माता दशमी तिथि को, चली गयीं परलोक। तब से अब तक हृदय में, भरा हुआ है शोक।। -- पैंसठ वर्षों तक रहा, सिर पर माँ का हाथ। जब से माँ सुरपुर गयी, मैं हो गया अनाथ।। -- श्रद्धा से मैं श्राद्ध को, करता हूँ निष्पन्न। होते माँ के नाम से, सभी कार्य सम्पन्न।। -- लेकर भोजन थाल को, जला सुगन्धित धूप। कभी नहीं हूँ भूलता, माता जी का रूप।। -- सच्चे मन से कर रहा, माता का गुण-गान। माता ही सन्तान का, रखती हर-पल ध्यान।। -- सारे सपनों को करें, माता जी साकार। कर्मों से ही तो बने, जीवन का आधार।। -- घर भर में धन-धान्य का, कभी न रहा अकाल। माता के आशीष ने, मुझको किया निहाल।। -- |
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मंगलवार, 20 सितंबर 2022
दोहे "माता के आशीष ने, मुझको किया निहाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
ग़ज़ल "रूप पुतले घड़ी भर में बदलते हैं " (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- जहाँ अरमान पलते हैं वहीं पर दीप जलते हैं -- जहाँ बरसात होती है वहीं पत्थर फिसलते हैं -- लगी हो आग जब दिल में तो शोले ही निकलते हैं -- नहीं सूखे के मौसम में कभी दरिया उबलते हैं -- शक्ल इन्सान की धर कर, नगर में नाग छलते हैं -- अमन के चमन में आकर जुबाँ से विष उगलते हैं -- सुरीले सुर बजें कैसे विदेशी साज चलते हैं -- 'रूप' को मोम के पुतले घड़ी भर में बदलते हैं -- |
सोमवार, 19 सितंबर 2022
दोहे "मानवता है भंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जब हर घर में जन्मते, दुनिया में इंसान। मानवता का क्यों हुआ, फिर जग में अवसान।। -- देख दशा संसार की, हुए हौसले पस्त। भरी दुपहरी में हुआ, मानो सूरज अस्त।। -- मान और अपमान का, नहीं किसी को ध्यान। सरे आम इंसान का, बिकता है ईमान।। -- भरे पड़े इस जगत में, बड़े-बड़े धनवान। श्री के बिन कैसे कहें, उनको हम श्रीमान।। -- जीने का जब सीखना, चाहा हमने ढंग। बढ़ीं व्यस्तताएँ तभी, समय हो गया तंग।। -- आपस में लड़ते नहीं, राम और रहमान। फिर मानव क्यों उलझता, बन करके नादान।। -- दुनिया में बिखरे हुए, भाँति-भाँति के रंग। मत-मजहब के फेर में, मानवता है भंग।। -- सबके पूजा-पाठ के, अलग-अलग हैं ढंग। पन्थ भले ही भिन्न हों, भारत के सब अंग।। -- |
रविवार, 18 सितंबर 2022
ग़ज़ल "माफ न करता कभी ज़माना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- जीवन एक मुसाफिरखाना जो आया है, उसको जाना -- झूठी काया, झूठी छाया माया में मत मन भरमाना -- सुख के सपने रिश्ते-नाते बहुत कठिन है इन्हें निभाना -- ताकत है तो, सब है अपने कमजोरी में झिड़की-ताना -- आँखों के तारे दुर्दिन में जान गये हैं आँख दिखाना -- इस दुनिया की यही कहानी कल हो जाता आज पुराना -- सुमन सीख देते हैं सबको आज खिले कल है मुरझाना -- “रूप” न टिकता है यौवन का माफ न करता कभी ज़माना -- |
शनिवार, 17 सितंबर 2022
"दामोदर नरेन्द्र भाई मोदी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सादा जीवन अपनाया। भारत भाग्य विधाता बनकर, पथ समाज को दिखलाया।। -- छोड़ सभी आराम-ऐश को, संघं शरणम् में आया। मोह छोड़कर घर-गृहस्थ का, पथरीला पथ अपनाया। भारत भाग्य विधाता बनकर, पथ समाज को दिखलाया।। -- केशर की क्यारी को जिसने है, संविधान में बाँध दिया। आजादी के परवानों का, भारत में सम्मान किया। उग्रवाद-आतंकवाद से, कभी नहीं जो घबराया। भारत भाग्य विधाता बनकर, पथ समाज को दिखलाया।। -- दागे नहीं खयाली गोले, कूटनीति से काम लिया। सत्य-अहिंसा के बल पर, अपने भारत को एक किया। भटके हुए युवा बिरुओं को, देशभक्ति को सिखलाया। भारत भाग्य विधाता बनकर, पथ समाज को दिखलाया।। -- दीन-दुखी को अपनेपन से, हँसकर गले लगाता जो। खरपतवार हटा धरती की, भारत स्वच्छ बनाता जो। अवतारी पटेल का बनकर, जो भारत में है आया। भारत भाग्य विधाता बनकर, पथ समाज को दिखलाया।। -- शासक है स्वदेश का ऐसा, नरेन्द्र मोदी गुजराती। नई सोच को रखता लेकिन, जीवन जीता देहाती। अग्रदूत बनकर विकास का, थमे चक्र को चलवाया। भारत भाग्य विधाता बनकर, पथ समाज को दिखलाया।। -- |
दोहे "नरेन्द्र भाई मोदी को जन्म दिन की शुभकामनाएँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- गाँधी और पटेल ने, जहाँ लिया अवतार। मोदी का गुजरात ने, दिया हमें उपहार।। -- देवताओं से कम नहीं, होता है देवेन्द्र। सौ सालों के बाद में, पैदा हुआ नरेन्द्र।। -- साधारण परिवार का, किया चमन गुलजार। मोह छोड़ संसार का, त्याग दिया घर-बार।। -- युगों-युगों के बाद में, लेते जन्म सपूत। दयानन्द की धरा के, मोदी स्वयं सुबूत।। -- समझौता जिसको नहीं, बैरी से स्वीकार। उस मोदी के हाथ में, भारत की पतवार।। -- दामोदर नर इन्द्र से, ऊँचा माँ का भाल। अभिनन्दन जग कर रहा, ले पूजा का थाल।। -- जन्म-दिवस पर आपको, नमन हजारों बार। दीर्घ आयु की कामना, करता दोहाकार।। -- |
ग़ज़ल "प्यार का इज़हार करना चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
ज़िन्दग़ी को प्यार करना चाहिए हौसले से थाम कर पतवार को सागरों को पार करना चाहिए मुल्क की अस्मत बचाने के लिए दुश्मनों पर वार करना चाहिए अमन का सन्देश देने के लिए क़ौम को तैयार करना चाहिए मतलबी सौदागरों के साथ में सोच कर इक़रार करना चाहिए जब मुकम्मल हो भरोसा इश्क पर प्यार का इज़हार करना चाहिए सिखाती है सभ्यता अपनी यही शान से सत्कार करना चाहिए चाहते अपने लिए जो आप हों बस वही ब्यौहार करना चाहिए बिन महक के “रूप” तो बेकार है चमन का सिंगार करना चाहिए |
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