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सोमवार, 18 नवंबर 2019

दोहे "फूटनीति का रंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


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राजनीति के जाल में, फँसे राम-रहमान।
मन्दिर-मस्जिद का नहीं, पथ लगता आसान।।
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न्यायालय के न्याय पर, क्यों उठ रहे सवाल।
अरजी पुनर्विचार की, है अब नया बवाल।।
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हिन्दू-मुस्लिम ने किया, निर्णय था स्वीकार।
लेकिन कुछ शातिर अभी, झगड़े को तैयार।।
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साफ विरासत का हुआ, न्यायालय में पक्ष।
होंगे दैरो-हरम के, अलग-अलग अब कक्ष।।
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चढ़ा इबादत में कुटिल, फूटनीति का रंग।
शैतानों की सोच से, चैन हो रहा भंग।।
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हिन्दू पूजा को करें, मुस्लिम पढ़ें नमाज।
कहते दोनों पन्थ ये, सुख से रहे समाज।।
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सूफी-सन्तों ने दिया, दुनिया को उपदेश।
अपने प्यारे देश का, शान्त रखो परिवेश।।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब ... जलते हुए प्रश्न हैं हर दोहे में ...
    पर कुछ लोग बस बांटते हैं ...

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (१९ -११ -२०१९ ) को "फूटनीति का रंग" (चर्चा अंक-३५२४) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….

    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  3. बिना विवाद के जिनकी दुकान नहीं चलती, भला वो क्यों कोई स्थायी हल चाहेंगे.
    धर्म-मज़हब के भ्रष्ट ठेकेदार और देश को विवादों के दलदल में फंसाते रहने वाले राजनीतिज्ञ अभी तो भारत पर और भारतीयों पर और भी सितम ढाएँगे.

    जवाब देंहटाएं

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