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मंगलवार, 27 जून 2017

दोहे "नभ में अब घनश्याम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बादल छाये गगन में, बीती काली रात।
सुख बरसाने के लिए, आयेगी बरसात।।
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उमड़-घुमड़ कर आ रहे, नभ में अब घनश्याम।
बढ़ जायेगा खेत में, मजदूरों का काम।।
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हवा सुहानी बह रही, बादल करते शोर।
चपला चमकी गगन में, वन में नाचें मोर।।
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पौध धान की हो गयी, अब बिल्कुल तैयार।
फिर से वीरान चमन, होगा अब गुलजार।।
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आसमान से बरसती, बारिश अब घनघोर।
रोपाई करने चले, कृषक खेत की ओर।।
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बारिश से गदगद हुए, काफल-सेब-अनार।
मिट जायेंगी धरा की, अब तो सभी दरार।।
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मेघों ने अब कर दिया, पावस का आगाज।
पवन बसन्ती चल रहा, झूम रहा वनराज।।
  

3 टिप्‍पणियां:

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