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मंगलवार, 1 सितंबर 2020

संस्मरण "बाबा नागार्जुन बहुत याद आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

संस्मरण
(बाबा नागार्जुन और मेरा परिवार) 
        अपनी यादों के पिटारे में से मैं आज एक संस्मरण साझा कर रहा हूँ। बात सन् 1989 की है। उन दिनों जनकवि बाबा नागार्जुन मेरे निवास पर ठहरे हुए थे। वे हम लोगों को अपनी बहुत सारी रचनाएँ भी सुनाते थे।
       मेरे दोनों पुत्र उस समय 10 साल और पन्द्रह साल के थे। उनको बाबा की कविता समझ आये या न आये किन्तु वो बार-बार बाबा से "चूल्हा रोया-चक्की रही उदास" सुनाने का आग्रह करते थे और बाबा सुना भी देते थे। जहाँ तक मैं समझा हूँ उसका लुब्बे-लुबाब यह है कि बाबा बहुत बातूनी थे और बातों को रोचकता के साथ विस्तार देते हुए रचना को सुनाते थे। मेरे माता-पिता जी उन दिनों जीवित थे। जिन्होंने अकाल का कालखण्ड देखा था। अतः वो दोनों भी उस समय की यादों को बताने लगते थे।
        मेरे पिता जी पटवारी थे उर्दू और हिन्दी पर उनका समान अधिकार था। पिता जी उत्तर-प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री चौधरी चरण सिंह की जिद के आगे नहीं झुके थे। इसलिए उन्हें नौकरी गँवानी पड़ी थी। वे स्वयं तो कविता रचना करते नहीं थे मगर उन्हें उर्दू और हिन्दी की बहुत सारी शायरी याद थीं।
       बाबा नागार्जुन की स्मृति भी बहुत तीव्र थी। पिता जी जब बाबा को कुछ शायरी सुनाते थे तो बाबा झट से बता देते थे कि यह किसकी शायरी है और उस शायर के बारे में भी विस्तार से बताते थे। इस तरह से बाबा के मेरे परिवार के साथ घुल-मिल गये थे। बाबा के प्रवास में समय का पता ही नहीं लगता था कि कैसे समय गुजर जाता था।
       उन दिनों हम लोग कक्षा पाँच तक का विद्यालय चलाते थे। जो मेरे आवास के नीचे बेसमेंट में बने 10 कमरों में चलता था। हम लोग बाबा को कहते थे कि बाबा हमारे गेस्टरूम में रात्रि विश्राम किया करो लेकिन बाबा ने बेसमेंट के एक कमरे में ही अपना बिस्तर लगवा लिया। एक टेबिल और एक चारपाई और टेबिल पर एक टेबिल लैम्प पानी का ताँबे का जग और एक गिलास।
      एक दिन मुझे उत्सुकता हुई कि देखूँ कि बाबा को कोई असुविधा तो नहीं हो रही है। रात को 2 बजे जब मैं बाबा के कमरे में गया तो देखा कि टेबिल लैम्प जल रहा है और बाबा माइक्रोफाइन ग्लास लिए हुए कुछ लिख रहे हैं। सतह्त्तर साल की उमर में भी बाबा अपना कविकर्म नित्य करते थे।
       यहाँ मैं बाबा नागार्जुन को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी यह रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
"अकाल और उसके बाद"
--
"कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
--
दाने आए घर के अन्दर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।"
 ***



5 टिप्‍पणियां:

  1. बाबा नागार्जुन को श्रद्धांजलि

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 3.9.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
  3. रोचक संस्मरण। बाबा नागार्जुन सदैव सामयिक और प्रासंगिक रहेंगे।

    जवाब देंहटाएं
  4. बाबा नागार्जुन को श्रद्धांजलि। रोचक संस्मरण।

    जवाब देंहटाएं
  5. बाबा नागार्जुन जनकवि को श्रद्धांजलि
    रोचक प्रसंग

    जवाब देंहटाएं

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