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रविवार, 21 फ़रवरी 2016
शनिवार, 20 फ़रवरी 2016
गीत "सबसे ज्यादा भाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() कोमलता अपनाने वाले,
गीत प्रणय के गाते हैं।
काँटों में मुस्काने वाले,
सबसे ज्यादा भाते हैं।।
सीधे-सादे, भोले-भाले,
रखते हैं अन्दाज़ निराले,
जो चंचल-नटखट होते हैं,
मन के होते हैं मतवाले.
हँसते हुए प्रसून देखकर,
दौड़े-दौड़े आते हैं।
काँटों में मुस्काने वाले,
सबसे ज्यादा भाते हैं।।
निर्झर शान्त नही हैं रहते,
प्रबल वेग से ये हैं बहते,
पाषाणों के अवरोधों को,
कदम-कदम पर ही हैं सहते,
साथ लिए जल की धारा को,
आगे को बढ़ जाते हैं।
काँटों में मुस्काने वाले,
सबसे ज्यादा भाते हैं।।
नहीं राज़ को कभी छिपाते,
कोरी बातें नहीं बनाते,
जो सच्चे प्रेमी होते हैं
प्रेमदिवस वो रोज मनाते,
बगिया को अपनी खुशबू से,
प्रतिदिन ही महकाते हैं।
काँटों में मुस्काने वाले,
सबसे ज्यादा भाते हैं।।
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016
दोहे "सुधर गया परिवेश" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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पतझड़ में सब झड़ गये, पीले-पीले पात।।
नयी कोपलों से सजा, अब पेड़ों का गात।।
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आया है मधुमास अब, सुधर गया परिवेश।
गूँज रहे परिवेश में, प्यार भरे सन्देश।।
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दिन में गरमी बढ़ गयी, लेकिन शीतल भोर।
चारो तरफ बसन्त का, मचा हुआ अब शोर।।
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सरसों की मुस्कान में, खुशियों के संकेत।
पीताम्बर को धार कर, चहके जंगल-खेत।।
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धीरे-धीरे बढ़ रहा, अब दिन का दिनमान।
कोयलिया वन-बाग में, छेड़ेगी फिर तान।।
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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016
"पढ़ना-लिखना मजबूरी है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
हिन्दी ने बहुत सताया है।
अंग्रेजी की देख जटिलता,
मेरा मन घबराया है।।
भूगोल और इतिहास मुझे,
बिल्कुल भी नही सुहाते हैं।
श्लोकों के कठिन अर्थ,
मुझको करने नही आते हैं।।
देखी नही किताब उठाकर,
खेल-कूद में समय गँवाया,
अब सिर पर आ गई परीक्षा,
माथा मेरा चकराया।।
बिना पढ़े ही मुझको,
सारे प्रश्नपत्र हल करने हैं।
किस्से और कहानी से ही,
कागज-कॉपी भरने हैं।।
नाहक अपना समय गँवाया,
मैं यह खूब मानता हूँ।
स्वाद शून्य का चखना होगा,
मैं यह खूब जानता हूँ।।
तन्दरुस्ती के लिए खेलना,
सबको बहुत जरूरी है।
किन्तु परीक्षा की खातिर,
पढ़ना-लिखना मजबूरी है।।
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ग़ज़ल "छाया बहुत अन्धेरा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
पुरानी डायरी से
सियाह रात है, छाया बहुत अन्धेरा है
अभी तो दूर तलक भी नहीं सवेरा है
अभी तो तुमसे मुझे दिल के राज़ कहने हैं
मगर फलक़ पे लगा बादलों का डेरा है
छटेंगी काली घटाएँ तो बोल निकलेंगे
गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है
हमारे घोंसलों में जिन्दगी सिसकती है
कुछ दरिन्दों ने अपने वतन को घेरा है
अभी न जाओ खतरनाक सूनी राहों पे
कदम-कदम पे खड़ा अज़नबी लुटेरा है
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बुधवार, 17 फ़रवरी 2016
दोहागीत "हों समता के भाव" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
बेटी से आबाद हैं, सबके घर-परिवार।
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।
दुनिया में दम तोड़ता, मानवता का वेद।
बेटा-बेटी में बहुत, जननी करती भेद।।
बेटा-बेटी के लिए, हों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार से, पार लगाओ नाव।।
माता-पुत्री-बहन का, कभी न मिलता प्यार।
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।
पुरुषप्रधान समाज में, नारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भला, कैसे हो उत्कर्ष।।
कृष्णपक्ष की अष्टमी, और कार्तिक मास।
जिसमें पुत्रों के लिए, होते हैं उपवास।।
ऐसे रीति-रिवाज को, बार-बार धिक्कार।
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।
जिस घर में बेटी रहे, समझो वे हरिधाम।
दोनों कुल का बेटियाँ, करतीं ऊँचा नाम।।
कुलदीपक की खान को, देते क्यों हो दंश।
अगर न होंगी बेटियाँ, नहीं चलेगा वंश।।
बेटों जैसे दीजिए, बेटी को अधिकार।
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।
लुटे नहीं अब देश में, माँ-बहनों की लाज।
बेटी को शिक्षित करो, उन्नत करो समाज।।
एक पर्व ऐसा रचो, जो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ में, करो स्वयं पर गर्व।।
सेवा करने में कभी, सुता न माने हार।
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।
माता का ये रूप हैं, देतीं जग को ज्ञान।
शिक्षित माता हो अगर, शिक्षित हों सन्तान।।
संविधान में कीजिए, अब ऐसे बदलाव।
माँ-बहनों के साथ मैं, बुरा न हो बरताव।।
क्यों पुत्रों की चाह में, रहे पुत्रियाँ मार।
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।
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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016
"कष्ट उठाना पड़ता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() दुर्गम पथरीला पथ है, आगे बढ़ना आसान नहीं।
ऊँची पर्वत-मालाओं पर, चढ़ना है आसान नहीं।।
पहले पढ़ना-लिखना, फिर जीविका कमाना पड़ता है,
कदम-कदम पर यहाँ बहुत से, कष्ट उठाना पड़ता है।
दुनियादारी एक हक़ीक़त, ये गुड़ियों का खेल नहीं-
घास-फूस-तिनके चुन कर, घर-बार बनाना पड़ता है।
जीवन तो है एक साधना, तप करना आसान नहीं।
ऊँची पर्वत-मालाओं पर, चढ़ना है आसान नहीं।।
हाड़ कँपाती सर्दी, लू के थप्पड़ खाना पड़ता है,
आँधी-पानी में खेतों में, पौध लगाना पड़ता है।
स्वयं परिश्रम करना पड़ता, नहीं हाट में ये मिलता,
मक्कारों, बे-ईमानों को, सबक सिखाना पड़ता है।
सत्य-अहिंसा की राहों पर, चलना है आसान नहीं।
ऊँची पर्वत-मालाओं पर, चढ़ना है आसान नहीं।।
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