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बुधवार, 27 जून 2018

दोहे "गायब अब हल-बैल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सम्बन्धों को लोग अब, देते नहीं महत्व। 
इसीलिए सौहार्द्र का, बिगड़ा हुआ घनत्व।

दौलत पाने की लगी, दुनिया भर में होड़।
नैतिकता को स्वार्थ में, लोग रहे अब छोड़।।

इंसानों के आज तो, बड़े हो गये पेट।
मानवता का कर रहे, मनुज स्वयं आखेट।।

भगवा चोला पहन कर, सन्त बने शैतान।
अब खुद को कहने लगे, पापी भी भगवान।।

कलियुग कल का युग हुआ, निर्धन हैं मजबूर।
रोटी-रोजी के लिए, भटक रहे मजदूर।।

पिघल रहे हैं ग्लेशियर, दरक रहे हैं शैल। 
खेत-गाँव से हो गये, गायब अब हल-बैल।।

अधिक उपज के लोभ में, पागल हुआ किसान।
जहर छिड़कता खेत में, नवयुग का इंसान।।

नहीं बची अब देश में, कोई देशी चीज।
जान-बूझकर कृषक अब, बोते संकर बीज।।

2 टिप्‍पणियां:

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