जनसेवा
के नाम पर, मन में पसरा मैल। निर्धन
श्रमिक-किसान तो, कोल्हू के हैं बैल।। छँटे
हुए सब नगर के, बन बैठे धनवान। पत्रकारिता
में लगे, अज्ञानी-नादान।। जो
समाज की नजर में, कभी रहे बेकार। वो
अब अपने देश में, चला रहे अखबार।। पत्रकारिता
में हुआ, गोल आज किरदार। विज्ञापन
के नाम पर, चमड़ी रहे उतार।। नाजायज-जायज
बना, करते रकम वसूल। आय-आय
के नाम पर, बिकते आज उसूल।। बैतरणी
में नरक की, कोई नहीं अनाथ। पत्रकार
की पीठ पर, राजनीति का हाथ।। छुटभइये
हों या बड़े, सबकी अपनी मौज। बढ़ती
जाती देश में, बाबाओं की फौज।। |
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पत्रकारिता का सटीक चित्रण, सार्थक दोहे ।
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (०७-११-२०२२ ) को 'नई- नई अनुभूतियों का उन्मेष हो रहा है'(चर्चा अंक-४६०५) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
पत्रकारिता के पतन पर बस अब शोक ही किया जा सकता है। प्रभावी बिंब।
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