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रविवार, 3 जून 2018

विविध दोहे "हो जाता मजबूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब भी लड़ने के लिएलहरें हों तैयार।
कस कर तब मैं थामताहाथों में पतवार।।

बैरी के हर ख्वाब कोकर दूँ चकनाचूर।
जब अपने हो सामनेहो जाता मजबूर।।

जब भी लड़ने के लिएहोता हूँ तैयार।
धोखा दे जाते तभीमेरे सब हथियार।।

साधन हो पैसा भलेमगर नहीं है साध्य।
हिरती-फिरती छाँव कोमत समझो आराध्य।।

राज़-राज़ जब तक रहेतब तक ही है राज़।
बिना छन्द के साज भीहो जाता नाराज।।

वाणी में जिनकी नहींसच्चाई का अंश।
आस्तीन में बैठ करदेते हैं वो दंश।।

बैठे गंगा घाट परसन्त और शैतान।
देना सदा सुपात्र कोधन में से कुछ दान।।

बन्द कभी मत कीजिएआशाओं के द्वार।
मजबूती से थामनालहरों में पतवार।।

लोकतान्त्रिक देश मेंकहाँ रहा जनतन्त्र।
गलियारों में गूँजतेजाति-धर्म के मन्त्र।।।

हँसकर जीवन को जियोरहना नहीं उदास।
नीरसता को त्याग करकरो हास-परिहास।।

आड़ी-तिरछी हाथ मेंहोतीं बहुत लकीर।
कोई है राजा यहाँकोई बना फकीर।।

सीधे-सादे हों भलेलेकिन चतुर सुजान।
लोग उत्तराखण्ड केरखते हैं ईमान।।

सुलगे जब-जब हृदय मेंमेरे कुछ अंगार।
तब तुकबन्दी में करूँभावों को साकार।।

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