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मंगलवार, 12 जून 2018

दोहे "गले पड़े हैं लोग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज गले लगते नहीं, गले पड़े हैं लोग। 
तन से तो संयोग है, मन में भरा वियोग।।

जनता के ही तन्त्र में, जनता की है मात। 
धूप रूप की ढल गयी, आयी काली रात।।

नहीं चलाया अभी तक, कभी लक्ष्य पर तीर। 
इसीलिए कश्मीर की, फूटी है तकदीर।।

तूतू, मैं-मैं की लगी, राजनीति में होड़। 
कूटनीति कमजोर है, फूटनीति बेजोड़।।

अन्न और जल हैं सभी, दूषण से भरपूर। 
जनसाधारण हो गया, आज मजे से दूर।।

नहीं रहे चाणक्य से, राजनीति में सन्त। 
कूटनीति का हो गया, भारत से अब अन्त।

दिल से निकले भाव ही, देते हैं उल्लास। 
जीवन को करते सरस, हास और परिहास।।

अपने प्यारे देश में, समझो तभी सुराज। 
देवनागरी में करें, जब हम अपने काज।।

गद्य-पद्य से युक्त है, हिन्दी का साहित्य। 
हिन्दी के परिवेश में, भरा हुआ लालित्य।।

इस असार संसार में, बिखरे कितने रंग। 
आकुल मेरा मन हुआ, देख जगत के ढंग।।

भगवन मेरी भूल पर, मत हो जाना रुष्ट। 
मेरा मन तो बावरा, कभी न हो सन्तुष्ट।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया ग़ज़ल . हमेशा की तरह शानदार .

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (13-06-2018) को "कलम बना पतवार" (चर्चा अंक-3000) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं

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