"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

फ़ॉलोअर

सोमवार, 29 नवंबर 2021

"दोहा छन्द" आलेख (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"दोहा छन्द"
Image result for दोहा छन्द
      दोहा छन्द अर्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में तेरह-तेरह मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। दोहा छन्द ने काव्य साहित्य के प्रत्येक काल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिन्दी काव्य जगत में दोहा छन्द का एक विशेष महत्व है। दोहे के माध्यम से प्राचीन काव्यकारों ने नीतिपरक उद्भावनायें बड़े ही सटीक माध्यम से की हैं। किन्तु दोहा छन्द के भेद पर कभी भी अपना ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहिए।
      सच तो यह है कि दोहे की रचना करते समय पहले इसे लिखकर गाकर लेना चाहिए तत्पश्चात इसकी मात्राएँ जांचनी चाहिए ! इसमें गेयता का होना अनिवार्य है।  दोहे के सम चरणों का अंत 'पताकाअर्थात गुरु लघु से होता है तथा इसके विषम चरणों के आदि में जगण अर्थात १२१ का प्रयोग वर्जित है ! अर्थात दोहे के विषम चरणों के अंत में सगण (सलगा ११२) रगण (राजभा २१२) अथवा नगण(नसल १११) आने से दोहे में उत्तम गेयता बनी रहती  है!  सम चरणों के अंत में जगण अथवा तगण आना चाहिए अर्थात अंत में पताका (गुरु लघु) अनिवार्य है।
     दोहा की उत्पत्ति संस्कृत के दोधक से हुई है। यह अपभ्रंश के उत्तरकाल का प्रमुख छन्द है। दोहा वह छन्द है जिसमें पहलीबार तुक मिलाने का प्रयत्न किया गया था। कहा जाता है कि सिद्धकवि सहरप ने इस छन्द का सबसे पहले प्रयोग किया था। दोहा और साखी समानार्थक छन्द हैं। सन्त कवि कबीर दास ने अपने दोहों को साखी नाम दिया था। पद शैली के सूरदास और मीराबाई ने अपने पदों में इसका प्रयोग किया है। दोहा मुक्तक काव्य का प्रमुख छन्द है। रीतिकालीन कवि बिहारी लाल ने अपने सतसई साहित्य दोहा छन्द का ही प्रयोग किया है। इस छन्द में लघुचित्रों और भावव्यञ्जना को प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता है। प्राकृत साहित्य में जो स्थान गाथा का है, अपभ्रंश में नही स्थान दोहा छन्द का भी है।
       दोहा छन्द का ताना बाना समझने के लिए यह जरूरी है कि 13,11-13,11 मात्रा के चार चरणविषम चरणान्त में प्रायः लघु-गुरू, और सम चरणान्त मे गुरू-लघु  तुकान्त का कठोरता से पालन किया जाये।
     काव्याचार्यों ने दोहे की लय को निर्धारित करने के लिए कलों (द्विकल-त्रिकल-चौकल) का प्रयोग भी किया हैजिसकी अपनी सीमाएं हैं। इस पद्धति में 2,3,4 मात्राओं के वर्ण समूहों को क्रमशः द्विकल त्रिकल चौकल कहा जाता है दोहे के चरणों में कलों का क्रम निम्नवत होता है - विषम चरणों के कलों क्रम -
4 + 4 + 3 + 2 (चौकल+चौकल+त्रिकल+द्विकल)
3 + 3 + 2 + 3 + 2 (त्रिकल+त्रिकल+द्विकल+त्रिकल+द्विकल)
सम चरणों के कलों का क्रम -
4 + 4 + 3 (चौकल+चौकल+त्रिकल)
3 + 3 + 2 + 3 (त्रिकल+त्रिकल+द्विकल+त्रिकल)
      दोहा या किसी अन्य मात्रिक छंद का निर्धारण करने में जिस मात्रा क्रम का उल्लेख किया जाता हैवह  वस्तुतः वाचिक’ होता है, ‘वर्णिक’ नहीं । वाचिक मात्राभार मे लय को ध्यान में रखते हुये एक गुरु के स्थान पर दो लघु 11 प्रयोग करने की छूट रहती हैजबकि वर्णिक’ भार मे किसी भी गुरु के स्थान पर दो लघु 11 प्रयोग करने की छूट नहीं होती है अर्थात प्रत्येक वर्ण’ का मात्राभार सुनिश्चित होता है। 
     चूंकि भारतीय छंद शास्त्र के अनुसार गणों (यगणमगण आदि) की संकल्पना मे प्रत्येक वर्ण का मात्रा भार सुनिश्चित माना गया है। विषम चरणों की बनावट में जगण का प्रयोग निषिद्ध माना जाता है। लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि विषम चरण के प्रारम्भ में जगण का निषेध केवल नर काव्य के लिए है। देवकाव्य या मंगलवाची शब्द होने की स्थिति में कोई दोष नहीं है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य  है कि यदि दो शब्दों से मिलकर जगण बनता है तो उसे दोष नहीं माना जाता है- जैसे “महान” शब्द के तीन वर्ण जगण बना रहे है इसलिए यह वर्जित माना जाता है किन्तु जहाँ दो शब्दों से मिलकर जगण आ रहा हो तो यह वर्जित नहीं माना जाता है। विषम चरणों के अन्त में सगण, रगण, अथवा नगण अच्छा माना जाता है।  
अन्त में मेरे भी कुछ दोहे इस विषय में समीचीन सिद्ध होंगे।
देखिए-
तेरह-ग्यारह से बनादोहा छन्द प्रसिद्ध।
माता जी की कृपा सेकरलो इसको सिद्ध।।

चार चरण-दो पंक्तियाँकरती गहरी मार।
कह देती संक्षेप मेंजीवन का सब सार।।

  समझौता होता नहींगणनाओं के साथ।
उचित शब्द रखकर करोदोहाछन्द सनाथ।। 

सरल-तरल यह छन्द हैबहते इसमें भाव।
दोहे में ही निहित हैनैसर्गिक अनुभाव।।

तुलसीदास-कबीर नेदोहे किये पसन्द।
दोहे के आगे सभीफीके लगते छन्द।।

दोहा सज्जनवृन्द केजीवन का आधार।
दोहों में ही रम रहासन्तों का संसार।|

5 टिप्‍पणियां:

  1. दोहा छन्द की व्याख्या करता हुआ उपयोगी आलेख

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार
    (30-11-21) को नदी का मौन, आदमियत की मृत्यु है" ( चर्चा अंक4264)पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. दोहा के संबंध में इतनी सुंदर जानकारी के लिए धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  4. दोहे के संबंध में बेहतरीन जानकारी।
    हार्दिक आभार आदरणीय सर।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  5. आपके साथ किये कार्यक्रम की याद दिला दी आपने ...
    आपके दोहे तो सदा से ही अनुपम हैं ... और जानकारी लाजवाब ...

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails