-- जीने का ढंग हमने, ज़माने में पा लिया। सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।। -- दुनिया में जुल्म-जोर के, देखें हैं रास्ते, सदियाँ लगेंगी उनको, भुलाने के वास्ते, जख्मों में हमने दर्द का, मरहम लगा लिया। सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।। -- हमने तो दुश्मनों की, हमेशा बड़ाई की, पर दोस्तों ने बे-वजह, हमसे लड़ाई की, हमने वफा निभाई, उन्होंने दगा किया। सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।। -- आया गमों का दौर तो, दिल तंग हो गये, मित्रों में मित्रता के भाव, भंग हो गये, काँटों को फूल मान, चमन में सजा लिया। सारे जहाँ का दर्द, जिगर में बसा लिया।। -- |
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बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार(२९-०८ -२०२२ ) को 'जो तुम दर्द दोगे'(चर्चा अंक -४५३६) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
ख़ूबसूरत ग़ज़ल !
जवाब देंहटाएंसुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना
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