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शुक्रवार, 23 जून 2017

कविता "चौमासा बारिश से होता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सावन सूखा बीत न जाये।
नभ की गागर रीत न जाये।।

कृषक-श्रमिक भी थे चिन्ताकुल।
धान बिना बारिश थे व्याकुल।। 

रूठ न जाये कहीं विधाता।
डर था सबको यही सताता।।

लेकिन बादल है घिर आया। 
घटाटोप अंधियारा छाया।। 
अम्बुआझार चली पुरवायी।
शायद बारिस की रुत आयी।।

बिजली कड़कीबादल गरजा।
सूरज का दिल भी है लरजा।। 

मोटी-मोटी बुन्दियाँ आयी।
लोगों के मन को अति भायी।।

पहली बारिश को पा करके।
नहा रहे बालक जी भरके।।

चौमासा बारिश से होता।
खेतीहर फसलों को बोता।।

वर्षा प्रतिदिन जल बरसाना।
बारिश मत धोखा दे जाना।।

2 टिप्‍पणियां:

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