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बुधवार, 13 जून 2018

दोहे "वाणी में सुर-तान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ज्ञानदायिनी आप हो, सेवक है नादान।
माता जी भर दीजिए, वाणी में सुर-तान।।

सुमुखि गुलाबी वदन का, जब उतरा रंग। 
कविता की कमनीयता, तब से है बदरंग।।

बदल गयी है लेखनी, बदल गये सब ढंग। 
कविता की सब गेयता, आज हो गयी भंग।।

आवारा सपने हुए, हरजाई हैं मीत।
जीवन में कैसे बजे, अब मधुरिम संगीत।।

सहज-सरल पगडण्डियाँ, खोज रहा हर एक।
पन्थ भले ही हों अलग, लेकिन मंजिल एक।।

सभी जगह चलता नहीं, मतलब और जुगाड़। 
मत करना लोगों कभी, नातों से खिलवाड़।।

दुनिया में सबसे बड़ा, भारत में जनतन्त्र। 
सर्व धर्म समभाव के, जहाँ गूँजते मन्त्र।।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14.06.18 को चर्चा पंच पर चर्चा - 3001 में दिया जाएगा

    हार्दिक धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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