धन के बल पर जुट रहा, भारी
आज हुजूम। कृषक-दिवस के नाम पर,
आडम्बर की धूम।। माटी में करता कृषक, खुद
को मटिया-मेट। फिर भी भरता जा रहा, वो
दुनिया का पेट।। दीन-हीन क्यों हो गया, धरती
का भगवान। देख कृषक की दुर्दशा, भारत
माँ हैरान।। चाहे भारत में रही, कोई
भी सरकार। नहीं किसानों को दिया,
जीवन का आधार।। झूठे भाषण सब करें, झूठी
करते प्रीत। है पोषण के नाम पर, शोषण
की सब रीत।। जागो श्रमिक-किसान अब, धरती
करे पुकार। दूर सियासत से करो, झूठे
नम्बरदार।। कहते भारत देश से, खेत
और खलिहान। शासक बनना चाहिए, धरती
का भगवान।। |
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आपने किसानों की पीड़ा को बहुत सीधी और असरदार भाषा में रखा है। मैं आपकी पंक्तियों में गुस्सा भी देखता हूँ और सच्चाई भी। आप जब कहते हैं कि किसान खुद मिट्टी में घुलकर दुनिया का पेट भरता है, तब बात दिल में उतर जाती है।
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