![]() कंकड़ को भगवान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! काँटों को वरदान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! दुर्गम पथ बन जाये सरल सा, अमृत घट बन जाए गरल का, पीड़ा को मैं प्राण मान लूँ. पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! बेगानों से प्रीत लगा लूँ, अनजानों को मीत बना लूँ, आशा को अनुदान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! रीते जग में मन भरमाया, जीते जी माया ही माया, साधन को संधान मान लूँ, पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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गुरुवार, 21 जुलाई 2016
गीत "पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गीत "रात का हरता अन्धेरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() बाँटता ठण्डक सभी को, चन्द्रमा सा रूप मेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
रश्मियों से प्रेमियों को मैं बुलाता,
चाँदनी से मैं दिलों को हूँ लुभाता,
दीप सा बनकर हमेशा, रात का हरता अन्धेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
मैं मुसाफिर हूँ-विहग हूँ रात का,
संयोग हूँ-खग हूँ, सुहाने साथ का,
भोर होने पर विदा होकर, बुलाता हूँ सवेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
बालपन, यौवन-बुढ़ापे को बताता,
हर अमावस को सदा परलोक जाता,
चार दिन की चाँदनी के बाद, लुट जाता बसेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
रोज ही मैं “रूप” को अपने बदलता,
उम्र को अपनी कला से, नित्य छलता,
लील लेता वक्त, कितना भी रहे मजबूत डेरा।
तारकों ने पास मेरे, बुन लिया घेरा-घनेरा।।
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बुधवार, 20 जुलाई 2016
दोहे "खिलता सुमन गुलाब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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जिसको पाने के
लिए, दुनिया है बेताब।।
--
जिस उपवन में है नहीं, खिलता सुमन गुलाब।
वहाँ नहीं आता
कभी, रसिकों का सैलाब।।
--
खुशबू और गुलाब
का, आपस में सम्बन्ध।
भीनी-भीनी बाँटता,
सबको मधुर सुगन्ध।।
--
देता फूल गुलाब
का, लोगों को सन्देश।
संरक्षण देता सदा,
काँटों का परिवेश।।
--
सुख-दुख दोनों में
रखो, मन को एक समान।
हरदम रहनी चाहिए, चेहरे
पर मुसकान।।
--
जीवन जियो गुलाब
सा, बाँटों सबको गन्ध।
रिश्तों-नातों में
नहीं, चलता है अनुबन्ध।।
--
देश-वेश-परिवेश
से, करो हमेशा प्यार।
कदम-कदम पर दे रही,
धरा हमें उपहार।।
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मंगलवार, 19 जुलाई 2016
दोहे-गुरूपूर्णिमा "गुरुवर का सम्मान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() गुरूपूर्णिमा पर करें, गुरूजनों को याद।।
जीवनभर चलता रहे,
गुरू-शिष्य सम्वाद।।
--
जिसका
है भगवान से, अधिक जगत में मान।
वो
ही अब है बाँटता, पैसा लेकर ज्ञान।।
--
नहीं
रहे अब वो गुरू, नहीं रहे वो शिष्य।
दोलत
के ऊपर टिका, सबका आज भविष्य।।
--
खाली
पेट न सूझता, गुरू और गोविन्द।
सूख
गया तालाब जब, मुरझाया अरविन्द।।
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गुरू
पूर्णिमा पर सभी, गुरुवर करें विचार।
बन्द
करें अपने यहाँ, ट्यूशन का व्यापार।।
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जो
कहलाता था कभी, प्रभु से अधिक महान।
घटा
हुआ क्यों विश्व में, गुरुवर का सम्मान।।
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वेद-शास्त्र
गुरुदेव की, महिमा करें बखान।
नारायण से मिलन
का, गुरू स्वयं सोपान।।
--
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सोमवार, 18 जुलाई 2016
दोहे "जीने का अंदाज, पियो घोटकर नीम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
तरल-सरल हों दिवस सब, पियो घोटकर नीम।
आयेंगे घर में नहीं, कोई वैद्य-हकीम।।
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जिनके आँगन में रहें, तुलसी-पीपल-नीम।
वहाँ वास करते सदा, नानक-राम-रहीम।।
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जब से आँगन के कटे, बरगद-पीपल-नीम।
तब से घर में आ गये, कितने रोग असीम।।
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पेड़ लगाकर सींचिए, प्रतिदिन सुबहो-शाम।
तरु की शीतल छाँव में, मिलता है आराम।।
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जल-जंगल, पावन पवन, होते प्राणाधार।
हरा-भरा परिवेश है, जीवन का आधार।।
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कुदरत के कानून को, भूल गया इंसान।
आपा-धापी में पड़ा, अब तो सकल जहान।।
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बदल गया इंसान का, जीने का अंदाज।
भौतिकता की होड़ में, चौपट हुआ समाज।।
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रविवार, 17 जुलाई 2016
बालकविता "मोर झूमते पंख पसारे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
नाच रहा जंगल में
मोर।।
बहुत डराते काले
बादल।
लेकिन मोर हुए हैं
पागल।
बदरा आये साँझ-सकारे।
मोर झूमते पंख
पसारे।।
पिहू-पिहू की भाषा
बोलें।
राज़ प्रेम के
अपने खोलें।।
देख मोरनी हर्षित
होती।
आपा-धापा अपना
खोती।।
मन में है बस यही
पिपासा।
कभी न जाये अब
चौमासा।।
देते मोर यही
सन्देशा।
हरा-भरा हो देश
हमेशा।।
चातक कभी रहे ना
प्यासा।
पूरी हों सबकी
अभिलाषा।।
चारों ओर रहे
हरियाली।
जन-जीवन में हो
खुशहाली।।
मिलकर खुशियाँ सभी
मनायें।
लोग हमेशा
नाचें-गायें।।
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शनिवार, 16 जुलाई 2016
बालगीत "तुलसी का पौधा गुणकारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
तुलसी का पौधा
गुणकारी।।
यह पावन परिवेश
बनाता,
इसीलिए तो पूजा
जाता,
तुलसी का बिरुआ
करता है,
घर-आँगन की
पहरेदारी।
तुलसी का पौधा
गुणकारी।।
वातावरण सुगन्धित
करता,
संस्कार जीवन में भरता,
पूजा के प्रसाद
में होती,
तुलसी जी की
भागीदारी।
तुलसी का पौधा
गुणकारी।।
तुलसी कलयुग की संजीवन,
माला होती इसकी पावन,
करती है मन को अविकारी।
तुलसी का पौधा
गुणकारी।।
रोग-शोक भी निकट न
आये,
सरदी-खाँसी दूर
भगाए,
लहर-लहर लहराती
जाती,
प्रणिमात्र की है
हितकारी।
तुलसी का पौधा
गुणकारी।।
अपना जीवन धन्य
बनाओ।
तुलसी के बिरुए
उपजाओ।
घर का वैद्य इसे ही कहते,
दूर भगाता यह बीमारी।
तुलसी का पौधा
गुणकारी।।
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