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सोमवार, 25 जून 2018
रविवार, 24 जून 2018
दोहे "बढ़ा जगत में ताप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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अपनी लीला जानता, खुद कोविद भगवान।
झूठे दावे कर रहा, लेकिन अब इंसान।।
नीला नभ नीला रहा, घटा नहीं चहुँ ओर।
अब तो बिन बरसात के, दादुर करते शोर।।
जब-जब बढ़ता धरा पर, अनाचार-अन्याय।
तब होता प्रारम्भ है, आशा का अध्याय।।
धर्म पराजित हो रहा, जीत रहा है पाप।
जनता होती है दुखी, बढ़ा जगत में ताप।।
अपनी सूरत देखकर, विदित हुआ परिणाम।
उगते सूरज को सभी, झुककर करें प्रणाम।। |
शनिवार, 23 जून 2018
दोहे "तालाबों की पंक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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उनके मँहगे बिल सभी, हो जाते है पास।
जो सरकारी खर्च पर, नाप रहे आकाश।।
जनसेवक तो देश के, होंगे नहीं विपन्न।
भत्ते-वेतन छोड़ दें, फिर भी हैं सम्पन्न।।
अब तो सेवाभाव का, खिसक रहा आधार।
मक्कारी की बाढ़ में, घिरा हुआ संसार।।
चाहे पर उपकार हो, या हो खुद का पेट।
जनसेवक हर हाल में, दौलत रहा समेट।।
जहाँ शेर के साथ में, बकरी का
गठजोड़।
वहाँ अकेला चना तो, भाड़ न सकता
फोड़।
अपना माथा पीटता, दोहाकार मयंक।
गंगा जी में आ गयी, तालाबों की पंक।। |
शुक्रवार, 22 जून 2018
दोहे "करना ऐसा प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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ओस चाटने से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।
तारों से होती नहीं, जग में कभी उजास।।
जीवन के संग्राम को, समझ न लेना खेल।
जीवनसाथी से सदा, रखना हरदम मेल।।
पूरे जीवन प्यार का, उतरे नहीं खुमार।
जीवनसाथी से सदा, करना ऐसा प्यार।।
प्रीत और मनुहार है, दुनिया का आधार।
जीवन साथी से सदा, करना सच्चा प्यार।।
बेमन से देना नहीं, वचन किसी को मित्र।
जिसमें तुम रँग भर सको, वही बनाना चित्र।। |
गुरुवार, 21 जून 2018
दोहे "सारे नम्बरदार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गठबन्धन की नाव को, कौन करेगा पार।।
ताल-मेल कुछ भी नहीं, गर्दिश में है
कार।
छीना-झपटी से नहीं, चलती है सरकार।।
मिल-जुलकर सबने चुनी, सबसे बढ़िया
कार।
लेकिन चलने में हुई, कार बहुत लाचार।।
बोनट पर बैठे कई, भीतर कई सवार।
बात एकता की करें, सारे नम्बरदार।।
तू-तू, मैं-मैं का लगा, जब से मन में
रोग।
वानर जैसी हरकतें, तब से करते लोग।।
मुखियाओं के हों जहाँ, मन में भरे
विकार।
राजनीति के खेत की, कैसे भरे दरार।।
अपने दावे सब करें, खूब करें तकरार।
अच्छे नहीं भविष्य के, लगते हैं आसार।।
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बुधवार, 20 जून 2018
दोहागीत "योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।१।
अगर चाहते आप हो, पास न आये रोग।
रोज सुबह कर लीजिए, ध्यान लगा कर
योग।।
मत-मज़हब का है नहीं, जिससे कुछ
अनुबन्ध।
रखना ऐसे योग से, जीवन भर सम्बन्ध।।
मधुर कण्ठ से ही सदा, अच्छा लगता
गीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।२।
सन्त हमारे देश के, अगर छोड़ दें
भोग।
नहीं अदालत में चले, फिर उन पर
अभियोग।।
सत्य-सनातन योग की, महिमा बड़ी अनन्त।
योगी को ही समझिए, अब तो असली सन्त।।
जो सिखलाता योग को, वो होता है मीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।३।
धन से हो जाता नहीं, कोई बहुत अमीर।
जग में वो धनवान है, जिसका स्वस्थ
शरीर।।
दूषण फैला हर जगह, फैले घातक रोग।
शमन करेगा रोग को, जग में केवल योग।।
अपना आज सँवार लो, कर लो कर्म पुनीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।४।
बिगड़ गया वातावरण, बिगड़ा आज
चरित्र।
ऐसे में तो योग ही, तन-मन करे
पवित्र।।
दीर्घ आयु का विश्व में, एक मात्र
आधार।
तभी जगत ने लिया, योगदिवस स्वीकार।।
मौसम के उपहार हैं, गरमी-पावस-शीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।५।
सात सुरों के योग से, बन जाता संगीत।
योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत।।
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सोमवार, 18 जून 2018
दोहे "क्या होता है प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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छिपा हुआ है प्यार में, जीवन का विज्ञान।
प्यार और मनुहार से, गुरू बाँटता ज्ञान।।
बन जाते हैं प्यार से, सारे बिगड़े काम।
प्यार और अनुराग तो, होता ललित-ललाम।।
दुनियाभर में प्यार की, बड़ी अनोखी रीत।
गैरों को अपना करे, ऐसी होती प्रीत।।
विरह तभी है जागता, जब होता है स्नेह।
विरह-मिलन के मूल में, विद्यमान है नेह।।
छोटे से इस शब्द की, महिमा अपरम्पार।
रोम-रोम में जो रमा, वो होता है प्यार।।
उपवन सींचो प्यार से, खिल जायेंगे फूल।
पौधों को भी चाहिए, नेह-नीर अनुकूल।।
जीव-जन्तु भी जानते, क्या होता है प्यार।
आ जाते हैं पास में, सुनकर मधुर पुकार।। |
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