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कितने अच्छे लग रहे, होली के ये रंग।
रंगों के त्यौहार में, नहीं मिलाना भंग।।
रंगों का अब आ गया, मनभावन त्यौहार।
रूठे सुजन मनाइए, करके यत्न हजार।।
होली के त्यौहार में, बाँटो सबको प्यार।
रंगों की बौछार से, निर्मल करो विकार।।
बच्चों-बूढ़ों के लिए, रहना सदा उदार।
रंग-अबीर-गुलाल है, होली का उपहार।।
हँसी-ठिठोली को करो, मर्यादा के संग।
जो लगवाये प्यार से, उसे लगाओ रंग।।
देख खेत में अन्न को, होता हर्ष अपार।
इसीलिए मधुमास में, आता ये त्यौहार।।
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गुरुवार, 21 मार्च 2019
दोहे "होली का उपहार"(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 20 मार्च 2019
दोहे "रंगों की बौछार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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होली में अच्छी लगे, रंगों की बौछार।
सुन्दर, सुखद-ललाम
है, होली का त्यौहार।।
शीत विदा अब हो गया, चली
बसन्त बयार।
प्यार बाँटने आ गया, होली
का त्यौहार।।
पाना चाहो मान तो, करो
शिष्ट व्यवहार।
सीख सिखाता है यही, होली
का त्यौहार।।
रंगों के इस पर्व का, यह ही
है उपहार।
भेद-भाव को मेटता, होली
का त्यौहार।।
तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी
धार।
लाया नव-उल्लास को, होली
का त्यौहार।।
भंग न डालो रंग में, वृथा
न ठानो रार।
देता है सन्देश यह, होली
का त्यौहार।।
छोटी-मोटी बात पर, मत
करना तकरार।
हँसी-ठिठोली से भरा, होली का
त्यौहार।। |
गीत "सबके मन को भाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
जब-जब आती मस्त
बयारें,
तब-तब हम लहराते
हैं।
काँटों की पहरेदारी
में,
गीत खुशी के गाते
हैं।।
हमसे ही
अनुराग-प्यार है,
हमसे है मधुमास
जुड़ा,
हम संवाहक
सम्बन्धों के,
सबके मन को भाते
हैं।
काँटों की पहरेदारी
में,
गीत खुशी के गाते
हैं।।
स्वागत-अभिनन्दन
हमसे है,
हमीं बधाई देते हैं,
कोमल सेज नयी
दुल्हिन की,
आकर हमीं सजाते
हैं।
काँटों की पहरेदारी
में,
गीत खुशी के गाते
हैं।।
तितली और शहद की
मक्खी,
को पराग हम देते
हैं,
अपनी मोहक
मुस्कानों से,
भँवरों को भरमाते
हैं।
काँटों की पहरेदारी
में,
गीत खुशी के गाते
हैं।।
खुश हो करके मिलो
सभी से.
जीवन बहुत जरा सा
है,
सुख-दुख में हँसते
रहने का,
हम तो पाठ पढ़ाते
हैं।
काँटों की पहरेदारी
में,
गीत खुशी के गाते
हैं।।
तोड़ हमें उपवन का
माली,
विजयमाल को गूँथ
रहा,
हम गुलाब हैं
रंग-बिरंगे,
अपनी गन्ध लुटाते
हैं।।
काँटों की पहरेदारी
में,
गीत खुशी के गाते
हैं।।
'रूप' हमारा देख-देखकर,
जग मोहित हो जाता
है,
हम काँटों में पलने
वाले,
सबको सुख पहुँचाते
हैं।
काँटों की पहरेदारी
में,
गीत खुशी के गाते
हैं।।
|
मंगलवार, 19 मार्च 2019
बालगीत "होली का मौसम अब आया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
बालगीत (होली)
रंग-गुलाल साथ में लाया।
गुझिया थाली में पसरी हैं,
बरफी की है शान निराली,
|
सोमवार, 18 मार्च 2019
दोहे "धन्य मनोहर पर्रिकर, नमन तुम्हें शत् बार"
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चला गया इहलोक से, जिन्दादिल इंसान।।
तन पर सादा वस्त्र थे, मन में उच्च
विचार।
धन्य मनोहर पर्रिकर, नमन तुम्हें शत्
बार।।
भले रोग से तन हुआ, परिकर जी का पस्त।
फिर भी अन्तिम समय तक, रहे कर्म में
मस्त।।
शब्दों के श्रद्धासुमन, मन के मृदु
उद्गार।
करूँ समर्पित हृदय से, अपना यह उपहार।।
जन-गण के हित के लिए, जो करता है काम।
उसका ही संसार में, रहता जीवित नाम।।
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रविवार, 17 मार्च 2019
दोहे "चौकस चौकीदार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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क्रान्तिकारियों ने किया, गोरों को हलकान।
अँग्रेजों ने तब किया, भारत से
प्रस्थान।।
साजिश करके कर दिये, क्रान्तिदूत सब दूर।
सत्ता पर काबिज हुए, कामचोर लंगूर।।
हिन्दी के हैं पाँव में, अँगरेजी जंजीर।
भाषणबाजी से बने, राजा और वजीर।।
छलबल-धनबल बन गया, आज सब हथियार।
साँठ-गाँठ से आजकल, बनती है सरकार।।
जो सीमाओं पर कर रहे, अपने को बलिदान।
सिक्कों से है तुल रहा, अब उनका
अहसान।।
फिर से आम चुनाव में, उभरे पूँजीदार।
माली बनना चाहते, उपवन में मक्कार।।
आज चाहिए देश को, चौकस चौकीदार।
लोकतन्त्र है माँगता, समझदार सरदार।।
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शनिवार, 16 मार्च 2019
अकविता "काश् कोई मसीहा आये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
आज इण्टरनेट पर
पाकिस्तान के
कुछ शहरों के
नजारे देख रहा था
जहाँ खुली-खुली चौड़ी सड़कें थी
बीच में जिवाइडर भी थे
जिन पर बिजली के खम्बों
बल्बों की दूधिया रौशनी
जगमगा रही थी
विशालकाय भवन थे
गगनचुम्बी अट्टालिकायें थी
नदियाँ थी, नहरें थीं
नहरों पर बिजलीघर भी दिखाई दिये
बाजारों में चहल-पहल थी
होटल थे,
चाट के ठेले थे
मन्दिर, मस्जिदें, गुरूद्वारा
और चर्च भी थे
रेलगाड़ी, बसें, कारें आदि
भी दिखाई दिये
--
सब कुछ तो मुझे
अपने देश जैसा ही लगा
कुछ लोग बतियाते भी दिखे
जो कह रहे थे
बेड़ा गर्क हो उन नेताओं का
जिन्होंने हमारे प्यारे वतन का
बँटवारा कर दिया
हमारे रिश्तेदार भाई-बन्धु
जुदा हुए तो ऐसे
कि मिल भी नहीं सकते
--
काश्
कोई मसीहा आये
और दोनों मुल्कों को
एक कर दे...
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