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शनिवार, 16 मार्च 2019

अकविता "काश् कोई मसीहा आये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज इण्टरनेट पर
पाकिस्तान के
कुछ शहरों के
 नजारे देख रहा था
जहाँ खुली-खुली चौड़ी सड़कें थी
बीच में जिवाइडर भी थे
जिन पर बिजली के खम्बों
बल्बों की दूधिया रौशनी
जगमगा रही थी
विशालकाय भवन थे
गगनचुम्बी अट्टालिकायें थी
नदियाँ थी, नहरें थीं
नहरों पर बिजलीघर भी दिखाई दिये
बाजारों में चहल-पहल थी
होटल थे, 
चाट के ठेले थे
मन्दिर, मस्जिदें, गुरूद्वारा
और चर्च भी थे
रेलगाड़ी, बसें, कारें आदि 
भी दिखाई दिये
--
सब कुछ तो मुझे
अपने देश जैसा ही लगा
कुछ लोग बतियाते भी दिखे
जो कह रहे थे
बेड़ा गर्क हो उन नेताओं का
जिन्होंने हमारे प्यारे वतन का
बँटवारा कर दिया
हमारे रिश्तेदार भाई-बन्धु
जुदा हुए तो ऐसे
कि मिल भी नहीं सकते
--
काश्
कोई मसीहा आये
और दोनों मुल्कों को
एक कर दे...

2 टिप्‍पणियां:

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