-- मानव दानव बन बैठा है, जग के झंझावातों में। दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।। -- मची हुई आपा-धापी, मुख में राम बगल में चाकू, मनवा है कितना पापी, दिवस-रैन उलझा रहता है, घातों में प्रतिघातों में। दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।। -- कितना नया निराला है, ठोकर पर ठोकर खाकर भी, खुद को नही संभाला है, ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकर, लिपटा गन्दी बातों में। दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।। -- भाई के शोणित का प्यासा, भूल चुके हैं सीधी-सादी, सम्बन्धों की परिभाषा। विष के पादप उगे बाग में, जहर भरा है नातों में। दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।। -- जटिल-कुटिल मतभेद हुए, बाँट लिया गुलशन को, लेकिन दूर न मन के भेद हुए, खेल रहे हैं ग्राहक बन कर, दुष्ट-बणिक के हाथों में। दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।। -- |
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सादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (2-8-22} को "रक्षाबंधन पर सैनिक भाईयों के नाम एक पाती"(चर्चा अंक--4509)
पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
बेहद खूबसूरत रचना...दिन में डूब गया है...वाह-वाह...👏👏👏
जवाब देंहटाएंव्यंग्य शैली में बहुत सुंदर सम्बन्धों की परिभाषा गढ़ी आपने।
जवाब देंहटाएंअप्रतिम सृजन।
मित्र, पड़ोसी, और भाई,
जवाब देंहटाएंभाई के शोणित का प्यासा,
भूल चुके हैं सीधी-सादी,
सम्बन्धों की परिभाषा
बहुत सटीक...
लाजवाब गीत