फीका पकवान
फिर भी चल रहीं हैं
शिक्षा की दुकान
आज के युग में
बिकता है ज्ञान
यही तो है
शिक्षा की पहचान
विद्याएँ लुप्तप्रायः
छात्र कहाँ जायें
शिक्षा का शोर
ट्यूशन का जोर
सजी हैं दूकानें
लोग लगे हैं कमाने-खाने
गुरू गायब
विद्यालयों की भरमार
जगत-गुरू के
अच्छे नही हैं आसार
कोरोना के कारण
विद्यालय बन्द
शिक्षा की
रफ्तार हुई मन्द
शिक्षकों की मौज
दयनीय दशा छात्रों की
ऑन-लाइन पढ़ाई
जरूरत नहीं अब सुपात्रों की
फेल होने का
नहीं है कोई डर
बेफिक्र होकर
बैठे रहो घर
कोरोना काल में
न कहीं सम्मान
न कोई उपहार
खिसक रहा है
शिक्षक का आधार
जोर-शोर से मनाइए
सम्मान लुटाइए
ज्ञान की अमावस है
आज शिक्षक दिवस है
|
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शनिवार, 5 सितंबर 2020
अकविता "आज शिक्षक दिवस है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 4 सितंबर 2020
दोहे "गुरुओं का दिन" डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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राधाकृष्णन आपको, नमन हजारों बार।
शिक्षक दिन का आपने, दिया हमें उपहार।।
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सच्ची निष्ठा से
सुखद, मिलते हैं परिणाम।
गुरुओं का दिन आ
गया, कर लो उन्हें प्रणाम।।
--
परम्परा मत समझना,
अध्यापक का वार।
पाँच सितम्बर को
करो, गुरुओं का आभार।।
--
मात-पिता आचार्य
का, करना आदर-मान।
गुरुओं की ही कृपा
से, मिलता है गुण-ज्ञान।।
--
जो गढ़ते हैं पात्र को, उनका होता नाम।
दिखलाना सन्मार्ग को, सत् गुरुओं का काम।।
--
भरे पड़े हैं आज
तो, जग में गुरुघंटाल।
गुरुओं पावन ताल
में, मत बनना घड़ियाल।।
--
सद्गुरु अपने
शिष्य का, दूर करे अज्ञान।
सद्गुरुओं गुरुओं
का कीजिए, पूजन-वन्दन ध्यान।।
--
जीवनरूपी नाव का, सद्गुरु
है पतवार।
भवसागर से शिष्य
को, करता है गुरु पार।।
--
कच्ची माटी से करे,
निर्मित सुन्दर पात्र।
सद्गुरुदेव कुम्हार सा, बाकी सब हैं छात्र।।
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गुरुवार, 3 सितंबर 2020
कवित्त "पूज्य पिताश्री को नमन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
आश्विन द्वितीया
पूज्य पिता जी का श्राद्ध
--
तर्पण किया श्रद्धा
और श्राद्ध से है आपका,
मेरे पूज्य पिता श्री
आपको नमन है।
जीवन भर आपने जो
प्यार और दुलार दिया,
मन की गहराइयों से
आपको नमन है।
कबी भी अभाव का आभास
नहीं होने दिया,
कर्म के पुजारी पूज्य
तात को नमन है।
रहे नहीं भाग्य के
भरोसे कभी जन्मभर,
उस सुगन्ध वाले पारिजात
को नमन है।
--
आपके ही पथ का
पथिक है सुत आपका,
दिव्य-आत्मा प्रकाश
पुंज को प्रणाम है।
देव के समान सुख बाँटते
रहे जो सदा,
ऐसे पालनहार को तो
कोटिशः प्रणाम है।
जीने के जगत में सिखाये
ढंग आपने,
ईश के समान मेरे
देव को प्रणाम है।
मार्ग सुख सम्पदा
के मुझको बताये सभी,
ऐसी मातृभूमि और पिताजी
को प्रणाम है।
--
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"जितने ज्यादा आघात मिले, उतना ही साहस पाया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
--
जितने ज्यादा आघात मिले,
उतना ही साहस पाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
--
था कभी फूल सा कोमल जो,
सन्तापों से मुरझाता था,
पर पीड़ा को मान निजी,
आकुल-व्याकुल हो जाता था,
इस दुनिया का व्यवहार देख,
पथरीला पथ अपनाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
--
चिकनी-चुपड़ी सी बातों का,
अब असर नहीं कोई होता,
जिससे जल-प्लावन होता था,
वो कब का सूख गया सोता,
जो साज नहीं अब तक आया,
मैंने वो साज बजाया है,
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
--
झूठी माया, है झूठा जग,
छिपकर बैठे हैं भोले ठग,
बाहर हैं दाँत दिखाने के,
खाने के मुँह में छिपे अलग,
कमजोर समझकर शाखा को,
दीमक ने पाँव जमाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
--
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मंगलवार, 1 सितंबर 2020
संस्मरण "बाबा नागार्जुन बहुत याद आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहे "श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सबके अपने ढंग हैं, सबके अलग रिवाज।
श्राद्ध पक्ष में कीजिए, विधि-विधान से काज।।
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श्रद्धा से ही कीजिए, निज पुरुखों को याद।
श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद।।
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मात-पिता को मत कभी, देना तुम सन्ताप।
पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप।।
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जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास।
उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।।
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वंशबेल चलती रहे, ऐसा वर दो नाथ।
पितरों का तर्पण करो, भक्ति-भाव के साथ।।
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अभ्यागत को देखकर, होना नहीं उदास।
पूरे श्रद्धाभाव से, रक्खो व्रत-उपवास।।
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जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र।
अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।।
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अच्छे कामों को करो, सुधरेगा परलोक।
नेकी के ही कर्म से, फैलेगा आलोक।।
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गीत "पथरीला पथ अपनाया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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जितने ज्यादा आघात मिले,
उतना ही साहस पाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
--
था कभी फूल सा कोमल जो,
सन्तापों से मुरझाता था,
पर पीड़ा को मान निजी,
आकुल-व्याकुल हो जाता था,
इस दुनिया का व्यवहार देख,
पथरीला पथ अपनाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
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चिकनी-चुपड़ी सी बातों का,
अब असर नहीं कोई होता,
जिससे जल-प्लावन होता था,
वो कब का सूख गया सोता,
जो साज नहीं अब तक आया,
मैंने वो साज बजाया है,
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
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झूठी माया, है झूठा जग,
छिपकर बैठे हैं भोले ठग,
बाहर हैं दाँत दिखाने के,
खाने के मुँह में छिपे अलग,
कमजोर समझकर शाखा को,
दीमक ने पाँव जमाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
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