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बुधवार, 27 नवंबर 2019

गीत "पंक से मैला हुआ है आवरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सभ्यताशालीनता के गाँव में
खो गया जाने कहाँ है आचरण
कर्णधारों की कुटिलता देखकर
देश का दूषित हुआ वातावरण।
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सुर हुए गायबमृदुल शुभगान में,
गन्ध है अपमान कीसम्मान में,
आब खोता जा रहा अन्तःकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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शब्द अपनी प्राञ्जलता खो रहा,
ह्रास अपनी वर्तनी का  हो रहा,
रो रहा समृद्धशाली व्याकरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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लग रहे घट हैं भरेपर रिक्त हैं,
लूटने में राज कोसब लिप्त हैं,
पंक से मैला हुआ है आवरण।
खो गया जाने कहाँ है आचरण?
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