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गुरुवार, 14 जून 2018

दोहे "लोकतन्त्र में लोग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहने को आजाद हैं, लोकतन्त्र में लोग। 
सबको मिलते हैं कहाँ, लड्डू-मोहनभोग।।

जब अपने ही देश में, शासक हों भयभीत।
जनता फिर कैसे वहाँ, गाये सुख के गीत।।

दाता थे जो अन्न के, आज हुए कंगाल। 
लालाओं ने भर लिया, गोदामों में माल।।

जो दुनिया को पालता, बदतर उसका हाल।
औने-पौने दाम में, उसका बिकता माल।।

पहले जैसे हैं नहीं, हरे-भरे मैदान। 
घटते ही अब जा रहे, खेत और खलिहान।।

मानवता दम तोड़ती, बिगड़ गया परिवेश। 
बदनामी को झेलता, राम-श्याम का देश।।

सुबह दस बजे जागते, सोते आधी रात।
खाकर माल हराम का, करते श्रम की बात।।




1 टिप्पणी:

  1. वातानुकूलित कमरों में गरीब जनता के हित की योजनाएं जब बनती हैं तो उनका बाहर आकर दम फूल जाता है ...
    बहुत सटीक ...

    उत्तर देंहटाएं

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