
तन तो भले हुआ हो दुर्बल,
लेकिन वाणी हुई सबल है,
उम्र छियासठ साल हो गयी,
पहले जैसी नहीं रवानी।
जीवन की है यही कहानी।।
बीत गया है समय
सुहाना,
देह कलेवर हुआ पुराना,
जाने कब आ जाय बुलावा,
लीला प्रभु की किसने जानी?
जीवन की है यही कहानी।।
झूठा जग का माया-बन्धन,
सच्चा दाता का आराधन,
भूल गया उपकार ईश का,
मानव कितना है अभिमानी।
जीवन की है यही कहानी।।
प्राण और तन तक का नाता,
मृतक किसी को नहीं सुहाता,
माटी जैसी कंचन काया,
माटी में ही है मिल जानी।
जीवन की है यही कहानी।।
चलता रहाता सदा सफर है,
रचा हुआ साहित्य अमर
है,
मेरे गीत जगत गायेगा,
जब तक गंगा में है
पानी।
जीवन की है यही कहानी।।
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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017
बालकविता "हँसता-गाता बचपन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017
जय विजय के फरवरी, 2017 में मेरी बालकविता "चिड़िया रानी"
मीठा राग सुनाती हो।
आनन-फानन में उड़ करके,
आसमान तक जाती हो।।
मेरे अगर पंख होते तो,
मैं भी नभ तक हो आता।
पेड़ो के ऊपर जा करके,
ताजे-मीठे फल खाता।।
जब मन करता मैं उड़ कर के,
नानी जी के घर जाता।
आसमान में कलाबाजियाँ कर के,
सबको दिखलाता।।
सूरज उगने से पहले तुम,
नित्य-प्रति उठ जाती हो।
चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,
मुझको रोज जगाती हो।।
तुम मुझको सन्देशा देती,
रोज सवेरे उठा करो।
अपनी पुस्तक को ले करके,
पढ़ने में नित जुटा करो।।
चिड़िया रानी बड़ी सयानी,
कितनी मेहनत करती हो।
एक-एक दाना बीन-बीन कर,
पेट हमेशा भरती हो।।
अपने कामों से मेहनत का,
पथ हमको दिखलाती हो।।
जीवन श्रम के लिए बना है,
सीख यही सिखलाती हो।
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बुधवार, 1 फ़रवरी 2017
गीत-बसन्तपंचमी "ज्ञान का प्रसाद लो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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आरती उतार लो,
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो,
आ गया बसन्त है!
खेत लहलहा उठे,
खिल उठी वसुन्धरा,
चित्रकार ने नया,
आज रंग है भरा,
पीत वस्त्र धार लो,
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो,
आ गया बसन्त है!
शारदे के द्वार से,
ज्ञान का प्रसाद लो,
दूर हों विकार सब,
शब्द का प्रसाद लो,
धूप-दीप साथ ले,
आरती उतार लो!
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो,
आ गया बसन्त है!
माँ सरस्वती से आज,
बिम्ब नये माँग लो,
वन्दना के साथ में,
भाव नये माँग लो,
मातु से प्रवाह की,
अमल-धवल धार लो।
आ गया बसन्त है!
ज़िन्दग़ी सँवार लो,
आ गया बसन्त है!
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