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रविवार, 21 फ़रवरी 2016

बालकविता "भुवन भास्कर हरो कुहासा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

फागुन में कुहरा छाया है।
सूरज कितना घबराया है।।
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अलसाये पक्षी लगते हैं।
राह उजाले की तकते हैं।।


सूरज जब धरती पर आये।
तब हम दाना चुगने जायें।।

भुवन भास्कर हरो कुहासा।
समझो खग के मन की भाषा।।
बिल्ली सुस्ताने को आई।
लेकिन यहाँ धूप नही पाई।।
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नीचे जाने की अब ठानी।
ठण्डक से है जान बचानी।।
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बच्चों से वह बोली म्याऊँ।

बिस्तर में जाकर छिप जाऊँ।।


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