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गीत और ग़ज़लों वाला जो सौम्य सरोवर है।
मन के अनुभावों की इसमें छिपी धरोहर है।।
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शब्द हिलोरें लेते जब भी इस रीती गागर में,
देता हैं उडेल सब उनको, धारा बन सागर में,
उच्चारण में ठहर गया जीवन्त कलेवर है।
मन के अनुभावों की इसमें छिपी धरोहर है।।
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पगडण्डी है वही पुरानी, जिसको मैंने अपनाया है,
छन्दों का संसार सनातन, मेरे मन को ही भाया है,
छल-छल, कल-कल करती गंगा बहुत मनोहर है।
मन के अनुभावों की इसमें छिपी धरोहर है।।
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पर्वत मालाएँ फैली हैं, कितनी धरा-धरातल पर,
किन्तु हिमालय जैसा कोई, नहीं दूसरा भूतल पर,
जो अरिदल से रक्षा करता वही महीधर है।
मन के अनुभावों की इसमें छिपी धरोहर है।।
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बेच रहे ऊँचे दामों में, स्वादहीन पकवानों को,
शिक्षा की बोली लगती है, ऊँचे भव्य मकानों में,
जो बहनों की लाज बचाता, वही सहोदर है।
मन के अनुभावों की इसमें छिपी धरोहर है।।
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बहुत सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंबहुत खूब सर
जवाब देंहटाएंमैंने अभी आपका ब्लॉग पढ़ा है, यह बहुत ही शानदार है।
जवाब देंहटाएंSantali Mp3 Download
बहुत सुंदर गीत , सुंदर भाव उत्कृष्ट शब्द संयोजन।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंसादर नमस्कार,
जवाब देंहटाएंआपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 14-05-2021) को
"आ चल के तुझे, मैं ले के चलूँ:"(चर्चा अंक-4060) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित है.धन्यवाद
…
"मीना भारद्वाज"
पुनश्च: कृपया चर्चा अंक-4065 पढ़े ।
हटाएंजी बढ़िया है। कई विषययों पर आपने विचार करने योग्य बातें लिखी है...
जवाब देंहटाएंउच्चारण में ठहर गया जीवन्त कलेवर है।
जवाब देंहटाएंमन के अनुभावों की इसमें छिपी धरोहर है।।---बहुत शानदार आदरणीय।
लाजवाब सृजन
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर सृजन....
जवाब देंहटाएंआपका छंद प्रेम और उसके प्रति प्रतिबद्धता अनुकरण के योग्य है।
जवाब देंहटाएंसादर।
बेहतरीन प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
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